संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : क्या हिंदुस्तान में सचमुच जाति व्यवस्था खत्म करने का वक्त आ चुका है?
28-Nov-2021 1:50 PM (130)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  क्या हिंदुस्तान में सचमुच जाति व्यवस्था खत्म करने का वक्त आ चुका है?

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में एक दलित परिवार के चार लोगों की कुल्हाड़ी से मारकर हत्या कर दी गई। इसके अलावा ऐसी आशंका है कि उस परिवार की एक नाबालिग बच्ची के साथ गैंगरेप भी किया गया है, क्योंकि उसकी लाश उसी तरह से मिली है। इस परिवार ने कुछ दबंग ठाकुर लोगों पर पहले से आशंका जताते हुए पुलिस रिपोर्ट लिखाई थी, लेकिन जैसा कि आमतौर पर होता है, पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की थी, और यह दबंग लोग इस परिवार से पहले भी मारपीट कर चुके थे, जान से मारने की धमकी दे चुके थे। अब पुलिस तमाम किस्म की कार्रवाई करने का वायदा कर रही है। मरने वालों के करीबी संबंधियों का कहना है कि पुलिस हमलावरों से समझौता करने के लिए दबाव डाल रही थी, और पुलिस ने ही हौसला बढ़वाकर ये कत्ल करवाए हैं। दो दिन पहले जब यह खबर आई तो उसी दिन राजस्थान से एक दूसरी खबर आई कि वहां पर एक दलित दूल्हे की बारात पुलिस की हिफाजत में घोड़ी पर निकल रही थी और उसे घोड़ी पर चढ़ा हुआ देखकर, जाहिर तौर पर, सवर्णों की तरफ से पथराव किया गया। दूल्हा पुलिस के घेरे में था फिर भी उस पर पथराव हुआ।

इन दो मामलों के अलावा भी कोई ऐसा दिन नहीं होता है जब उत्तर भारत और काऊ बेल्ट कहे जाने वाले हिंदी भाषी प्रदेशों से दलित प्रताडऩा की कई-कई खबरें न आएं। रोजाना ही इस किस्म के जुल्म होते हैं जो हजारों बरस पहले की जाति व्यवस्था से उपजे हुए एक हिंसक अहंकार का नतीजा होते हैं, और जो आज भी दलितों के सिर उठते देखना नहीं चाहते। लोगों को याद होगा कि एक वक्त दक्षिण भारत में दलित महिलाओं को अपने सीने ढंकने के लिए एक टैक्स देना पड़ता था, जो टैक्स नहीं दे पाती थीं उन्हें अपने सीने खुले रखने पड़ते थे। और यह व्यवस्था उसे दक्षिण भारत में थी जहां पर ब्राह्मणवादी व्यवस्था बड़ी मजबूत थी। भारत का आज का केरल एक वक्त इस हिंसक प्रथा का गवाह था और वहां पर एक दलित महिला ने इस टैक्स के खिलाफ विरोध दर्ज करने के लिए हंसिये से अपने स्तन काट दिए थे। वहां के एक कलाकार मुरली ने उस इतिहास को दर्ज करते हुए पेंटिंग्स बनाई हैं। नीच कहीं जाने वाली जातियों की महिलाओं को अपना सीना ढंकने की इजाजत नहीं थी, और अगर वे ऐसा करना चाहती थीं तो उन्हें एक बड़ा टैक्स देना पड़ता था। यानी ऊंची समझिए जाने वाली जातियों के मर्दों ने दलित महिलाओं के स्तनों को देखने को अपना हक़ बना रखा था।

हिंदुस्तान में आज बहुत से लोगों को लगता है कि जातिगत आरक्षण की कोई जरूरत नहीं है और इसे खत्म कर दिया जाना चाहिए क्योंकि जातियों की व्यवस्था को खत्म हुए जमाना हो चुका है। लेकिन हालत यह है कि जातियों की व्यवस्था आज इस मजबूती से कायम है कि राजस्थान जैसे कांग्रेस के राज वाले प्रदेश में भी एक दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढऩे के लिए पुलिस के घेरे में भी पथराव झेलना पड़ता है, यही हाल उत्तर प्रदेश के योगीराज में एक दलित परिवार का है जहां पर कि दबंग ठाकुर लोग इस दलित परिवार को सबक सिखाने के लिए उसकी नाबालिग बच्ची को मारने के पहले उससे सामूहिक बलात्कार करते हैं, और घर के सारे लोगों को एक साथ काट कर फेंक देते हैं। बहुत से प्रदेशों में बहुत सी पार्टियों के सरकारों में दलितों का इसी किस्म का हाल है और शायद यही वजह है कि पंजाब में जब कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाने के बाद कांग्रेस ने एक दलित को मुख्यमंत्री बनाया तो उसे एक बड़ा हौसले वाला कदम बताया गया और यह भी कहा गया कि उत्तर प्रदेश से लेकर पंजाब तक कांग्रेस के विरोधियों के लिए इसका जवाब देना मुश्किल पड़ेगा। अब राजनीति में किसी दलित के मुख्यमंत्री बनने से फर्क पड़ेगा या नहीं पड़ेगा यह तो नहीं मालूम, लेकिन कांग्रेस का राज हो या भाजपा का, दलितों का हाल मोटे तौर पर इन कुछ प्रदेशों में ऐसा ही बुरा चले आ रहा है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान जैसे कई राज्य हैं जहां दलितों को आज भी मानो मनु के राज में जीना पड़ रहा है। वहां मानो उनके कान में वेद का कोई वाक्य पड़ जाए तो अब भी उन कानों में पिघला हुआ सीसा भर दिया जाएगा।

भारत में पता नहीं अपराध के शिकार लोगों की जाति का कोई विश्लेषण हुआ है या नहीं, लेकिन बलात्कार और हिंसा के शिकार लोगों की जातियों का कोई विश्लेषण अगर किया जाए तो उसमें दलितों की बारी सबसे पहले और सबसे ऊपर आते हुए दिखेगी जो कि बलात्कार के लिए सवर्णों की पहली पसंद रहते हैं। यह बात भी बड़ी अजीब सी है कि जो दलितों छूने के के लायक भी नहीं रहते हैं, जिनकी छाया से भी सवर्ण अशुद्ध हो जाते हैं, उन दलित महिलाओं के बदन का एक तंग हिस्सा सवर्णों को छुआछूत नहीं लगता है और वहां पहुंचकर सवर्णों के बदन का एक हिस्सा अचानक समाजवादी बराबरी का हिमायती हो जाता है। यह सिलसिला आंकड़ों की शक्ल में निकाला जाकर एक विश्लेषण के बाद लोगों के सामने आना चाहिए कि दलितों पर जुल्म कितने तरह के हो रहे हैं, किन राज्यों में अधिक हो रहे हैं, किन पार्टियों के राज में यह अधिक होते हैं, किन जातियों द्वारा यह जुल्म अधिक किए जाते हैं, और यह भी कि क्या मुख्यमंत्री की जाति का इस पर कोई फर्क पड़ता है? यह वही उत्तर प्रदेश है जहां पर बात-बात पर आरती होने लगती है और हिंदू धर्म के भीतर की ब्राह्मणवादी व्यवस्था के मुताबिक पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में पूरी की पूरी सरकार झोंक दी जाती है। इस बात के फर्क को भी समझने की जरूरत है कि क्या हिंदुत्व का ऐसा चेहरा जो कि इस तथाकथित हिंदू तबके के भीतर भी जाति के एक हिस्से की मर्जी से लदा हुआ चलता है, और क्या यह हिस्सा दलितों पर जुल्मों के लिए अधिक जिम्मेदार है? जाति व्यवस्था का कौन सा हिस्सा दलितों को बलात्कार और पत्थरों के मरने लायक मानता है, इसका एक सामाजिक विश्लेषण सामने आना चाहिए जिसमें जातियों की खुलकर चर्चा होनी चाहिए क्योंकि जातियां हिंदुस्तान में न तो इतिहास हैं, न कल्पना हैं, वे एक कड़वी हकीकत हैं जिनका कि लंबे वक्त तक कायम रहना भी तय है। यह सिलसिला इस सदी के अंत तक भी थमते नहीं दिखता है क्योंकि अभी तक तो यह बढ़ते ही दिख रहा है। जब देश का सुप्रीम कोर्ट भी दलित और आदिवासी मामलों में दर्ज होने वाली रिपोर्ट पर कार्रवाई को लेकर एक वक्त दलित विरोधी रुख दिखा चुका है, और उसके बाद मजबूरी में उसे अपना फैसला वापस लेना पड़ा था, तो ऐसी तमाम चीजों से देश के हालात को समझना जरूरी है। जो लोग ऐसा समझते हैं कि हिंदुस्तान में जातिगत आरक्षण खत्म होना चाहिए उन्हें दलितों पर होने वाले ऐसे जुल्म की खबरों को ध्यान से पढऩा चाहिए, और अपनी सोच को दोबारा तय करना चाहिए।
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