विचार / लेख

होशंगाबाद जिले के आदिवासी
16-Nov-2021 7:35 PM (39)
होशंगाबाद जिले के आदिवासी

-गोपाल राठी

 

होशंगाबाद जिले में तवा बांध, आर्डिनेंस फैक्ट्री, प्रूफ रेंज बनाने के लिए आदिवासियों के दर्जनों गांव विस्थापित किए गए थे। जिन्हें नाम मात्र का मुआवजा देकर विस्थापित कर दिया गया। उन्हें पुनर्वास का कोई पैकेज नहीं मिला। जिसको जहां खाली पड़ी सरकारी जमीन मिली, वहीं गांव बस गया। समाजवादी जनपरिषद किसान आदिवासी संगठन ने विस्थापित आदिवासियों को जमीन और आवास के पट्टे दिलाने, उन्हें जंगल में निस्तार दिलाने और तवा जलाशय में मत्स्याखेट करने के अधिकार के लिए अनेक आंदोलन किए। मत्स्य सहकारी का अनूठा काम करके दिखाया।

आदिवासी अंचल में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सार्वजनिक वितरण प्रणाली भी आंदोलन के मुद्दे रहे। दिवंगत साथी सुनील राजनारायण के नेतृत्व में 1985 में शुरू हुए इस आंदोलन की बागडोर साथी फागराम संभाल रहे हैं। होशंगाबाद जिले में बोरी अभ्यारण सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान और पचमढ़ी अभ्यारण्य को मिलाकर बने सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में बसे लगभग 75 गांवों को जंगल से बाहर निकालने का सवाल सामने आया तो समाजवादी जनपरिषद ने इसका पुरजोर विरोध किया। क्योंकि तब तक सरकार की कोई घोषित पुनर्वास नीति नहीं थी। इस क्षेत्र में जो पहला गांव उजाड़ा गया वह पचमढ़ी के पास बसा गांव नीमघान था। यहां वन विभाग ने बलपूर्वक सबको हटाया जो नहीं हटे उनके झोपड़े जला दिए गए थे। इस गांव से भागकर लोग यहां-वहां अपने रिश्तेदारों के यहां चले गए। एक पूरा गांव छिन्न-भिन्न हो गया। बाद में कुछ लोगों ने पिपरिया के अनहोनी के पास इंदिरा नगर नाम से नई बस्ती बसाई। समाजवादी जनपरिषद के विरोध के चलते जंगल से आदिवासियों को बाहर निकालना कुछ समय के लिए असंभव हो गया था। इस बीच वन विभाग ने जंगल के अंदर रहने वाले आदिवासियों को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उनका आने-जाने और विचरण पर रोक लगा दी। गांव के आसपास फेंसिंग कर दी। गांव के मवेशियों को जंगल में चरना प्रतिबंध कर दिया। जंगल में उनका निस्तार बन्द कर दिया गया। महुआ गुल्ली दोना-पत्तल, झाड़ू-घास आदि वनोपज लाना रोक दिया। खेती करना खत्म कर दिया उनके द्वारा तोड़े गए खेतों में प्लांटेशन कर दिया गया। फिर भी आदिवासी जंगल से ना हटने की जिद्द पर अड़े रहे।

समाजवादी जनपरिषद किसान आदिवासी संगठन शुरू से ही विस्थापित आदिवासियों के लिए जमीन के बदले जमीन की मांग करता रहा। इसी मांग को मद्देनजर रखते हुए सरकार की तरफ से जमीन के बदले जमीन, घर के बदले घर, स्कूल के बदले स्कूल का पुनर्वास पैकेज घोषित किया गया। जिसके अंतर्गत बाबई विकासखंड में बागरा के पास धाई, बोरी और साकोट गांव बसाए गए। हर वयस्क को पांच-पांच एकड़ जमीन दी गई। घर बनाए गए, सडक़, स्कूल और पानी का इंतजाम किया। इसे पुनर्वास का आदर्श मॉडल बताया गया।

बाहर से बहुत लोग इस मॉडल को देखने आए, अखबारों में भी बहुत छपा। लेकिन इसके बाद सरकार ने हाथ खड़े कर दिए और कहा कि इतने सारे लोगों को देने के लिए उसके पास जमीन ही नहीं है। मामला फिर अटक गया। संगठन ने फिर इस मुद्दे को उठाकर सरकार को घेरा। अंतत: प्रति वयस्क विस्थापित को दस लाख रूपये देने की घोषणा के साथ दुबारा पुनर्वास शुरू हुआ।

इस दौर के पुनर्वास की त्रासदी है कि दस लाख मिलते ही एक गांव में रहने वाले अलग-अलग गांवों में जाकर बस गए। कई जगह तो और भी विचित्र स्थिति हो गई। दस लाख मिलते ही पुत्र अपने पिता का साथ छोडक़र ससुराल में रहने चला गया।

शेर व अन्य वन्य जीवों के साथ आदिवासियों का हजारों साल पुराना रिश्ता रहा है। सब आदिवासियों की जंगल में उपस्थिति को शेर के लिए खतरनाक मानकर उन्हें जंगल से हटाया जा रहा है। यह शेर को बचाने का पश्चिमी मॉडल है जो यहां लागू किया जा रहा है। जंगल पर आश्रित आदिवासियों के लिए जंगल अब बेगाना हो गया है।

आदिवासी समुदाय की समस्या खत्म नहीं हुई है। उन्हें रोज नई-नई कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। सरकारी राहत और खैरात उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं है। आपकी नजर में मुआवजा देकर लोगों को अपने पुश्तैनी जगह से हटाना ठीक हो सकता है लेकिन यह प्राकृतिक न्याय के विपरीत है। ऐसी बदली हुई परिस्थिति और परिवेश में 25 प्रतिशत लोग ही सरवाइव कर पाते हैं। शेष दुष्चक्र में फंसकर बर्बाद हो जाते हैं।

सरकार कोई भी हो सबकी नीतियां आदिवासी विरोधी है। यह समझते हैं कि किसी स्टेशन का या यूनिवर्सिटी का नाम बदलकर आदिवासियों को वश में किया जा सकता है। उनके लिए कुछ करने धरने की जरूरत नहीं है। जंगल पर गिद्ध दृष्टि रखने वाले सारे कार्पोरेट्स सरकार के कृपा पात्र हैं। अब आदिवासियों का जो भी विकास होगा वह इन्हीं के माध्यम से होगा।

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