विचार / लेख

लाभार्थी कप्तान
10-Jan-2022 12:34 PM (54)
लाभार्थी कप्तान

-प्रकाश दुबे

मकर संक्रांति में महाराष्ट्र में कहा जाता है-तिल गुड़ घ्या आणि गोड़ गोड़ बोला। महाराष्ट्र की राह पर पंजाब चले, जरूरी तो नहीं। इसके बावजूद प्रधानमंत्री ने कुरुक्षेत्र का मैदान पार करते हुए राजधानी इंद्रप्रस्थ पहुंचने से पहले मुख्यमंत्री को धन्यवाद दिया। कुछ लोगों की धारणा है कि प्रधानमंत्री ने लाभार्थी के रूप में धन्यवाद दिया। घटनाक्रम का उन्हें जबर्दस्त लाभ मिला। पतंगबाजी का मौसम है। सोशल मीडिया पर हमेशा आकाश से अधिक पतंगबाजी जारी रहती है। सीमा से सटी 50 किलोमीटर की सीमा की निगरानी केन्द्रीय एजेंसी सीमा सुरक्षा बल को सौंपी जा चुकी है। केन्द्रीय गृहमंत्री तक आरोप के छींटे नहीं पहुंचे। कुछ लोगों ने आस लगा रखी थी कि विपक्ष को इसका लाभ मिलेगा। उनकी पतंग सद्दी से कट गई। पूरी वारदात के असली लाभार्थी कैप्टन अमरिंदर सिंह हैं। सौ से कम लोगों के समुदाय को संबोधित करने में कैप्टन को इन दिनों झिझक नहीं होती। दो बड़ों ने कैप्टन से यह भी नहीं पूछा-महाबली दर्शक सेना कहां दुबक कर रह गई?    

उत्तरायण प्रदेश

गुजरात में संक्रांति को उत्तरायण के नाम से जाना जाता है। उत्तरायण को शुभकाल का आरंभ मानते हैं। भला हो, बाबा विश्वनाथ का, जिनकी कृपा से लंबी प्रतीक्षा के बाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय को कुलपति मिला। पहले वहां एनी बेसेंट ने सेंट्रल हिंदू स्कूल आरंभ किया था। महामना मालवीय ने साल 1916 में बीएचयू की स्थापना की। दो बड़ों के राज्य तथा केन्द्रीय गृहमंत्री के संसदीय क्षेत्र गांधीनगर में प्रो सुधीर कुमार जैन तीन बार आईआईटी के निदेशक रह चुके हैं। उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति ने 13 नवम्बर 2020 को की थी। ग्रहस्थिति ऐसी बनी कि काशी में एक सप्ताह तपस्या करने के बावजूद बिना प्रभार संभाले लौटना पड़ा। चुनाव घोषणा वाले दिन उत्तर प्रदेश के दो अफसरों ने चुनाव लडऩे के लिए नौकरी छोड़ी। एक ईडी वाले दूसरे कानपुर के पुलिस आयुक्त। दो दिन पहले प्रो. जैन ने कुलपति पद संभाला। प्रो. जैन ने अनर्थ टालने वाले शिव की पूजा की। माथे पर चंदन तिलक-त्रिपुंड और गले में माला शोभित थी। वैज्ञानिक कुलपति की मेज पर गंगाजल के बजाय सेनेटाइजर की बोतल अवश्य मौजूद थी।

कानूनन कोताही
विधि और न्याय मंत्री किरण रिजिजू चकित होंगे। चीन उनके राज्य को अपना मानते हुए नामकरण कर रहा है। बिल्कुल बाबा योगी आदित्यनाथ की शैली में नाम बदले जा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने खुश होकर पद और मंत्रालय में महत्ता बढ़ा दी। संसद चले या न चले, उनके मंत्रालय के कामकाज में रोक टोंक नहीं हुई। ऊपर वाला छप्पर फाडक़र देने लगता है, तब यही माना जाता है कि ग्रह अनुकूल हैं। किसी ने अब तक अरुण जेटली जैसा  तुनुकमिजाज नहीं कहा और न रविशंकर प्रसाद वाली फब्तियां उनके नाम के साथ जोड़ी गईं। सुप्रीम कोर्ट के कई पद भरे गए। चार महिलाएं शीर्ष अदालत में शामिल हैं। देश के हृदय मध्यप्रदेश की हालत भर नहीं सुधरी। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में 53 न्यायाधीश होने चाहिए। हैं मात्र तीस। जबलपुर में हाइकोर्ट है। इंदौर और ग्वालियर की खंडपीठ में दस दस न्यायाधीश भी उपलब्ध नहीं हैं। दिल और दिमाग में यही अंतर है। मंत्री बनने के लिए संसद जाना हो तो दिल का दरवाजा खुला है। दिमागी फैसले में मध्यप्रदेश पिछड़ा राज्य है।

रपट पड़े तो हर गंगे
रपट पड़े तो हर गंगे उक्ति का मतलब सुविज्ञ पाठक भली भांति जानते हैं। सरल तरीके से उदाहरण समेत समझें। गलत अवसर को भुना लेने का कौशल बिना सीखे आता है। अंगरेजी में कहें तो इनबिल्ट होता है। अखिलेश यादव हमारी राय से असहमत हैं। कम उम्र में मुख्यमंत्री बनने वाले अखिलेश मानते हैं कि कमजोरी छिपाने का लाभ नहीं है। सच स्वीकारो। झारखंड के कोडरमा में अखिलेश चुनाव प्रचार करने गए। घंटे भर की प्रतीक्षा के बावजूद भीड़ नहीं जुटी। आयोजक प्रतीक्षा करने का अनुरोध कर रहे थे। अखिलेश ने आव देखा न ताव। जा पहुंचे सभास्थल। कुल जमा 27 श्रोताओं और बाकी दर्जन भर पार्टीजनों की मौजूदगी में भाषण पेल दिया। उत्तर प्रदेश के चुनाव के दौरान अखिलेश ने यह किस्सा स्वयं बताया। उनकी सभा में इन दिनों भारी भीड़ होती है। ओहदे के मुताबिक प्रधानमंत्री के सत्तर से अखिलेश के 27 और बहुत अधिक हैं।  
  (लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

 

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