संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : विपक्षी गठबन्धन की गेंद 10 जनपथ से निकलकर ममता बनर्जी के पाले में !
25-Nov-2021 12:26 PM (83)
 ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : विपक्षी गठबन्धन की गेंद 10 जनपथ से निकलकर ममता बनर्जी के पाले में !

हिंदुस्तान की राजनीति एक बिल्कुल ही नए किस्म का और दिलचस्प दौर देख रही है। कांग्रेस पार्टी जिसे कि भारतीय जनता पार्टी के अलावा देश में हर राज्य में मौजूदगी वाली एक पार्टी माना जाता था, या अभी भी माना जाता है, वह एक रफ्तार से अपनी जमीन खो रही है। बिना किसी बाहरी दबाव के, सिर्फ अपने आंतरिक संघर्ष के चलते हुए कांग्रेस ने पंजाब में अपने एक सबसे बुजुर्ग नेता और सबसे पुराने मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को खोया, या दूसरा नजरिया हो सकता है कि उनसे छुटकारा पा लिया। जो भी हो अमरिंदर की जो भी थोड़ी बहुत जमीन हो, वे आज भाजपा के साथ कदमताल करते हुए दिख रहे हैं और नवजोत सिंह सिद्धू नाम का रेत का टीला पंजाब में कांग्रेस की इमारत की बुनियाद बना हुआ है, और यह टीला किस सुबह खिसक जाएगा इसका अंदाज पिछली शाम तक भी नहीं होगा। लेकिन बात महज पंजाब तक सीमित रहती तो भी ठीक था। कांग्रेस को एक बिल्कुल ही नए मोर्चे पर चुनौतियां झेलनी पड़ रही हैं, और तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी अपनी पूरी ताकत से कांग्रेस पर हमला बोल रही हैं।  वैसे तो उनका घोषित मकसद भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर एक विपक्षी मोर्चा तैयार करना है, लेकिन फिलहाल उस मोर्चे के लिए गारा तैयार करने के लिए वे कांग्रेस की इमारत तोड़ रही हैं, और उसके ईंट-सीमेंट के टुकड़ों से अपने मोर्चे को जोड़ कर रही हैं। गोवा से लेकर त्रिपुरा तक और मेघालय से लेकर हरियाणा तक ममता बनर्जी कांग्रेस छोडक़र तृणमूल कांग्रेस में आने लायक हर नेता पर डोरे डाल रही हैं। और आज की नौबत के पीछे की एक दूसरी जानकारी को भी इस चर्चा में याद कर लेना जरूरी है।

लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले ममता बनर्जी के राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर मुंबई जाकर दो बार शरद पवार से मिले और फिर दिल्ली आकर उन्होंने सोनिया गांधी, राहुल, और प्रियंका से भी मुलाकातें कीं। उस वक्त यह चर्चा चल निकली थी कि प्रशांत किशोर कांग्रेस में शामिल होने जा रहे हैं। वे कांग्रेस से एक सीमित हद तक जुड़े भी रहे हैं कि वे पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के राजनीतिक या चुनावी सलाहकार रह चुके हैं। इसलिए यह माना जा रहा था कि प्रशांत किशोर कांग्रेस से जुडक़र देश में एक बड़ा विपक्षी मोर्चा बना सकते हैं। बात यहां तक तो सही निकली कि वे देश में एक बड़ा विपक्षी मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कांग्रेस से निराश होते ही उन्होंने यह खुलासा कर दिया कि विपक्षी मोर्चा कांग्रेस की नहीं, ममता बनर्जी की लीडरशिप के लिए विकसित किया जा रहा है। और प्रशांत किशोर की वजह से या ममता बनर्जी के अपने व्यक्तित्व की वजह से बंगाल तक सीमित तृणमूल कांग्रेस एक के बाद दूसरे राज्य तक अपनी मौजूदगी बढ़ाते चल रही है. यह मौजूदगी किसी और राज्य में सरकार बनाने के करीब नहीं है, लेकिन ममता बनर्जी की तमाम कोशिशें तृणमूल कांग्रेस को एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी की शक्ल देने की है। उन्होंने बंगाल से एकदम दूर गोवा जाकर वहां कांग्रेस के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री को तृणमूल कांग्रेस में शामिल करवाया और असम में अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष रह चुकी सुष्मिता देव को टीएमसी में शामिल करवाया। लेकिन जो सबसे बड़ा झटका उन्होंने कांग्रेस को दिया है वह मेघालय में है, वहां पर कांग्रेस के 17 में से 12 विधायक भूतपूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा की अगुवाई में तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने जा रहे हैं। रातों-रात तृणमूल राज्य में प्रमुख विपक्षी दल बनने जा रही है।

कहीं दिल्ली तो कहीं हरियाणा, शिकार के लिए तृणमूल कांग्रेस की पहली पसंद कांग्रेस के नेता रह गए हैं। यह बात समझने की जरूरत है कि एक वक्त कांग्रेस छोडक़र निकले शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने जगह-जगह कांग्रेस की संभावनाओं को खत्म किया था। महाराष्ट्र में तो जाहिर तौर पर उन्होंने कांग्रेस के एकाधिकार को खत्म करके अपनी मजबूत मौजूदगी बनाई थी. लेकिन कम लोगों को यह याद होगा कि छत्तीसगढ़ राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री अजीत जोगी की लीडरशिप वाली कांग्रेस को हराने का काम राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बैनर तले एक असंतुष्ट कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल ने किया था, और उन्होंने एनसीपी को इतने वोट दिलवाए थे जो कि कांग्रेस की हार से ज्यादा थे। मतलब साफ था कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार को आने से एनसीपी ने रोक दिया था। अभी भी पिछले कुछ महीनों के शरद पवार के बयान देखें तो वह कांग्रेस की आज की घरेलू बदहाली को लेकर निराश दिख रहे हैं। और ममता बनर्जी के साथ उनका कोई सीधा टकराव नहीं है क्योंकि दोनों की अलग-अलग राज्यों में मौजूदगी है। दिक्कत यहीं पर आ सकती है कि शरद पवार और ममता बनर्जी में से अगले चुनाव में विपक्षी गठबंधन को लीडरशिप देने के लिए इनमें से किसे मौका मिले? लेकिन यह बात तय दिख रही है कि यह दोनों ही पार्टियां कांग्रेस से परे एक विपक्षी गठबंधन में जा सकती हैं, और हो सकता है कि लीडरशिप का मुद्दा भी सुलझा लिया जाए। जो बात अभी बहुत साफ नहीं है वह यह है कि भाजपा के भी कई लोग, बंगाल से परे भी तृणमूल कांग्रेस में जा रहे हैं, जिनमें मोदी से असंतुष्ट चल रहे पहले ही भाजपा छोड़ चुके भूतपूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा सबसे बड़े नेता रहे हैं, और कल की खबर यह है कि मोदी से सबसे असंतुष्ट रहने वाले भाजपा के नेताओं में से एक और, आज के भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी भी ममता बनर्जी से मिले हैं, और ममता बनर्जी की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं।

इस तरह आज हिंदुस्तान में राजनीति की फिजां बदली हुई दिख रही है और विपक्षी गठबंधन कांग्रेस की लीडरशिप में एक होने के बजाय अब किसी और लीडरशिप में एक होने की तरफ बढ़ सकता है। बिहार में लालू यादव की पार्टी आरजेडी कांग्रेस से परे जा चुकी है, उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और मायावती की बसपा कांग्रेस से बहुत दूर जा चुकी है, इस तरह धीरे-धीरे कांग्रेस अलग-थलग पड़ रही है और ममता बनर्जी तिनका-तिनका जोडक़र एक घोंसला बनाने की तरफ बढ़ रही हैं। हालांकि पिछले कुछ हफ्तों से प्रशांत किशोर के बारे में कोई खबर नहीं आई है, लेकिन ऐसा लगता है कि बंगाल की तृणमूल कांग्रेस के लिए देशभर में संभावनाएं ढूंढने का काम प्रशांत किशोर कर रहे हैं, और वे ममता को एक प्रादेशिक नेता से ऊपर लाकर एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित करने में लगे हैं, और वे एक शुरुआती कामयाबी पाते दिख रहे हैं। देश में विपक्ष का ऐसा गठबंधन 2024 के आम चुनाव में काम आएगा, लेकिन उसके पहले अलग-अलग कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में ऐसी किसी विपक्षी एकता का असर देखने मिलेगा और उस असर की कामयाबी से राष्ट्रीय स्तर पर संभावनाएं कम या अधिक होंगी। कुल मिलाकर इन सारी घटनाओं का निचोड़ यह है कि कांग्रेस अपनी जमीन खो रही है और उस जमीन पर कब्जा पाने वाले लोगों में ममता बनर्जी आज सबसे आगे दिख रही हैं।

जो लोग भारत के पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के बीच हर बरस की आने वाली बाढ़ में खोने वाली जमीन का हाल जानते हैं, वे इस बात को बेहतर समझ सकते हैं। बाढ़ कई इलाकों से खेतों को बहाकर खत्म कर देती है, और वह मिट्टी जाकर दूसरी तरफ, दूसरे देश में किनारे एक जमीन खड़ी कर देती है। आज कांग्रेस के साथ एक भूतपूर्व कांग्रेसी नेता ममता बनर्जी कुछ ऐसा ही करते दिख रही हैं. आगे आगे देखिए होता है क्या।
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