संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : आज संविधान दिवस का मौका, हर सालाना दिन याद दिलाता है कि वह कैसी बदहाली में है !
26-Nov-2021 12:58 PM (154)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  आज संविधान दिवस का मौका, हर सालाना दिन याद दिलाता है कि वह कैसी बदहाली में है !

वैसे तो किसी सालाना दिन पर उस दिन के हिसाब से लिखना बड़ा बोरियत का काम होता है, लेकिन फिर भी आज संविधान दिवस है और हिंदुस्तान में रहते हुए कानून को लेकर मन में भड़ास कितनी भरी हुई रहती है कि संविधान दिवस पर कुछ लिखने को दिल कर रहा है। 26 नवंबर के इस दिन को भारत में राष्ट्रीय कानून दिवस भी कहा जाता है और 1949 में आज ही के दिन भारत की संविधान सभा ने देश के संविधान को मंजूरी दी थी ,जो कि 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ था। मोटे तौर संविधान का जलसा 26 जनवरी को मनाया जाता है लेकिन आज के दिन का एक अलग महत्व है जब संविधान सभा का काम पूरा हुआ था और संविधान के मसौदे को मंजूरी दी गई थी। इन ऐतिहासिक तथ्यों से परे यह सोचने और समझने की जरूरत है कि यह संविधान भारत के किस काम आया है?

संविधान को लागू करने की जिम्मेदारी भारत की तीनों संवैधानिक संस्थाओं पर बराबरी की है, कार्यपालिका यानी सरकार, न्यायपालिका यानी अदालत, और विधायिका यानी संसद। लेकिन हाल के बरसों में इन तीनों का जो बदहाल रहा है, वह मन को बैठा देता है। खासकर सरकार और संसद ने हम लोगों को जिस हद तक निराश किया है, और यह निराशा पिछले कई वर्षों से लगातार जारी है। इन दोनों से परे सुप्रीम कोर्ट में कभी किसी अच्छे चीफ जस्टिस के आ जाने पर बाकी जजों का मिजाज भी बदला हुआ दिखता है और ऐसा लगता है कि संविधान को लेकर जो बुनियादी जिम्मेदारी अदालत पर है, उसे पूरे उसे पूरा करने की नीयत अदालत की दिख रही है। लेकिन जब इन तीनों संस्थाओं के आपस के रिश्तों को देखें तो अनगिनत मामलों में यह लगता है कि सरकार और संसद ये दोनों संविधान के खिलाफ किस हद तक काम कर रही हैं कि बीच-बीच में अदालत को दखल देकर इन दोनों के इंजन और डिब्बे पटरी पर लाने पड़ते हैं। संसद के काम में दखल देने की अदालत की अपनी एक सीमा है, लेकिन संसद के बनाए हुए कानूनों की व्याख्या करना अदालत के अधिकार क्षेत्र में है, इसलिए जब कभी संसद अलोकतांत्रिक कानून बनाती है, या बेईमानी के कानून बनाती है, तब अदालत को दखल देकर उसकी मरम्मत करनी पड़ती है। यह एक अलग बात है फिर संसद में अगर किसी सरकार की ताकत जरूरत से अधिक हो, तो वह शाहबानो जैसे फैसले को पलटकर सुप्रीम कोर्ट से कह सकती है कि तुम्हारी औकात हमारे मुकाबले कुछ नहीं है। फिर भी इन सबके बीच यह देखने की जरूरत है कि ये तीनों संस्थाएं संविधान को लेकर क्या कर रही हैं?

इन तीनों में जो सबसे कम गुनाहगार दिख रही है उस अदालत की बात करें तो वह भी 100 फीसदी पाक साफ नहीं है, और बहुत से जज भ्रष्ट जाने जाते हैं, बहुत से जज सरकार को खुश करके रिटायरमेंट के बाद अपने पुनर्वास के लिए फैसले देते हुए दिखते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तमाम ताकतें रहने के बावजूद कभी यह नहीं सोचा कि देश के सबसे कमजोर लोग इंसाफ पाने के लिए देश की सबसे छोटी अदालतों की सीढिय़ों तक भी नहीं पहुंच पाते, और वैसे में वे किसी ताकतवर के खिलाफ लड़ रहे हों, या कि किसी सरकार के खिलाफ, उनकी जीत की कोई गुंजाइश नहीं रहती। तो ऐसा संविधान किस काम का जो एक दस्तावेज की शक्ल में एक ऐसा ढकोसला हो जो कि ताकतवरों के पैर दबाता है, उनके सिर पर चंपी मालिश करता है, और जो सबसे कमजोर तबका है उसके पेट की भूख को भी अनदेखा करता है, ऐसा संविधान किस काम का? अदालत की बात करते हुए यह याद रखने की जरूरत है अभी हाल के बरसों के एक सुप्रीम कोर्ट मुख्य न्यायाधीश ने जिस तरह से, जिस बेशर्मी से अपने खुद पर लगे यौन शोषण के आरोपों की सुनवाई खुद करना तय किया था, वह संविधान की किसी भी किस्म की भावना के सख्त खिलाफ था, उसके शब्दों के भी खिलाफ था। लेकिन कई वजहें ऐसी थीं कि वह मुख्य न्यायाधीश सत्तारूढ़ पार्टी के संसद के बाहुबल से भी बचे रहा, और सुप्रीम कोर्ट के जजों के भीतर भी उसे लेकर कोई बगावत नहीं हुई। जब सरकार मेहरबान तो किसी महाभियोग का तो सवाल ही नहीं उठता। यह मुख्य न्यायाधीश अपने चर्चित फैसलों के बाद सत्तारूढ़ पार्टी की ओर से राज्यसभा सांसद बन गया !

लेकिन सुप्रीम कोर्ट से परे अगर सरकार को देखें तो पिछले कुछ दशकों में सरकारों के फैसले लगातार उन चोरों की तरह रहे जो कि रात को पुलिस गश्त से बचते हुए तंग गलियों से निकलकर अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं। सरकारों ने संविधान के खिलाफ, अपनी शपथ के खिलाफ, और देश के हितों के खिलाफ, जनता के खिलाफ लगातार फैसले लिए, और उन्हें ऐसी शक्ल दी कि अदालत से उन्हें पलटा जाना आसान न हो। जब संसद में बहुमत जरूरत से अधिक बड़ा होता है तो बददिमागी भी उसी अनुपात में बड़ी हो जाती है। इसलिए आज संविधान दिवस पर यह याद करना जरूरी है कि देश की पिछली सरकारों ने संविधान की भावना के खिलाफ और जनहित के खिलाफ कौन-कौन से फैसले लिए, उन्हें अध्यादेश और कानून का दर्जा दिया, अदालतों को अपने काबू में रखा, और जनता के संवैधानिक अधिकारों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कुचलने का काम किया।

अब अगर संसद की बात करें तो संसद ने अपने-आपको दल-बदल कानून के दायरे में लाकर अपने हाथ-पैर इस तरह काट दिए हैं कि किसी पार्टी के गलत फैसलों को भी उस पार्टी के कोई ईमानदार सांसद कोई चुनौती नहीं दे सकते। संसद के भीतर जब किसी वोट की नौबत आती है तो हर पार्टी के सांसद को अपनी पार्टी के हर सही-गलत फैसले के पक्ष में वोट देना होता है, वरना उसकी सदस्यता खत्म हो सकती है. मतलब यह कि जिस संसद को होनहार और प्रतिभावान, अनुभवी और जन कल्याणकारी सांसदों का फायदा मिलना था, वह संसद अब सांसदों की पार्टियों की गिरोहबंदी की जगह रह गई है, और निजी प्रतिभा का कोई फायदा उसे मिलना बंद हो गया है। संसद में तो दरअसल विचार-विमर्श और बहस होना भी बंद हो गया है और अब वह गंदी तोहमतों की एक जगह रह गई है जहां पर बहुमत के नाम पर एक ध्वनिमत को लादकर लोकतंत्र का गला घोंट दिया जाता है। यह संसद संविधान की भावना के तो बिल्कुल ही खिलाफ हो चुकी है, और लोगों की आम समझ-बूझ भी बताती है कि यह संसद अब अरबपतियों और करोड़पतियों का एक क्लब बन चुकी है, जिसमें दाखिल हो पाना देश के किसी गरीब और मध्यमवर्गीय के लिए नामुमकिन सा हो गया है। वामपंथी दलों के कुछ गिने-चुने गरीब सांसद वहां जरूर हैं लेकिन न उनकी कोई ताकत वहां पर रह गई है, और न उनकी बातों को सुनकर भी उन्हें सुनना जरूरी रह गया है। संसद को जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसी जगह बना देना संविधान की सोच में तो नहीं रखा गया था।

सरकार भ्रष्ट, बाहुबली संसद बददिमाग, और सुप्रीम कोर्ट हांकने वाले लोग अपने-अपने पुनर्वास के लिए फिक्रमंद, देश में संविधान दिवस पर संविधान को बनाने वाली, और संविधान को लागू करने वाली संस्थाओं का यह हाल बड़ा निराश करने वाला है। यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों से लदा हुआ है जो कि सरकार के असंवैधानिक फैसलों के खिलाफ जनता या जन संगठनों द्वारा दायर किए गए हैं। आज कुल मिलाकर संविधान की फिक्र जनता और जन संगठनों को दिख रही है जिनकी अलग से कोई ताकत नहीं है, और जिन्हें चुनाव में भी जब यह विकल्प मिलता है कि उन्हें बुरे और बहुत बुरे में से किसी एक को चुनना है, जब उन्हें भ्रष्ट पार्टी और सांप्रदायिक पार्टी में से किसी एक को चुनना है, तो उनका सरकार चुनने का संवैधानिक अधिकार भी भला किस काम का रह गया है। दरअसल भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में संविधान ऐसा दस्तावेज नहीं है जिसके पन्नों को फाडक़र लोग पखाना पोंछने का काम करते रहें, और वह फिर भी असरदार बना रहे। यह पूरी संसदीय व्यवस्था एक ऐसे संविधान के ढांचे से ली गई है जहां पर संविधान का सम्मान करना एक परंपरा की बात रही है, एक गौरव की बात रही है। इस संविधान को छड़ी लेकर लागू करवाना मुमकिन नहीं है, यह संविधान को अपनी जिम्मेदारी मानकर खुद लागू करना तो मुमकिन है। लेकिन हिंदुस्तान की हालत बहुत खराब है और ऐसा संविधान दिवस याद दिलाता है इस देश में यह संविधान किसी काम का नहीं रह गया है, या कि यह देश किसी काम का नहीं रह गया है। यह संविधान बाहुबलियों की लाठी बन चुका है, यह संविधान संसद में बाहुबल का गुलाम हो चुका है, और यह संविधान अक्सर ही सुप्रीम कोर्ट के जजों के रिटायर होने के बाद की महत्वाकांक्षा का शिकार हो चला है। इस दिन पर संविधान के साथ, और उससे कहीं अधिक इस देश की आम जनता के साथ हमारी हमदर्दी है, जिसके किसी काम का यह संविधान नहीं रह गया है।
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