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इंदौर अहिल्याबाई का नहीं, तुकोजीराव का शहर है !
27-Nov-2021 1:12 PM (61)
इंदौर अहिल्याबाई का नहीं, तुकोजीराव का शहर है !

-अनिल जैन
शहरों, इमारतों, सडक़ों, रेलवे स्टेशनों और ऐतिहासिक स्मारकों के नाम बदलने के खेल में रमे मूर्खों के गिरोह पर अब इंदौर शहर का नाम बदलने की खब्त सवार हुई है। उनका इरादा इंदौर का नाम ‘देवी अहिल्याबाई होलकर नगर’ रखने का है।

इस गिरोह को न तो इंदौर के इतिहास की जानकारी है, न होलकर रियासत की और अहिल्याबाई के बारे में भी यह गिरोह कुछ नहीं जानता है। दिमाग से पैदल होने की वजह से जान भी नहीं सकता।

नर्मदा घाटी मार्ग पर स्थित इंदौर शहर को 306 साल पहले यानी 1715 में स्थानीय (कम्पेल गांव के) जमींदारों ने व्यापार केंद्र के रूप में बसाया था। उस समय इसका नाम इंद्रपुरी हुआ करता था।

यह नाम इसे यहां बने प्राचीन इंद्रेश्वर महादेव मंदिर की वजह से मिला था। बाद में पेशवा के सेनापति और होलकर रियासत के संस्थापक मल्हारराव होलकर ने इसे अपनी राजधानी बनाया और अपभ्रंश होकर इसका नाम इंदूर हो गया, जो बाद में अंग्रेजों के समय इंदौर हुआ।

यह सही है कि मल्हारराव होलकर की बहू अहिल्याबाई इंद्रेश्वर महादेव को अपना आराध्य मानती थीं लेकिन शासन की बागडोर संभालने के तुरंत बाद वे अपनी राजधानी को इंदौर से स्थानांतरित कर महेश्वर ले गई थीं।

अहिल्याबाई ने 1767 से 1795 तक शासन किया और तब तक उनकी रियासत की राजधानी महेश्वर ही रही। उनकी मृत्यु के बाद तुकोजीराव होलकर (प्रथम) ने शासन के सूत्र संभाले और फिर से इंदौर को अपनी राजधानी बनाया।

इसलिए इंदौर को ‘मां अहिल्या की नगरी’ कहना भी सही नहीं है। वस्तुत:यह मल्हारराव होलकर और तुकोजीराव होलकर का शहर है।

जो लोग इंदौर का नाम बदल ‘देवी अहिल्याबाई होलकर नगर’ करना चाहते हैं, उनका चरित्र या स्वभाव भी अहिल्याबाई के शील, संघर्ष और न्यायप्रियता से नहीं बल्कि तुकोजीराव होलकर (तृतीय) के व्यक्तित्व और कृतित्व से ही मेल खाता है।

उल्लेखनीय है कि तुकोजीराव तृतीय को एक नर्तकी के साथ उनकी लफड़ेबाजी के चलते हुए हत्याकांड की आड़ में अंग्रेजों ने सत्ता से बेदखल कर दिया था।

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