संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : विचारों को इस हद तक काबू करने वाला फेसबुक का यह एकाधिकार-कारोबार
10-Nov-2021 5:53 PM (102)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  विचारों को इस हद तक काबू करने वाला फेसबुक का यह एकाधिकार-कारोबार

फेसबुक को लेकर विवाद खत्म होने का नाम नहीं लेते हैं। अभी पश्चिमी दुनिया इस कंपनी में काम करने चुकी एक महिला अधिकारी को सुन रही है जिसने अमेरिका से लेकर ब्रिटेन तक, वहां की सांसदों को इस पर सोचने के लिए मजबूर किया है कि फेसबुक में किस तरह लोगों की हिफाजत से अधिक ख्याल अपनी कमाई का किया जाता है। हालांकि इस कंपनी ने इस बात को गलत करार दिया है, लेकिन इस भूतपूर्व महिला अधिकारी के खुलासे के पहले भी दुनिया में लोग लगातार इस बात को सोच रहे थे। और हिंदुस्तान का तजुर्बा फेसबुक को लेकर इसलिए भी खराब रहा है कि यहां उसने अति महत्वपूर्ण कहे जाने वाले कई लोगों के अकाउंट से नफरत फैलाने को अनदेखा किया, और दूसरे बहुत से भली नीयत वाले लोगों की लिखी गई बातों को ब्लॉक किया, भले लोगों को पोस्ट करने से रोक दिया। इसके साथ-साथ इस बात को याद रखने की जरूरत है कि किस तरह फेसबुक लोगों की जिंदगी पर छाया हुआ एक ऐसा सोशल मीडियम है जिसका गहरा असर लोगों की सोच पर हो रहा है। इस कंपनी के कंप्यूटर यह भी तय करते हैं किस-किस व्यक्ति को किस तरह की चीजें अधिक दिखानी हैं। और इस काम में कंपनी किस राजनीतिक विचारधारा को, या राजनीतिक दल को आगे बढ़ा सकती है, यह बाहरी लोगों के लिए अभी एक रहस्य की बात है। इसके अलावा फेसबुक ने अपने पेज पर दिखाने वाले इश्तहारों को लेकर भी एक और विवाद पैदा किया था कि कुछ खास राजनीतिक दलों का विज्ञापन की जगहों पर इस तरह कब्जा हो जाए कि दूसरों को कोई मौका ही न मिले।

फेसबुक के मुद्दे पर लिखने का हमारा यह कोई पहला मौका नहीं है, लेकिन जिस तरह सोशल मीडिया पर इसका एकाधिकार होते चल रहा है, यह भी समझने की जरूरत है कि इसने सोशल मीडिया या मैसेज मीडिया के दो दूसरे सबसे प्रमुख माध्यमों पर कब्जा कर रखा है, इंस्टाग्राम, और व्हाट्सएप। इन तीनों को अगर देखें तो यह कंपनी विचारों को प्रभावित करने का इतने विकराल आकार का एक खतरा बन चुकी है कि जिसका अंदाज लोगों को ठीक से लग नहीं रहा है। कहने के लिए तो अमेरिका में मीडिया के कारोबार के एकाधिकार के खिलाफ एक वक्त कानून हुआ करता था जो कि टीवी रेडियो और अखबारों के किसी एक हाथ में होने को रोकने के लिए था। अब पता नहीं वह कानून उस कारोबारी देश में इस्तेमाल हो रहा है या नहीं, लेकिन यह तय है कि हिंदुस्तान में विचारों को प्रभावित करने का जिस तरह का एकाधिकार फेसबुक और उसके इन दो औजारों ने हासिल कर लिया है वह हिंदुस्तान के लोकतंत्र के लिए एक बड़ी खतरनाक बात है। खतरनाक बात इसलिए भी है कि इन जगहों पर नफरत और हिंसा की बातों को रोकने का कोई औजार विकसित नहीं किया गया है। फिर जिन लोगों को फेसबुक बहुत खास मानता है उसमें हिंदुस्तान के कुछ खास राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े सत्तारूढ़ नेता हैं जिनके हिंसा के पोस्ट भी किसी कार्रवाई से बच जाते हैं, और दूसरी तरफ जो अमन पसंद लोग हैं उनकी लिखी हुई अहिंसक बातें भी ब्लॉक कर दी जाती हैं।

 इसके साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि हिंदुस्तान की बाकी भारतीय भाषाओं को समझने और उनमें फैलाई जा रही हिंसा को रोकने के लिए फेसबुक ने पर्याप्त औजार नहीं बनाए हैं। हिंदुस्तान के लोग फेसबुक के सबसे बड़े यूजर हैं, लेकिन हिंदुस्तान को लेकर फेसबुक की सुरक्षा प्रणाली सबसे ही कमजोर है। यह मानना भी ठीक नहीं होगा कि एक चतुर कारोबारी लापरवाही में ऐसा कर रहा है, यह भी हो सकता है कि वह राजनीति करने वाले दूसरे कारोबारियों के साथ मिलकर भी ऐसी लापरवाही दिखा रहा हो ताकि कुछ लोगों की पसंद की हिंसा की बातें फैलाई जा सके। क्योंकि सोशल मीडिया दुनिया में एक नई चीज है, और इसमें जो सबसे कामयाब प्लेटफॉर्म हैं उन्हीं पर सबसे अधिक लोग जाते हैं, क्योंकि उनके सबसे अधिक पहचान के लोग वहीं पर रहते हैं. इसलिए कोई अमनपसंद लोग कोई अलग प्लेटफॉर्म बनाएं तो उसकी कामयाबी की संभावना बिल्कुल ही कम है। अमरीका में तो नफरत पर जिंदा पिछले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्विटर पर उन्हें ब्लॉक कर दिए जाने के बाद ट्विटर के मुकाबले एक नया प्लेटफॉर्म शुरू करने की घोषणा की थी और वहां के अनगिनत नफरती अरबपति उनके साथ भी थे, लेकिन उनकी वह मुनादी किसी किनारे नहीं पहुंच पाई।

खुद अमेरिकी लोकतंत्र इस बात को लेकर अभी परेशान है कि रूस की सरकार अमेरिकी सोशल मीडिया के मार्फत अमेरिकी वोटरों को प्रभावित करने की कोशिश कर रही है या नहीं? और अगर कर भी रही है तो उसे अमेरिका किस तरह रोक सकता है, किस तरह वह बाहरी तत्वों को अपने लोकतंत्र को काबू में करने से रोक सकता है। ऐसी नौबत हिंदुस्तान के भीतर भी आ सकती है, आ रही है, या आ चुकी है। हो सकता है कि सोशल मीडिया पर दिखने वाला सच ऐसा चुनिंदा सच हो जिसे कि दिखाने में किसी राजनीतिक दल की दिलचस्पी हो और जो फेसबुक जैसे कारोबार के साथ सांठगांठ करके उस पर खासा वक्त गुजारने वाले लोगों की सोच को प्रभावित करने का काम कर रहा हो। भारतीय लोकतंत्र को परिपच्ता पाने में लंबा वक्त लगेगा यहां के वोटरों की जागरूकता जागने का काम अभी बाकी ही है। इसलिए फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर की जा रही कारोबारी शरारत का जमकर विरोध करना जरूरी है। इस प्लेटफार्म ने अपने खिलाफ सभी शिकायतों के लिए एक स्वतंत्र ट्रस्ट बना रखा है, लेकिन आज उस पर शिकायत करने वाले लोग किसी एक विचारधारा की तरफ से सैलाब की तरह पहुंच जाते हैं, क्योंकि वे इस औजार को जानते हैं, और ऐसा विरोध दर्ज करने के लिए तैनात हैं। दूसरे लोगों को भी इसकी ताकत को समझना होगा और इसे इस्तेमाल करना होगा।

अभी कुछ दिन पहले ही हमने फेसबुक के एक नए प्रोजेक्ट मेटावर्स के बारे में लिखा था, और वह फेसबुक के मुकाबले भी सैकड़ों गुना अधिक ताकत लेकर आ सकता है। ऐसे किसी दिन की तैयारी करने के लिए हमने कारोबार के लोगों को सावधान किया था, लेकिन अब लग रहा है कि उसके राजनीतिक बेजा इस्तेमाल के बारे में हमने नहीं लिखा था, जो कि अब जरूरी लग रहा है। अगर फेसबुक जैसी कोई ताकत सौ गुना अधिक ताकत हासिल कर लेती है, तो उससे हजार गुना अधिक सावधान रहने की भी जरूरत होगी।
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