संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : अब तो जानवरों को गाली देना बंद करो, वे ही जिन्दा रखेंगे...
11-Jan-2022 12:43 PM (111)
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  अब तो जानवरों को गाली देना बंद करो, वे ही जिन्दा रखेंगे...

ऐसा लगता है कि इंसानों को अपनी गालियों में कुछ फेरबदल करना होगा। खासकर दुनिया के बहुत से ऐसे देशों में जहां पर सूअर को एक गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है, या बहुत से ऐसे धर्मों में जहां उसे अपवित्र जानवर माना जाता है। इसकी वजह कोई बहुत ताजा नहीं है बल्कि बरसों से यह दिख रहा था कि ऐसी एक नौबत आ सकती है। और अभी अमेरिका में 7 घंटे चली एक हार्ट सर्जरी के बाद एक इंसान को सूअर का दिल लगाया गया है। इस सूअर को इंसान के हिसाब से, या खासकर इस मरीज के हिसाब से जेनेटिकली मॉडिफाई किया गया था ताकि उसके अंग इंसान के शरीर से एकदम से खारिज न हो जाएं। यह बरसों पहले से समझ आ रहा था कि सूअर मेडिकल साइंस की और इंसानों की एक बड़ी उम्मीद है। उसके शरीर की रचना और उसके अंग इंसानों के शरीर में लगाने के लिए किसी भी दूसरे प्राणी के मुकाबले अधिक मिलते-जुलते हैं। इसके पहले से भी सूअर के हार्ट के वॉल्व का इस्तेमाल इंसानों में होते आया है और पिछले बरस सूअर की किडनी भी एक इंसान में लगाई गई थी। अब जानवरों के अंग इंसानों में लगाने के लिए विकसित देशों में कई किस्म के प्रतिबंध हैं, लेकिन अभी का यह ताजा ऑपरेशन अमेरिकी सरकार से मिली हुई एक विशेष छूट के तहत किया गया था क्योंकि इस मरीज के बचने का और कोई भी जरिया नहीं था। अब दुनिया के जिन देशों में लोग सूअर को गाली की तरह मानते हैं, उसे एक गंदा जानवर मानते हैं, उन्हें अपनी बात पर, अपनी अपनी सोच पर फिर से सोचना होगा।

लेकिन यह कैसी अजीब बात है कि आज जो कुछ हो रहा है इसे विज्ञान कथाओं ने 20-25 बरस पहले सोचकर उस पर कामयाब उपन्यास लिख डाले थे। विज्ञान कथा लेखक रॉबिन कुक ने इसी विषय पर, और जेनेटिकली मॉडिफाइड जानवरों के अंग इंसानों में लगाने पर, एक बहुत लंबी अपराध कथा लिखी थी। अब धीरे-धीरे इंसानों को बचाने वाले दूसरे जानवरों के बारे में भी सोचने की जरूरत है कि क्या उन्हें गालियों की तरह इस्तेमाल करना बंद करना चाहिए? जानवर तो इंसानों का इस्तेमाल अपने इलाज के लिए नहीं करते, लेकिन इंसानों की डायबिटीज की दवा इंसुलिन एक वक्त जानवरों के बदन से निकल कर आती थी। और भी बहुत सारी दवाइयां बनाने में प्रयोगशाला में जानवरों पर उनका पहला प्रयोग होता है, और बहुत से जानवरों की शहादत के बाद ही वे इंसानों के काम के लायक बनती हैं। इसलिए दवाओं से लेकर कॉस्मेटिक तक, इंसानों तक पहुंचने के पहले जानवरों की लंबी शहादत मांगते हैं। लोग अपने चेहरे पर जो पाउडर-लिपस्टिक लगाते हैं, उसके लिए भी उन्हें जानवरों का एहसानमंद होना चाहिए कि उन्होंने अपनी जिंदगी देकर इन चीजों को इंसानी उपयोग के लायक सुरक्षित साबित किया है।

अभी इस बरस जानवरों से निकाली गई इंसुलिन के इंसानों में इस्तेमाल को 100 बरस पूरे हो रहे हैं। 1922 में पहली बार कनाडा में 14 बरस के एक डायबिटिक लडक़े को जानवरों से निकाली गई इंसुलिन लगाई गई थी, और तब से अब तक जानवर इंसानों को बचाने के काम आ ही रहे हैं। आज जब कई किस्म के इन्सुलिन बाजार में हैं, तब भी ब्रिटेन में जानवरों से निकाली गई इंसुलिन अभी भी बाजार में है, और डॉक्टरी पर्चे पर उसे डायबिटीज के मरीज हासिल कर सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इंसुलिन का यह पूरा इतिहास गाय-बछड़ों और सूअर से निकाली गई इंसुलिन से भरा हुआ है, और ये दोनों ही जानवर दुनिया के कुछ धर्मों में सबसे अधिक पवित्र, और सबसे अधिक अपवित्र माने जाते हैं। लेकिन हिंदुओं से लेकर मुस्लिम तक, जाने कितने लोगों की जान ऐसी जानवरों से निकाली गई इंसुलिन से बची होगी। इसलिए इंसान को एहसानफरामोश होना बंद करना चाहिए। जानवर इंसानों के पूरे इतिहास में अपना दूध, मांस, और अपनी खाल, यह सब देते आए हैं, और जानवरों के बिना मानव जाति के विकास का इतिहास अधूरा ही रह गया होता। दुनिया के बड़े-बड़े ऐसे हिस्से हैं जहां पर जानवरों को खाने के अलावा इंसानों के पास खाने को कुछ भी नहीं रहता, और सिर्फ जानवरों को खा-खाकर लोग हजारों साल से आगे बढ़ते आए हैं। वे जानवरों की खींची गाडिय़ों से आगे बढ़ते आए हैं, वे जानवरों के खींचे हल से खेत जोतकर खेती सीखते आए हैं। इंसानों की पूरी जिंदगी जानवरों की शहादत के इतिहास से भरी हुई है, लेकिन दुनिया की बहुत सी भाषाओं में जानवरों का इस्तेमाल गालियों के लिए, हिकारत के लिए होता है, जो कि यह बताता है कि अपने खुद के अस्तित्व को बचाने वाले इन प्राणियों के खिलाफ उसकी सोच किस तरह उसे एहसानफरामोश साबित करती है। अब जब लोगों को सूअर के बदन के हिस्से लगवाकर जान बचाने की एक गुंजाइश देख रही है, तब तो कम से कम भाषा की हिंसा खत्म होनी चाहिए और लोगों को जानवरों के उपकार को मानना शुरू करना चाहिए।
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