विचार / लेख

चुनाव के मद्देनजर ये उत्पात देश भर में
18-Nov-2021 1:18 PM (75)
चुनाव के मद्देनजर ये उत्पात देश भर में

-कनुप्रिया

इस देश में साल भर कोई न कोई हिंदू आस्था के पर्व चलते ही रहते हैं। प्रमुख देवता भगवानों के अतिरिक्त (जो भी संख्या में ठीक ठाक हैं)  स्थानीय देवताओं के लिये भी अलग से मेले होते हैं, राज्यों के हिसाब से छुट्टियाँ होती हैं। मंदिरों में अलग अलग अवसर पर लाउडस्पीकर बजते रहते हैं, जगराते होते हैं, भजन संध्याएँ चलती रहती हैं। क्या इससे किसी को कोई आपत्ति होती है? नहीं।  हमारे यहाँ तो बारात निकलने पर होने वाले ट्रैफिक जाम से भी लोगों को आपत्ति नही होती, अपने अपने गुरुओं, सन्तों (?), बाबाओं के स्वागत के लिये मुख्य सडक़ों पर टैंट लग जाते हैं तब भी आपत्ति नही होती, कचरों के ढेर से आधी सडक़ें चलने लायक नही रहतीं तब भी आपत्ति नहीं होती, ग़लत पार्किंग आम समस्या बनी रहती हंै तब भी हम चुप, सहनशील और सहिष्णु बने रहते हैं, नागरिक सुविधा का खय़ाल छू कर भी नहीं गुजरता।

 यह देश आस्था के लिये संवेदनशील है,भले 356 दिन किसी न किसी बहाने आस्था के उत्सव कार्यक्रम चलते रहें, महान धर्म, संस्कृति को बचाने के आगे नागरिक असुविधाओं के सवाल हर बार मुँह की ही खाते हैं। मैंने खुद पड़ोस के मंदिर की लाउडस्पीकर की आवाज पर आपत्ति की तो लोगों ने पूरे परिवार पर नास्तिक होने का आरोप लगाया, इस तरह आश्चर्य से देखा मानो मैंने सरेआम अश्लील बात कह दी हो, मानो अधार्मिक और नास्तिकों की कोई भावना नहीं होती, सुविधा नही होती, अधिकार नहीं होता।

जो देश आस्था के लिए इतना मतवाला है कि सारी सुविधा का अधिकार आस्था से जुड़ा है, वही गुरुग्राम में मुसलमानों के लिये नमाज पर नागरिक सुविधा का सवाल करे तो अजीब लगता है। जिनके मेले जुलूसों के हिसाब से साल भर ट्रैफिक संचालित किए जाते हों वो मुसलमानों को कहें कि घर में नमाज पढ़ो तो साफ है कि वो उनके आस्था के अधिकार पर आघात कर रहे हैं। मुसलमानों का कहना है कि हमारी कितनी ही मस्जिदें सील कर दी गईं हैं, अगर वो खोल दी जाएँ तो हमें शौक नहीं है खुले में नमाज पढऩे का, मगर उनकी यह समस्या इसलिये नहीं सुनी जा रही क्योंकि समस्या महसूस करने, कहने और सुनने का अधिकार भी अब सिर्फ बहुसंख्यकों का है। पितृसत्ता में स्त्री होते हुए ये भेदभाव किस तरह होता है ये मैं बखूबी जानती हूँ।

गुरुग्राम के अक्षय यादव ने मुसलमानों की नमाज के लिए घर-दुकान के दरवाजे खोल दिये और सिखों ने अपने गुरुद्वारों के तो यह उस समाज की मिसाल है जो आपसी सौहाद्र्र और सहिष्णुता में भरोसा करता है, जो झूठे अहम, मर्दवादी कुंठा (पॉवर पॉलिटिक्स), नियंत्रण की प्रवृत्ति की जगह और प्रेम, सम्मान और भरोसे को समाज में सहचर्य का जरूरी मानता है। मगर नागरिकों की तरफ से उठाए गए ये कदम जख्मों पर मरहम का काम भले करें, आस्था की सुविधा भले दे दें, उसका अधिकार नहीं दे सकते। वो अधिकार जो हमारे संविधान ने पहले पन्ने पर लिखा है, उस अधिकार की दुहाई के लिये पाकिस्तान के दखल की ज़रूरत नहीं है, ये उस अधिकार को सुरक्षित और सुनिश्चित करने वाली लोकतांत्रिक संस्थाओं का काम है कि सत्ता के अप्रत्यक्ष सहयोग और पीठ पर ‘कुछ नहीं होगा’ के वरद हस्त की आश्वस्ति से इस अधिकार का खुलेआम हनन करने वालों को संविधान का पहला सबक सिखाएँ। पुलिस और मीडिया सत्ता के नियंत्रण में है तो संविधान की सुरक्षा के लिए पाबंद न्यायालय स्वत: संज्ञान लेकर साबित करें कि वो नियंत्रित नहीं हैं।
 
माना कि उत्तरप्रदेश चुनाव के मद्देनजर ये उत्पात देश भर में हो रहे हैं ताकि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को ईंधन मिले और बीजेपी को वोट मगर कहीं न कहीं ये संदेश तो जा ही रहा है कि देश अब संविधान से नहीं चलेगा, फैसले सडक़ों पर होंगे, और नागरिक अधिकारों का अधिकार भी किसे है ये सत्ता की मानसिकता तय करेगी।

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