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जैनेन्द्र कुमार को नए सिरे से समझने में सहायक होगी उनकी जीवनी ‘अनासक्त आस्तिक’
29-Dec-2021 1:50 PM
जैनेन्द्र कुमार को नए सिरे से समझने में सहायक होगी उनकी जीवनी ‘अनासक्त आस्तिक’

 

Hindi Sahitya News: जैनेन्द्र कुमार हिन्दी के केवल मूर्धन्य कथाकार ही नहीं है अपितु प्रखर राष्ट्रवादी चिन्तक-विचारक भी है. वे हिन्दी भाषा में सोचने-विचारने वाले अन्यतम व्यावहारिक भारतीय दार्शनिक भी हैं तो भारत सहित वैश्विक राजनीति पर गहरी दृष्टि रखनेवाले प्रबुद्ध राजनैतिक विशेषज्ञ भी. वे स्वाधीनता आन्दोलन के तपोनिष्ठ सत्याग्रही भी रहे जिन्होंने स्वाधीनता मिलने के बाद भी अपने समग्र जीवन और लेखन क्रो सत्याग्रह बनाया.

अपने दर्शन में आत्म को प्रतिष्ठित करनेवाले,विचारों में भारतीय-राष्ट्र-राज्य को अधिकाधिक सर्वोदय में देखने वाले तथा जीवन में एक गृहस्थ संन्यासी का आदर्श प्रस्तुत करनेवाले जैनेन्द्र कुमार का महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद, विनोबा भावे, राधाकृष्णन, जयप्रकाश नारायण, इन्दिरा गांधी आदि राष्ट्रीय नेताओं से सीधा संवाद था पर यह संवाद राष्ट्रीय हितों के लिए था, निजी स्वार्थों के लिए नहीं.

साहित्य, कला, संस्कृति के ख्यात आलोचक डॉ. ज्योतिष जोशी ने जैनेन्द्र कुमार की जीवनी लिखी है. यह जीवनी ‘अनासक्त आस्तिक‘ नाम से राजकमल प्रकाशन से छपकर आई है. प्रस्तुत हैं ‘अनासक्त आस्तिक’ के चुनिंदा अंश-

जैनेन्द्र गांधीजी को मन में साथ लिये घर आये थे. जो उनके जीवन में घटा वह विलक्षण अनुभव था. पहला साक्षात्कार अत्यन्त साधारण था और अत्यल्प भी, और उसमें जाने कितने बरस बह गये थे. पर उन्होंने देखा, गांधी जी विस्मृत नहीं होते, हर चीज़ की बहुत गहरी स्मृति उन्हें रहती है और वे हर क्षण उसे स्पंदित किये रहते हैं. वे सोचते, क्या यही वह साधना है जिससे पुरुष अकाल-पुरुष बनता है, व्यक्ति विराट हो जाता है और एक होते हुए अखिल विश्व का हो जाता है, अपनी दीप्ति में समूचे जगत को आभामय कर देता है? गांधीजी से भेंट के समय वैयक्तिक और निर्वैयक्तिक की सीमा लुप्त हो गयी थी.

निश्चय ही जैनेन्द्र से निगाह हटते ही वे उनके नहीं रह गये थे, पर जब तक निगाह उन पर थी तब तक मानो वे ही उनके सब कुछ थे और निजता उनसे अलग न थी. ऐसे थे वे अकाल-पुरुष, जिनसे भेंट के उन क्षणों को याद कर पुलकित होते जैनेन्द्र बुधवार की बेचैन प्रतीक्षा करने लगे, जब गांधीजी यानी बापू उनके सामने होंगे और वे उनसे बातें कर सकेंगे, उनको अपने में समो सकेंगे—महात्मा के आत्म में विसर्जित होने को उद्यत जैनेन्द्र का आत्म निरा सांसारिक नहीं रह गया था.

अन्तत: बुधवार आ ही गया और प्रतीक्षा की घड़ी भी दूर हुई. दो बजे के पहले ही जैनेन्द्र गांधीजी के पास पहुंचे. गांधी जी ने देखते ही बुला लिया. जैनेन्द्र ने उनके चरण छुए. झुके हुए जैनेन्द्र की पीठ पर बापू के आशीर्वाद बने उनके हाथ मानो परम सुख दे रहे थे. फिर पास बिठाया और कहा—“पूछो तो, क्या पूछते हो?” जैनेन्द्र नि:शंक होकर बोले—“सेवा तो ठीक है. पर किस बल पर सेवा हो? रहता यहां हूं, जीविका मेरी चली आये पांच सौ मील दूर से आने वाले मनीऑर्डर के रूप में, तो क्या यह सहज है कि जहां हूं वहां लोगों से मेरा हितैक्य और आत्मैक्य बन जाय? गांव का सेवक उद्धारक हो, तो कैसे चलेगा? उसे क्या जीविका के लिए वहीं निर्भर नहीं रहना चाहिए?”

जैनेन्द्र ने कहा—“गांव में बैठा हूं तो यह चाहता हूं कि उनके दु:ख-सुख का भागी बनूं, उसी वर्ग का होकर रहूं. कोई बाहर से आयी अर्थवृत्ति मेरा पोषण न करे.”
गांधी जी हंसे फिर बोले—“यह उत्तम है. और है पूछने को?” गांधी जी मुस्कराते हुए आगे बोले.
“जी बापू!”
“तो बोलो.”

गांधी जी के कहने पर जैनेन्द्र बोलने लगे—“राज-कारण को जीवन से अलग रखने का वचन कैसे दिया जा सकता है बापू-? राजनीति ओढ़ी हुई हो तो उतार भी दी जा सकती है, पर विश्वास और विचारों की अभिव्यक्ति अगर वह हो, तो उसे अलग कैसे रखा जा सकता है?”

गांधी जी ने उनको कौतूहल से देखा और कहा—“ठीक है.”
बात पांच-सात मिनट में खत्म हो गयी थी. इस भेंट में ज़्यादातर जैनेन्द्र ही बोलते जा रहे थे, गांधी जी की ओर से एक-दो वाक्य ही आये थे. सोचकर आये थे कि खिंच जायेंगे जीते जायेंगे. गांधी जी ग्राम-सेवकों की एक बड़ी संख्या चाहते थे, उनकी बहाली भी हो रही थी. वे एक उम्मीदवार की तरह प्रस्तुत भी हुए थे, पर उनको उसमें रखने की कोई आकांक्षा दिखती प्रतीत न हुई. इस प्रकार थोड़ी देर और ठहरकर जैनेन्द्र चलने को हुए, पर भीतर से इस विचार पर अपने को वे समर्पित और प्रसन्न पा रहे थे.

चलते वक्त गांधी जी ने दया की बात की, उनकी पत्नी भगवती की भी, कुछ अन्य पारिवारिक बातें भी कीं. इससे वे मानो बेहद हल्के और भरपूर बन आये थे.

इस भेंट से लौटते हुए वे सोच रहे थे, क्या हुआ, क्या परिणाम मानें इसका. काम-काज और व्यवहार की भाषा में तो यह निष्फल भेंट थी, पर भीतर बहुत कुछ घट गया था. उसने जैनेन्द्र को अपार प्रसन्नता दी थी और वे प्रशस्त होकर लौट रहे थे.

यह भेंट प्राप्ति के अर्थ में शून्य रही. आशा थी कि वे स्वयंसेवकों में आ जायेंगे. पर ऐसा कुछ न हुआ. गांधी जी ने अपनी ओर से कोई ऐसी चेष्टा नहीं दिखाई. गांधी जी की यह विशेषता उनकी अपनी ही थी. वह अनुयायी नहीं चाहते थे, उनकी पांत बढ़ाना भी नहीं और न उसके लिए कोई दल. वे सबको स्वयं में रहने देने के हिमायती थे और भीतर से शक्ति देते थे. व्यक्तित्व के इस निर्माण की कला उनके अतिरिक्त किसी भी दूसरे को नहीं आती थी. इसमें उनको सिद्धि प्राप्त थी. इसके लिए अपने को छोड़कर रहना होता है. अपने को होम सके, वही इसे साध सकता है.

जैनेन्द्र इस तरह सोचते-विचारते गांधी जी के प्रभाव के मूल तक पहुंचे. उसका एक तत्त्व था—न किसी को किसी शर्त के साथ स्वीकार करना, न किसी शर्त में अपने को बांधना. जो तुम हो, उसी रूप में तुम्हारा वहां सत्कार है, स्वागत है. यह नितान्त निस्पृह, निस्स्व और सबमें घुल जाने की शक्ति उनमें थी, जो उनको सबसे अलग और परम बनाती थी.(news18.com)

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