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संबंधों की सूक्ष्म पड़ताल करता महेन्द्र भल्ला का उपन्यास 'एक पति के नोट्स'
11-Nov-2021 10:24 AM (69)
संबंधों की सूक्ष्म पड़ताल करता महेन्द्र भल्ला का उपन्यास 'एक पति के नोट्स'

– डॉ श्रद्धा श्रीवास्तव

महेन्द्र भल्ला द्वारा लिखित उपन्यास “एक पति के नोट्स” का उल्लेख हिंदी उपन्यास के इतिहास में जरूर होता है. महेंद्र भल्ला अपने इस पहले उपन्यास से ही काफ़ी चर्चित हो गए थे. हिंदी साहित्य में वह मनुष्य-मन व प्रकृति की सूक्ष्म अंतर्ध्वनियों को सुन पाने की क्षमता व संवेदना के कारण याद किए जाते हैं और किए जाते रहेंगे.

एक तो शीर्षक कौतुहल जगाता है दूसरा, भाव जगता पढ़कर देखें कि क्यों यह चर्चित उपन्यास चर्चित हुआ होगा. एक ही बैठक में पढ़ा जा सकने वाला बिल्कुल छोटा सा उपन्यास है. बिल्कुल सामान्य-सा लगने वाला कथानक एक घर, पति-पत्नी, पास-पड़ोस और डेली रूटीन.

यह उपन्यास तात्कालिक अनुभवों (क्षण तथा भोग) को कथानक में ढालता है, जिसे प्रायः हमारे यहां लोग कहते नहीं हैं. देह-भोग का यह चित्रण हिंदी के पारंपरिक पाठकों को चौंकाता है.

यह एक पति के नोट्स हैं – जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है जीवन में इस अक्षमता को जान लेना कि ऐसे ही जीते रहना ही जीवन होता है. जीवन ऐसा नहीं वैसा होना चाहिए का बोझ नायक अविनाश अंत में उतार फेंकता है.

उपन्यास के पहले ही पन्ने पर नायक लालसा व्यक्त करता है- पत्नी सीता का चेहरा मीठा लग रहा है. वह कहता है “अगर वह पत्नी न होती तो उसे जरूर चूम लेता या चूमने की इच्छा को दबाता इसका कड़वा मज़ा लेता. वह मज़ा लेने के लिए संध्या की ओर आकर्षित ज़रूर होता है पर उसके साथ सेक्स करते हुए इस निर्णय पर पहुंचता है संध्या “रबर की सी, रबर और मिटटी की बनी, बे-असर बदसूरती के नमूने लिए हुए है. उफ़!’’

दरअसल वहां भी वह उसी निरर्थकता को पाता है. प्यार और घृणा परस्पर दो विरोधी भावनाएं हैं और इन दोनों के साथ हमें जीना होता है. इस दर्शन-बाजी को नायक अविनाश किशोरी से कहता है- “आदमी को पशु भी रहना पड़ेगा जो वह मूलतः है और अत्यंत सभ्य भी.”

नायक अपने जान-पहचान के सभी दम्पतियों के संबंधों को अच्छी तरह से जांचता है, उलट-पलट कर देखता है. नंगा करके देखता है और अपने इस ख़याल को निहायत घिनौना भी बताता है. कमीनापन भी कहता है. वह खुद अपने और अपने आस-पास के लोगों के व्याक्तिगत जीवन को कुरेद-कुरेद कर देखना चाहता हैं. वह किशोरी और संध्या को करीब से देखता है और पाता है संध्या का पति किशोरी वनमानुष की तरह सख्त और ताकतवर था .वह बहुत ही भद्दे ढंग से बोलता, चलता, कपडे पहनता है. संध्या इसके साथ कैसे रहती होगी?

यह उपन्यास एक मामले में अलग है कि वो मार्क्सवाद के महामानव और न ही अस्तिववाद के लघु-मानव को प्रतिष्ठित न कर एक मामूली आदमी के मनोविज्ञान को व्यक्त करता है. उसका यह कहना -“न अच्छा हूं न बुरा हूं. मामूली हूं. जो मामूली नहीं है वे अजूबे हैं, हिसाब के बाहर के हैं. ’’

एक बात पति नोटिस करता है कि उसकी पत्नी एकरसता के साथ कैसे जी लेती है. वह सब काम चुपचाप बिना शिकायत के कैसे कर लेती है – “रोटी बनाना, नौकर को डांटना, घर साफ रखना. दत्तचित होके. मतलब बेमतलब से परे. वह उसके साथ बोरियत को दूर करने घर से बाहर जाता है. तब भी मन का सूनापन कम नहीं होता.

“सजे सजाये टेबल पर बैठते हैं वे दो ही थे. दोनों खाली तरफों पर सूनापन था. कभी लगता है हम सिर्फ दो ही हैं बाकी दुनिया नहीं है. शादी के बाद भी उसे खालीपन का अहसास होता है. दरअसल मैं वहीं था जहां से शुरूं हुआ था. कोरा. नहीं, न आगे न पीछे. वही.

उपन्यास में देह-भोग के चित्रण के लिए जिस भाषा को आजमाया है वो अपनी शैली में खिलंदड़ी और नयापन लिए है. जैसे – “जब मैंने शादी की तो उत्साह और ख़ुशी के मारे पहली बार फेल हो गया था. सीता का यह कहना –“आज आप अजीब थे.” यहीं पर बुलबुल या कुत्तों का खेलने वाले विवरण महेंद्र भल्ला के अनोखे शिल्प से आपका परिचय करवाते हैं. बुलबुल के आने को इतना बारीकी से देखते हैं. “काला सिर ,धूसर पूंछ, नीचे का हिस्सा लाल, बाकि मैली सी नफासत में गढ़ी. वह बुलबुल को देखकर मीर का शेर गुनगुना सकता है मीर का शेर गुनगुनाता है.

गुलशन में आग लग गई रंगे-गुल से मीर
बुलबुल पुकारी देख के साहिब, परे परे !

औरत के बारे कुछ बात और नोट करता है- जैसे कि “नए कपड़े पहनी औरतों में एक अजीब जीवनभरी खुशबू होती है. जब पत्नी अपने मायके वाले से बतियाती हुई अपने बचपन और कुंवारेपन में खो जाती है तो पति को वितृष्णा होती है.

उपन्यास- एक पति के नोट्स
लेखक- महेन्द्र भल्ला
प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष- 1967
मूल्य 50/-

(news18.com)

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