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Dr Rajendra Prasad Brithday: अपने समकालीन नेताओं से कितने अलग थे राजेंद्र बाबू
03-Dec-2021 10:29 AM (79)
Dr Rajendra Prasad Brithday: अपने समकालीन नेताओं से कितने अलग थे राजेंद्र बाबू

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास के बड़े नेताओं का जिक्र जब भी होता है तो लगता है कि डॉ राजेंद्र प्रसाद का नाम छिपा सा है. देश उन्हें अपने पहले राष्ट्रपति के रूप में याद रखता है. राष्ट्रनिर्माण के लिहाज से देखा जाए तो वे संविधान सभा के अध्यक्ष थे. यानि संविधान निर्माताओं के नेता थे. ऐसे में आम लोगों के मन में यह कौतूहल है कि आखिर राजेंद्र बाबू का भारतीय इतिहास में क्या स्थान और कद था. आइए उन बातों को जानते हैं जो राजेंद्र बाबू को अपने समकालीन नेताओं से अलग कर विशिष्ठ स्तर पर रख देती हैं.

बचपन से ही पढ़ाई पर ध्यान
डॉ राजेंद्र प्रसाद का जन्म बिहार के सीवान के जीरादेई गांव के एक कायस्थ परिवार में हुआ था. उनके पिता महादेव सहाय संस्कृत और फारसी के जानकार थे और मां एक धार्मिक गृहणी थीं. पांच भाई बहनों में सबसे छोटे होने की वजह से बचपन में राजेंद्र बाबू को भरपूर स्नेह और दुलार मिला. वे बचपन से ही सुबह बहुत जल्दी उठने के आदी थे. वे बचपन से ही अपने पढ़ाई पर खास ध्यान दिया करते थे.

पढ़ाई में हमेशा अव्वल
हमेशा ही एक मेधावी छात्र रहे राजेंद्र बाबू ने प्रारंभिक शिक्षा छपरा, फिर 13 साल की उम्र में विवाह के बाद पटना में आगे की पढ़ाई और 1902 में कॉलेज की पढ़ाई के लिए कलकत्ता यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया और कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में आगे की पढ़ाई की थी. इसके बाद 1915 में कानून की उत्तरोस्नातक डिग्री एमएलएम पास करने के बाद कानून के विषय में ही डॉक्टरेट की उपाधि पाने के बाद से डॉ राजेंद्र प्रसाद ही कहलाए गए.

एक शिक्षक के रूप में राजेंद्र बाबू
डॉ राजेंद्र प्रसाद ने बहुत से शिक्षण संस्थानों में शिक्षक के रूप में भी अपनी सेवाएं दी हैं. अर्थशास्त्र में एमए करने के बाद वे बिहार के मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर और फिर प्रिंसिपल भी बने. इसके बाद उन्होंने कानून की पढ़ाई की ओर रुख किया और कानून पढ़ते पढ़ते कलकत्ता सिटी कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर के तौर पर भी काम किया.

वकालत से देश सेवा की ओर
राजेंद्र बाबू के सामने एक बेहतरीन वकालत का पेशा था, लेकिन उन्होंने गांधी जी के चंपारण आंदोलन से प्रभावित होकर देश सेवा करने का फैसला किया और 1928 में तो उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के सीनेटर पद त्यागकर खुद को पूरी तरह से देश सेवा केलिए समर्पित कर दिया था. इससे पहले वे बाढ़ पीड़ितों के लिए हमेशा ही कार्य करते रहते थे. कांग्रेस से जुड़ने के बाद वे जल्दी ही स्वतंत्रता आंदोलन में बिहार और महाराष्ट्र के एक प्रमुख नेता बन गए.

हिंदी से विशेष प्रेम
राजेंद्र बाबू का हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी और बांग्ला भाषा पर पूरा अधिकार था और इन सभी भाषाओं में कुशल वक्ता भी थे. उन्हें गुजराती भाषा का व्यवहारिक ज्ञान था तो उन्होंने संस्कृत का भी खासा अध्ययन कर रखा था. लेकिन उनकी प्रिय भाषा हिंदी ही थी. बीए की पढ़ाई में उनका विषय हिंदी ही था. भारत मित्र, कमला, भारतोदय जैसी हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख हिंदी में ही छपते थे. कई मौकों पर वे लोगों को अपने हिंदी प्रेम से परिचित भी करवाते रहते थे.

लेखक राजेंद्र बाबू
डॉ राजेंद्र प्रसाद ने हिंदी अंग्रेजी पत्रकारिता के अलावा कई पुस्तकों का लेखन भी किया है. उन्होंने हिन्दी के देश और अंग्रेजी के ‘पटना लॉ वीकली’ समाचार पत्र का सम्पादन भी किया था. उन्होंने कई हिंदी साहित्य सम्मेलनों की अध्यक्षता भी की. उनके लेखन में उनकी आत्मकथा (1964) के अलावा बाबू (1954), इंडिया डिवाइडेड (1953) सत्याग्रह एट चंपारण (1922), गांधी जी की देन, भारतीय संस्कृति और खादी का अर्थशास्त्र जैसी शामिल हैं.

सादगी की मिसाल
इतने ज्ञानवान होने के बाद भी राजेंद्र बाबू ने कभी भी अपने सरलता का त्याग नहीं किया. वे हमेशा ही लोगों सरलता और सज्जनता से ही पेश आया करते थे. वे हमेशा गांव को बहुत महत्व देने की बात करते थे. आधुनिकता से बड़ी सहजता से दूर रहे. यहां तक कि राष्ट्रपति बनने के बाद वे 10 हजार के वेतन का आधा पैसा देश सेवा के लिए सरकार के खाते में ही छोड़ देते थे उनके परिवाजनों ने बताया था कि उन्होंने अपने वेतन का सिर्फ एक चौथाई यानि 2500 रुपए लेना ही स्वीकार किया था. (news18.com)

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