संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : इसके पहले कि लाशें ठिकाने लगाने का बोझ शुरू हो, टीकों के बारे में भी बात करें..
06-Jan-2022 4:50 PM
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  इसके पहले कि लाशें ठिकाने लगाने का बोझ शुरू हो, टीकों के बारे में भी बात करें..

लोगों को कोरोना वायरस पर बहुत अधिक लिखा जाना कुछ थका सकता है, और इस मुद्दे पर इतना अधिक पढऩा हो सकता है कि कुछ लोग न भी चाहें, लेकिन आज की जिंदगी को इस वायरस ने जिस हद तक बर्बाद किया है उसे देखते हुए, और आज जितनी सावधानी की जरूरत है उसे भी देखते हुए यह अंदाज लगाना जरूरी है कि क्या आज हिंदुस्तान और दुनिया के बाकी देश इस खतरे से जुडऩे के लिए तैयार हैं? जहां तक हिंदुस्तान का सवाल है तो चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश का दौरा करने के बाद जब यह बताया कि कोई भी राजनीतिक दल चुनाव आगे बढ़ाने का हिमायती नहीं है, और चुनाव समय पर होने जा रहे हैं, तो यह बात सदमा पहुंचाने वाली थी। न सिर्फ इसलिए कि राजनीतिक दलों को अभी चुनाव जरूरी लग रहे हैं, बल्कि इसलिए भी कि किसी राजनीतिक दल ने चुनाव आयोग को यह सलाह नहीं दी, उससे यह मांग नहीं की कि चुनावी रैलियों और आम सभाओं पर रोक लगाई जाए ताकि लोगों की जिंदगी बच सके। ऐसा लगता है कि राजनीतिक दलों के नेता जो विशेष विमानों और हेलीकॉप्टरों से चुनाव सभाओं में पहुंचने के आदी हैं, वे खुद तो महफूज सफर करते हैं, लेकिन दूसरों को खतरे में डालने में उन्हें कोई हिचक नहीं है। अभी-अभी क्रिसमस और नए साल का जश्न निकला ही है और लोग खतरे में पड़े हुए हैं, अभी इन दोनों दिनों का सारा असर सामने नहीं आया है, और हिंदुस्तान में कोरोना से संक्रमण के ताजा आंकड़े छलांग लगाकर आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे में नेताओं और राजनीतिक दलों को लाख-लाख लोगों की सभा करने से कोई परहेज नहीं है। और अगर सोशल मीडिया पर आ रही तस्वीरों और खबरों में जरा सी भी सच्चाई है तो पंजाब में कल जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी सभा होनी थी वहां पर नेताओं के मुकाबले जनता अधिक समझदार दिख रही थी और सभा स्थल की तकरीबन तमाम कुर्सियां खाली पड़ी हुई थीं। जनता को इसी तरह की समझदारी बाकी पार्टियों की बाकी प्रदेशों की चुनावी सभा में दिखानी चाहिए ताकि नेताओं को यह समझ में आए कि वे जनता की भीड़ को भेड़-बकरियों की तरह हाँककर कहीं पर इक_ा नहीं कर सकते। लेकिन हम इससे अधिक चर्चा चुनाव को लेकर करना नहीं चाहते हैं क्योंकि चुनाव से परे की भी बहुत सारी बातें हैं।

अब हिंदुस्तान में एक-एक करके तमाम राज्य स्कूल-कॉलेज बंद करते जा रहे हैं क्योंकि स्कूल-कॉलेज के 15 बरस से अधिक के बच्चों को टीका लगना शुरू ही हुआ है और इसके कुछ हफ्ते या कुछ महीने बाद जब दूसरा टीका लगेगा तो उसके करीब महीने भर बाद उन्हें वैक्सीन की हिफाजत मिल सकेगी। आज बिना वैक्सीन वाले बच्चों की भीड़ स्कूल-कॉलेज में लगाने का फैसला तो हो गया था, लेकिन इस देश में जब वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां अपना उत्पादन घटा रही थीं, क्योंकि सरकार ने कोई खरीदी आदेश नहीं दिया था, उस वक्त भी केंद्र सरकार ने स्कूल-कॉलेज के बच्चों की सेहत के लिए उनकी जिंदगी बचाने के लिए ऐसा कोई फैसला नहीं लिया था। और यह फैसला पूरी दुनिया में जब कोरोना वायरस बहुत तेजी से फैलने लगा तब जाकर हिंदुस्तान में लिया गया, और यह स्कूल कॉलेज के बच्चों के लिए बहुत देर से आया। अगले कई महीनों तक इन बच्चों को वैक्सीन की पूरी हिफाजत नहीं मिल सकेगी। ऐसा लगता है कि दूसरी लहर और तीसरी लहर के बीच के दौर में हिंदुस्तान अपनी ही पीठ थपथपाने में इतना मशगूल हो गया था कि उसने यह मान लिया था कि शायद बचे लोगों को टीका लगाने की कोई जरूरत ही नहीं रहेगी।

लेकिन हिंदुस्तान से परे भी देखें तो दुनिया के बहुत सारे देशों में वैक्सीन को लेकर लोगों की हिचकिचाहट और उनका परहेज उन लोगों की जिंदगी खतरे में डाल रहा है जो अपनी नौकरी की मजबूरी के चलते हुए अस्पतालों में काम कर रहे हैं, एंबुलेंस दौड़ा रहे हैं, एयरपोर्ट या दूसरे जनसमुदाय की जगहों पर काम कर रहे हैं। यह सारे लोग खुद वैक्सीन लगवाने के बाद भी उन लोगों का रोज सामना कर रहे हैं जो वैक्सीन ना लगवाने पर अड़े हुए हैं। यह ऐसी खतरनाक और बेइंसाफ नौबत है कि कुछ लोगों की जेब और नालायकी की वजह से बाकी जिम्मेदार लोग खतरा झेल रहे हैं, मारे जा रहे हैं। ब्रिटेन में जहां पर कि लाखों लोगों ने अब तक वैक्सीन लगवाने से मना कर दिया है वहां की हालत यह है कि अस्पतालों की क्षमता चुक चुकी है और वहां अस्पताल कर्मचारी थककर गिर पडऩे की नौबत में आ गए हैं, लेकिन वहां लोग अभी तक वैक्सीन लगवाने से परहेज जारी रखे हुए हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति का दो दिन पहले का यह बयान सामने आया कि किसी भी अमेरिकी के लिए वैक्सीन से परहेज करने का कोई तर्क नहीं रह गया है क्योंकि 1 दिन में 15 लाख से अधिक नए कोरोना पॉजिटिव आये हैं।

लेकिन भारत से परे भी दुनिया के बहुत से ऐसे देश हैं जिनके पास टीके ही नहीं है। ऐसे गरीब देशों का हाल हम पहले भी इस जगह पर लिख चुके हैं लेकिन आज उसे दोहराने की जरूरत है क्योंकि दुनिया के संपन्न देशों का दिल पसीज नहीं रहा है और वे गरीबों को मरने पर छोडक़र अपने लोगों को तीसरा और चौथा वैक्सीन लगाते जा रहे हैं। जबकि डब्ल्यूएचओ लगातार इस बात को बोल रहा है कि दुनिया का कोई हिस्सा अलग से सुरक्षित नहीं किया जा सकता और जब तक पूरी दुनिया को वैक्सीन समानता से नहीं देखा जाएगा तब तक कोरोना वायरस खतरा खत्म नहीं होगा। आज हिंदुस्तान में सरकार का हाल यह है कि वह बाकी दुनिया के मामलों में न कुछ बोलना चाहती और ना शायद उसके पास दखल देने को कुछ है। जबकि हिंदुस्तान के आजाद होने के बाद शुरुआती वर्षों में ही पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का वजन अंतरराष्ट्रीय मामलों में इतना रहता था कि दुनिया के सबसे बड़े और सबसे ताकतवर नेताओं के साथ उनकी कैमरों से परे की दोस्ती थी, और वे हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर अपनी सोच रखते थे, उनमें हिंदुस्तान की तरफ से दखल रखते थे। आज जब दुनिया का एक बड़ा हिस्सा, दर्जनों गरीब देश बिना वैक्सीन के हैं, तो हिंदुस्तान ने बाकी देशों के बीच उनकी जरूरत के लिए जो कुछ कोशिश करनी चाहिए थी, वह कहीं दिखाई भी नहीं पड़ रही। कोरोना के इस खतरे ने बहुत तरह की बातों पर सोचने के लिए मजबूर किया है इसलिए आज हम यहां दो-तीन एक-दूसरे से अलग-अलग, लेकिन एक किस्म से जुड़ी हुई बातों को रख रहे हैं कि लोग इनके बारे में सोचें। अगर हिंदुस्तान में खतरा अधिक बढ़ता है, मौतें अधिक बढ़ती हैं, तो उसके बाद अगर यह सोचा जाएगा कि 15 बरस से नीचे की आबादी को टीके, या बाकी आबादी में से बचे हुए लोगों को दूसरा डोज, यह सब लेट क्यों हो रहा है तो वह मौत के बाद का विचार-विमर्श होगा। आज खुलकर इस बारे में बात होनी चाहिए कि अलग-अलग प्रदेशों की रोज की टीकाकरण की क्षमता कितनी है और कितने टीके लगाए जा रहे हैं।
(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

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