संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : मरने की फिक़्र नहीं तो गरिमा के साथ जीने की फिक्र कर लें..
07-Nov-2021 3:35 PM (107)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : मरने की फिक़्र नहीं तो गरिमा के साथ जीने की फिक्र कर लें..

दुनिया के एक विकसित देश न्यूजीलैंड में आज ऐसे इच्छा मृत्यु का कानून लागू हो गया है इसके साथ ही यह देश दुनिया के करीब आधा दर्जन ऐसे देशों की कतार में आ गया है जहां लोग कुछ खास हालात में अपनी मर्जी से मरना तय कर सकते हैं, और इसके लिए डॉक्टर उनकी मदद कर सकते हैं। दुनिया में अभी स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड, स्पेन, बेल्जियम, लक्जमबर्ग, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, और कोलंबिया ही ऐसे देश है जहां पर यूथिनिसिया का कानून है, जिसका मतलब होता है अच्छी मृत्यु, इच्छा मृत्यु। इसे मर्सी किलिंग भी कहा जाता है, और यह अमेरिका के कुछ राज्यों में भी लागू है। भारत में यह सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से एक सीमित दायरे में लागू है जहां किसी मरणासन्न मरीज को कोमा की हालत में रहने पर, करीबी रिश्तेदार, करीबी दोस्त, या डॉक्टर जीवनरक्षक उपकरणों से और दवाइयों से अलग कर सकते हैं, ताकि वे चैन की मौत मर सके। इसके लिए कई किस्मों की कानूनी औपचारिकताएं रखी गई हैं ताकि कोई इसका बेजा इस्तेमाल करके किसी को आसानी से न मार सके। इसमें बाहर के अफसरों और मेडिकल बोर्ड की मौजूदगी, और उनकी रिपोर्ट, और गवाहों के दस्तखत जैसी कई बातें भी जोड़ी गई हैं। दुनिया के अधिकतर देशों में इच्छा मृत्यु को कानूनी इजाजत नहीं दी गई है, और हिंदुस्तान में भी आत्महत्या की कोशिश अब तक एक अपराध ही है।

अलग-अलग देश की अपनी संस्कृति और संवेदनशीलता से परे, अलग-अलग धर्मों की सोच भी इच्छा मृत्यु को लेकर अलग-अलग होती है। हिंदुस्तान में ही हिंदू और जैन धर्म में कुछ खास परिस्थितियों में लोग ऐसा फैसला ले सकते हैं कि वे अब आमरण उपवास करके अपना जीवन त्याग दें। जैन समाज में बीच-बीच में संथारा नाम की एक परंपरा सुनाई पड़ती है जिसमें कोई व्यक्ति प्राण त्याग करना तय कर लेते हैं, और उसके बाद भी खाना-पीना बंद करके मौत का इंतजार करते हैं। ऐसे मौके को एक सामाजिक जलसे की तरह मनाया जाता है और धर्म के बहुत से अनुयायी ऐसी जगह पर लगातार इक_े रहते हैं। लेकिन भारत की सुप्रीम कोर्ट तक जाने के बाद भी एक मामला अभी तक नहीं निपट पाया है कि आत्महत्या की कोशिश को जुर्म के दर्जे से बाहर निकाला जाए। आज भी इस देश में आत्महत्या की कोशिश पर सजा का प्रावधान है। जबकि लोगों का यह मानना है कि आत्महत्या की कोशिश करने वाले लोग जिंदगी से वैसे भी इतने निराश रहते हैं कि उन्हें उस कोशिश के लिए सजा देना उनके साथ एक असामाजिक बेइंसाफी की बात रहती है। लेकिन अदालतें और संसद इस बारे में अभी कोई फैसला ले नहीं पाई हैं।

हिंदुस्तान में इच्छा मृत्यु को लेकर जो प्रावधान सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में लिखे हैं, और जो कि संसद के बनाए हुए किसी कानून के आने के पहले तक देश में कानून की तरह ही लागू हैं, उनमें यह साफ किया गया है कि लोगों के अपने चाहने पर और उनके मरणासन्न रहने पर, या कोमा में रहने पर ही ऐसा किया जा सकेगा और इसके लिए डॉक्टरी मदद से मौत नहीं दी जाएगी बल्कि जिंदा रखने के साधनों को तमाम औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद हटाया जा सकेगा। मतलब यह कि उन्हें मारा नहीं जायेगा, मर जाने दिया जायेगा. आज भारत में जब लोग सरकार से बहुत अधिक निराश हो जाते हैं तो उनमें से कुछ लोग सरकारी दफ्तर या मुख्यमंत्री तक पहुंचते हैं, या सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति को चि_ी लिखते हैं कि उन्हें मरने की इजाजत दी जाए। लेकिन निराशा में मरने का फैसला लोकतंत्र के ऊपर एक कलंक की तरह रहेगा इसलिए तुरंत ही ऐसे मामलों पर कार्रवाई की जाती है, और लोगों को बचाया जाता है। लेकिन दुनिया के जिन देशों ने इच्छा मृत्यु को इजाजत दी है वहां भी उनके तर्कों को समझने की जरूरत है। लोग यह मानते हैं कि जहां गरिमा के साथ जीना मुमकिन ना हो, जहां पर मानवीय परिस्थितियां हासिल न हो, वहां पर क्यों जिंदा रहा जाए? और वैसे हालात से बेहतर मर क्यों न जाया जाए? यह सवाल लोकतंत्र के भीतर हमेशा ही खड़े रहता है कि गरिमा के साथ जीना एक बुनियादी अधिकार होना चाहिए, और अगर यह हासिल नहीं है, तो अपनी जिंदगी पर तो अपना फैसला रहना चाहिए। लेकिन दुनिया में स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक या लोकतंत्र के अपने पाखंड के चलते हुए आमतौर पर कोई भी देश ऐसी नौबत का सामना करना नहीं चाहते कि वहां के लोग उनकी व्यवस्था को जिंदा रहने लायक भी नहीं पा रहे हैं, और देश या सरकार से, समाज या परिवार से निराश होकर मर जाना चाहते हैं, और ऐसी मौत के लिए वे डॉक्टरी मदद भी चाहते हैं ताकि जहर के इंजेक्शन से वे अपनी जिंदगी खत्म कर सकें।

इंसान की जिंदगी के अंत की नौबत बहुत अलग-अलग किस्म की रहती है और किन्हीं दो परिस्थितियों की आपस में तुलना नहीं की जा सकती। लेकिन जो बुनियादी बात लोकतंत्र में होनी चाहिए कि गरिमा के साथ जीने का मौका हर किसी को हासिल होना चाहिए, उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। किसी लोकतंत्र में अगर लोगों को उनके धर्म की वजह से, काम या जाति, या रंग की वजह से प्रताडऩा झेलनी पड़ती है, तो उसे गरिमापूर्ण जीवन नहीं माना जा सकता, और ऐसे में उनके भीतर मरने की एक इच्छा हो सकती है। अब उन्हें ऐसा अधिकार देना लोकतंत्र के अपने मुंह पर कालिख लगवाने सरीखा होगा, इसलिए लोकतंत्र इसे मान्यता नहीं देते। और इसीलिए बहुत से लोकतंत्र आत्महत्या के अधिकार को भी नहीं मानते और आत्महत्या की कोशिश को जुर्म करार देते रहते हैं।


अभी हिंदुस्तान में डॉक्टरी मदद से जान देना कोई मुद्दा नहीं है इस पर कोई बड़ी चर्चा नहीं है। लेकिन हम इस चर्चा को छेडक़र गरिमापूर्ण जीवन की बात छेडऩा चाहते हैं क्योंकि देश के नागरिकों को, यहां बसे हुए हर किसी को, इज्जत के साथ जिंदा रहने का एक बुनियादी हक रहना चाहिए। धर्म और जाति, खानपान और पहनावे, इन सबको लेकर अगर भेदभाव किया जा रहा है, तो वह नौबत मानवीय गरिमा के खिलाफ होने से जान देने की वजह बन सकती है। ऐसे बहुत से लोग हैं जो ऐसी नौबत में फंसकर जान दे भी देते हैं। इच्छा मृत्यु के बारे में दूसरे देशों के फैसले को देखते हुए हिंदुस्तान को यह सोचना चाहिए कि किस तरह यहां पर आत्महत्या की कोशिश को जुर्म के दायरे से बाहर किया जाए क्योंकि वह एक तनावग्रस्त व्यक्ति को और अधिक अपमानित करने, और उसे सजा देने का एक काम होता है। दूसरी तरफ गरिमापूर्ण जीवन की बात भी सोचनी चाहिए जो कि अपने आप में एक बहुत जटिल मुद्दा है और अलग-अलग लोगों के लिए गरिमा अलग-अलग मायने रख सकती है, उसकी परिभाषा अलग-अलग हो सकती है। लेकिन गरिमापूर्ण जिंदगी और गरिमा के साथ मौत का मुद्दा जब दूसरे देशों से लेकर हिंदुस्तान के सुप्रीम कोर्ट तक में आ चुका है, तो फिर समाज को भी इस गरिमा के बारे में सोचना चाहिए और इसकी फिक्र करनी चाहिए।
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