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कमाठीपुरा की गलियों ने बताया किसी जगह पर आप क्यों गलत साबित हो सकते हैं- शिरीष खरे
26-Nov-2021 11:36 AM (100)
कमाठीपुरा की गलियों ने बताया किसी जगह पर आप क्यों गलत साबित हो सकते हैं- शिरीष खरे

Hindi Sahitya News: राजपाल एंड सन्स, नई दिल्ली से प्रकाशित पत्रकार शिरीष खरे की पुस्तक ‘एक देश बारह दुनिया’ बाजार में आते ही छा गई. तमाम मीडिया संस्थानों में इस पुस्तक की चर्चा हुई. दरअसल, इस किताब के भीतर महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य-प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, कर्नाटक, बुंदेलखंड और राजस्थान के थार से जुड़े तरह-तरह के अनुभव मिलते हैं. वहीं, देश के कुछ जनजातीय अंचलों में स्थानीय लोगों के साथ बिताए गए समय से जुड़ी रोचक और भावनात्मक घटनाएं हैं.

‘एक देश बारह दुनिया’ यानी एक ही देश के भीतर बारह तरह की दुनियाएं हैं जिन्हें शिरीष ने पत्रकारिता के अपने अनुभवों को एक पुस्तक की शक्ल देते हुए यह नाम दिया है. असलियत में यह पुस्तक हाशिये पर छूटे असल भारत की तस्वीर है.

‘एक देश बारह दुनिया’ के दुर्गम मार्गों से गुजरते हुए पत्रकार शिरीष खरे ने अलग-अलग राज्यों से करीब दर्जन भर जगहों की असल तस्वीर को शब्द देने के प्रयास किए हैं.

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वरिष्ठ लेखक और समीक्षक आशुतोष कुमार ठाकुर ने पुस्तक के बारे में शिरीष खरे से विस्तार से चर्चा की. प्रस्तुत हैं उसी चर्चा के प्रमुख अंश-

आशुतोष- ‘एक देश बारह दुनिया’ नाम बड़ा रोचक है, लेकिन जिज्ञासा पैदा करने वाली इस नॉन-फिक्शन पुस्तक में क्या कुछ है?

शिरीष- सामान्यत: एक देश की अलग-अलग जगह तो एक-सी नजर आती हैं, पर जब हम किसी अदृश्य संकटग्रस्त जगह पर कुछ दिनों तक ठहरकर वहां के ज्वलंत मुद्दे पर कई असल पात्रों की छोटी-छोटी मार्मिक कहानियां जोड़ते हैं, स्थानीय पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए सामयिक घटनाओं के विवरण लिखते हैं, तो एक समान विषय होते हुए भी वहां की दुनिया हमें बाकी देश से एकदम भिन्न नजर आने लगती है. जैसे विदर्भ में मेलघाट की चोटी पर जब हम कोरकू जनजातियों की बीच पसरी भूख के संकट पर लिखते हैं तो उसकी सच्चाई मुंबई की भूख से अलग न होते हुए भी मुख्यत: भूख की जड़ में पहुंचने की कोशिश करती है. और यह पड़ताल करती है कि कैसे जनजातियों के जीवन को जब जंगल से काटा गया तो मेलघाट से मुंबई तक उनकी दुनिया नर्क होती चली गई.

आशुतोष- बतौर पत्रकार आपने मेलघाट की बात की और नर्मदा नदी के किनारे लंबी यात्रा करते हुए एक नदी पर आ रहे नए संकटों पर भी लंबा लिखा. क्या ऐसा संभव था कि आप किसी एक ही जगह के बारे में पूरी एक पुस्तक लिखते, बारह अलग-अलग जगहों पर लिखने की बजाय?

शिरीष- मैं तो कहूंगा कि यह बारह अलग-अलग दुनिया होने के बावजूद हैं तो एक ही महादेश की कथाएं. यहां से आप जब किसी एक मुद्दे को अलग-अलग जगहों पर पहुंचकर अलग-अलग आयामों से देखेंगे तो आपको असल भारत की तस्वीर और अधिक साफ, और अधिक बड़ी नजर आ सकती है.

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उदाहरण देकर बताता हूं- मेलघाट यानी पहली दुनिया से लेकर बाहरवीं दुनिया यानी छत्तीसगढ़ के अछोटी गांव तक पूरे सफरनामे में आपको दोहराव नजर न आए तब भी कुछ सूत्र हैं जो शुरू से आखिरी तक हर पड़ावों को आपस में गूंथते हुए चलते हैं. जैसे कि मेलघाट से लेकर अछोटी तक सूखे के चिन्ह. एक जंगल तो दूसरी कृषि आधारित दो बिल्कुल अलग मानें जाने वाले समुदायों की दुनिया एक न होते हुए भी सूखे के चिन्ह या ऐसी ही कुछ चीजों से यहां जुड़ती हुई लगती है.

आशुतोष- मुंबई के रेडलाइट एरिया कमाठीपुरा की दुनिया को आपने फिक्शन जैसा लिखना चाहा है. वहां की जगह को क्या सोचते हुए आपने अपनी पुस्तक में जगह दी?

शिरीष- दस-ग्यारह साल पहले मैंने वहां से एक रिपोर्ट लिखी थी- ‘ग्रीनलाइट के इंतजार में जिंदगी’. उसे लिखते हुए मेरे दिमाग में यह बात घूम रही थी कि जो दृश्य मैं देख रहा हूं, जो विवरण मैं जुटा रहा हूं, जो मुझ पर बीत रही है, उन बातों को रिपोर्ट से बाहर जाकर फिक्शन या नॉन-फिक्शन में लिखूं. क्योंकि ऐसी बातें रिपोर्ट में लिखीं सूचनाओं से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो सकती हैं. इसलिए मैंने इसमें और अन्य दूसरे रिपोर्ताज में लेखन की एक शैली तैयार करने की कोशिश की, जो भाषा और प्रस्तुति के स्तर पर तो साहित्यिक रहे, लेकिन मैं मूलत: एक पत्रकार हूं, इसलिए घटनाओं से जुड़े तथ्य और विवरणों को ज्यों का त्यों रखते हुए वहां की हकीकत को और करीब से बताने की कोशिश की है.

आशुतोष- कमाठीपुरा को करीब से बताने की कोशिश का खुद आपके भीतर भी असर हुआ है?

शिरीष- इस कोशिश में मेरे कई माइंड-सेट टूटे, कैसे तो ये बातें पुस्तक में हैं. दरअसल उस जगह और वहां सेक्सवर्कर्स की जिंदगियों को समझने के लिए मैंने उनसे कई अनौपचारिक साक्षात्कार किए थे. तब मुझे पता चला कि जो कुछ भी मैं पहले सोचता रहा था, वैसा तो वहां था ही नहीं. शायद कई धारणाएं पुस्तक लिखने के बाद भी मेरे दिमाग में हों, इसलिए इस पुस्तक को मैं सीखने की प्रक्रिया के रुप में देख रहा हूं. कोई कहे कि यहां आप सही नहीं हो तो वहां मैं उससे नया जानने की कोशिश करूंगा और सही लगा तो खुद में सुधार लाने की कोशिश भी करूंगा, क्योंकि कमाठीपुरा की गलियां ने मुझे बताया है कि किसी जगह पर क्यों आप गलत साबित हो सकते हैं.

आशुतोष- इसी तरह से क्या कोई व्यक्ति है जिसकी कही बात आपके दिमाग में घर कर गई हो और आप अपनेआप के बारे में सोचने के लिए मजबूर हो गए हो?

शिरीष- कई सारे, जैसे महाराष्ट्र के कनाडी बुडरुक गांव की तिरमली बस्ती के भूरा गायकवाड़ की वह बात याद आती है जिसमें भूरा कहते हैं कि लौटने के लिए हर एक के दिमाग में एक घर घूमता है. लेकिन घुमंतु जमात वालों के दिमाग में लौटने के लिए कोई घर नहीं घूमता है. उनकी बात सुन मेरे दिमाग में तब देर तक एक घर घूमा था और मैं सोचने लगा था कि कोई यात्रा पूरी करके घर की तरफ लौटना किसी किताब को पूरा पढ़ लेने जैसी राहत देता है. पर यात्राओं से लौटते हुए मैं अक्सर अलग-अलग शहरों के अलग-अलग घरों की ओर लौटता हूं, फिर भोपाल, मुंबई, दिल्ली, जयपुर, बड़वानी और पुणे के घरों के पते बदल जाते हैं. उन किराए के घरों के बारे में सोचते हुए आखिर मुझे भी मेरे गांव मदनपुर का घर ही याद आने लगता है, जो मेरा स्थायी पता है.

आशुतोष- आपके रिपोर्ताज में कनाडी बुडरुक गांव के तिरमली जमात को भी मुख्यधारा के समाज के बीच लंबे संघर्ष के बाद आखिर अपना पता मिल जाता है. यह परिवर्तन काफी है?

शिरीष- जो जमात पुलिस से घबराए, बसों में बैठने के लिए कतराए, यदि उसी जमात के लोगों के संघर्ष से उनकी अगली पीढ़ी का कोई आदमी इंस्पेक्टर बने, या कोई लड़की राज्य परिवहन बस में कंडक्टर हो जाए तब भी संभव है कि बाहरी समुदाय को पहली नजर में यह परिवर्तन ही न लगे. लेकिन, उनके संघर्ष को वहां से देखें जहां उनके बुजुर्गों को गांव वाले अपने गांव के आसपास ज्यादा दिन टिकने नहीं देते थे और खदेड़ते ही रहते थे.

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दूसरी तरफ, पता तो महाराष्ट्र के ही आष्टी कस्बे के सैय्यद मदारियों को भी मिल गया है, फिर भी सड़कों पर मदारी का खेल दिखाने वाली इस जमात की नई पीढ़ी एक द्वंद का शिकार हो चुकी है. यही हाल महादेव बस्ती के पारधी बच्चों का है. इन कहानियों को पढ़ते समय आपको यह भी लग सकता है कि क्या उन जगहों पर होने वाले परिवर्तन नए खतरे के संकेत दे रहे हैं.

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आशुतोष- ‘गन्ने के खेतों में चीनी कड़वी’ रिपोर्ताज में शोषण की फसल के बावजूद आपने खेत मजदूर को जाल के भीतर फंसा बताया है, लेकिन विकल्प नहीं बताया है?

शिरीष- क्योंकि, वह शिकारी को पहचानने के बावजूद जीने की रणनीति के तहत सब कुछ जानते हुए भी जाल में फंसने के अलावा कोई चारा नहीं ढूंढ़ पाता है. मैंने भी पहली बार सुना तो अजीब लगा कि मराठवाड़ा के मस्सा गांव की तरह आसपास के सैकड़ों गांवों के खेत मजदूर अपने नजदीक ही चीनी फैक्ट्री और गन्ने के खेत होने के बावजूद कर्नाटक के अलग-अलग खेतों में छह से आठ महीनों के लिए पलायन क्यों करते हैं. या फिर उन जगहों पर जोड़ा बनाने के लिए बच्चों की कम उम्र में विवाह क्यों कर दिए जाते हैं.

आशुतोष- बस्तर को लेकर आपके पास नया कहने के लिए क्या है?

शिरीष- नए की बात तो अपनी जगह ठीक हो सकती है, लेकिन जब खुद को अभिव्यक्त करना पहले से ज्यादा असहज होता जा रहा है, तब दोहराना भी कहीं जरूरी लगने लगता है.

रायपुर में प्रेस रिलीज लिखते समय एक चरित्र ऐसा था, जो मुझसे कभी नहीं मिला. लेकिन मैंने उससे बातचीत की और उस समय एक छोटी कविता लिखी, उसका नाम था मीना खलको. पुलिस के साथ कथित मुठभेड़ में जिसे मार दिया गया था. बाद में उसकी मौत पर कई प्रश्न उठे. फिर अखबार के लिए रिपोर्टिंग के दौरान मुझे कुछ समय बस्तर जिले के जगदलपुर में रहने और आसपास की कुछ जगहों को घूमने का मौका मिला. अखबार के ऑफिस में संपादकीय सहयोग के समय मैंने अखबार की पुरानी फाइलों को पढ़ा तो लगा कि कई खबरों को फ्रंट पर होनी चाहिए थीं, पर वे डबल या ट्रिपल कॉलम में समेट दी गई थीं.

मतलब यह कि जो खबरें बस्तर से बाहर के आदमी के लिए बड़ी बन गई थीं, वे वहां के लिए सामान्य रह गई थीं. जैसे कि अबूझमाड़ के एक गांव में दो दर्जन से ज्यादा परिवार राशन पाने के लिए छह रातें रास्ते में पैदल चलते हुए बिताते हैं और सातवें दिन जब वे जगदलपुर पहुंचते हैं, तो कर्मचारी उन्हें कोई तकनीकी कारण बताकर राशन नहीं देता है. उसके बाद मैंने जगदलपुर की आसपास की जगहों से शिक्षा जैसे विषयों पर रिपोर्टिंग की और वहां के बाजार वगैरह घूमे तो मुझे बाहरी होने की वजह से जो नया लगा वही नयापन आप मान सकते हैं.

(news18.com)

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