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अल ज़वाहिरी की मौत से क्या ख़त्म हो गया है अल क़ायदा का ख़तरा?
05-Aug-2022 7:11 PM
अल ज़वाहिरी की मौत से क्या ख़त्म हो गया है अल क़ायदा का ख़तरा?

-फ़्रैंक गार्डनर

पिछले रविवार को अल-क़ायदा नेता अल-ज़वाहिरी की अचानक, मगर पूरी तरह से अप्रत्याशित नहीं, मौत के बाद एक सवाल जो सीधे-सीधे खड़ा होता है, कि उनके संगठन का क्या होगा? बल्कि, सवाल ये है कि अल-क़ायदा है क्या, और मौजूदा समय में इसकी प्रासंगिकता बची भी है या नहीं?

अरबी में अल-क़ायदा का अर्थ है ''बुनियाद''. यह एक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन है जो दुनिया भर में पश्चिमी हितों के ख़िलाफ काम करता है.

एशिया और अफ़्रीका की वो सरकारें, जो पश्चिमी देशों के क़रीब हैं और जिन्हें अल-क़ायदा ''कम इस्लामिक'' मानता है, वहां की सरकारों को प्रभावित करना भी अल-क़ायदा के महत्वपूर्ण एजेंडों में एक है.

कब हुई अल-क़ायदा की स्थापना?

अल-क़ायदा की स्थापना 1980 के दशक के अंत में अफ़गान-पाकिस्तानी सीमावर्ती इलाकों में हुई थी. इस दौरान अफ़गानिस्तान पर सोवियत संघ का कब्ज़ा था. कई संगठन सोवियत संघ के ख़िलाफ़ काम कर रहे थे. अरबी मुजाहिदीन भी इनमें एक था. अरबी मुजाहिदीन के ही बचे कुछ सैनिकों ने इस संगठन की नींव रखी.

केवल एक पीढ़ी पहले तक, अल-क़ायदा पूरी दुनिया के घरों में एक जाना-पहचाना नाम था और इसे पश्चिमी देशों की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा माना जाता था.

लेकिन क्यों? क्योंकि तब अल-क़ायदा ने एक-के-बाद-एक कई हमले किए थे जिसके बाद बहुत से लोगों को इसने संगठन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया.

1998 में अल-क़ायदा ने केन्या और तंज़ानिया में अमेरिका के दूतावासों पर एक साथ बमबारी की, जिसमें ज़्यादातर अफ़्रीकी नागरिक मारे गए.

साल 2000 में अल-क़ायदा ने यमन के अदन बंदरगाह में भारी विस्फोटकों से लदी अमरीकी पोत ''यूएसएस कोल'' को रौंद दिया. इस हमले में 17 नाविकों की मौत हो गई और अरबों-डॉलर का युद्धपोत बर्बाद हो गया.

फिर आया 9/11, जिसने अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश को दहला दिया. इस घटना के बाद ''दुनिया हमेशा के लिए बदल गई''.

महीनों की गुप्त योजना के बाद, अल-क़ायदा के लोगों ने अमेरिका के चार विमानों का अपहरण कर लिया. इनमें दो बोस्टन, एक वाशिंगटन डीसी और एक ने नेवार्क से कैलिफोर्निया के लिए उड़ान भरी थी.

आतंकियों ने इनमें दो विमानों के ज़रिये न्यूयॉर्क के प्रतिष्ठित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला कर दिया.

इसके बाद इमारत आग की लपटों से ढक गया और थोड़ी ही देर में धूल बनकर ढह गया.

उन्होंने अगला निशाना अमेरिकी रक्षा विभाग के मुख्यालय पेंटागन को बनाया. तीसरा विमान सीधे इस इमारत से टकराया.

जबकि चौथे विमान में यात्री अपहर्ताओं से भिड़ गए, उनके बीच संघर्ष हुआ और विमान एक खेत में गिर गया. विमान में बैठे सभी यात्री और चरमपंथी मारे गए.

9/11 हमले में लगभग 3,000 लोग मारे गए थे.

अमेरिका पर अब तक का यह सबसे भीषण आतंकवादी हमला था. इस हमले ने ही अमेरिका के दो दशकों तक चली ''आतंक के विरुद्ध युद्ध'' मिशन की नींव रखी.

9/11 की पूरी साज़िश और योजना अल-क़ायदा ने अपने ठिकानों से बनाई थी, जो अफ़ग़ानिस्तान के पहाड़ों पर थी. यहां उन्हें तालिबान ने आश्रय दिया था.

तो अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण किया. दोनों ही देशों के सैनिकों ने तालिबान को हटाया और अल-क़ायदा को खदेड़ दिया.

फिर अल-क़ायदा नेता, ओसामा बिन लादेन का पता लगाने और उसे मारने में अमेरिका को 10 साल और लग गए.

तो उसके बाद से अब तक क्या हुआ?

अब किस हाल में है अल-क़ायदा ?
ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद, उसकी जगह ली उसके पुराने मेंटर डॉक्टर अयमन अल-ज़वाहिरी ने. वही अल-ज़वाहिरी, जिसे इसी हफ़्ते सीआईए ड्रोन हमले में मार गिराया गया. मिस्र के आँखों के सर्जन अल ज़वाहिरी को किताबी कीड़ा बताया जाता था जिसकी आँखों पर बड़ी फ्रेम वाला चश्मा होता था.

युवा जिहादियों के बीच लादेन को लेकर एक अलग तरह का पागलपन था. ये पागलपन कभी भी ज़वाहिरी को लेकर नहीं नज़र आई. 11 साल के नेतृत्व में ज़वाहिरी हिंसक मानसिकता वाले नौजवान जिहादियों के बीच वो जगह स्थापित नहीं हो सकी, जो ओसामा बिन लादेन ने बनाई थी.

अल-ज़वाहिरी के वीडियो संदेश, जो हमेशा पश्चिम और उसके सहयोगियों पर हमलों का आह्वान करते थे, काफ़ी लंबे और उबाऊ होते थे. उनकी कोई सामूहिक अपील नहीं थी.

लंबे समय पहले ही एक नए अति-हिंसक समूह, जो ख़ुद को इस्लामिक स्टेट, या आईसिस कहता था, ने अल-क़ायदा को अलग-थलग करना शुरू कर दिया था. नए हमलों के लिए बेसब्र युवा जिहादी अल-क़ायदा के नेतृत्व का मजाक उड़ाते थे और कहते थे कि अल-क़ायदा केवल बातें करता है, बल्कि आईसिस एक्शन ले रहा है.

आतंकवाद पर एक हद तक सफ़ल नियंत्रण

9/11 हमला अमेरिकी ख़ुफिया विभाग की एक बड़ी विफलता थी.

अमेरिका की तरफ़ से सुरागों की अनदेखी के बावजूद, हमले आंशिक रूप से सफल हुए क्योंकि सीआईए और एफ़बीआई के बीच सामंजस्य की कमी थी. सीआईए न एफ़बीआई के साथ अपने इनपुट साझा कर रहा था, न एफ़बीआई सीआईए के साथ.

हालांकि अब यह बदल गया है. अमेरिका और पश्चिमी खुफ़िया एजेंसियां अब पहले से ज़्यादा सूचित हैं, वे अधिक सहयोग करती हैं और अल-क़ायदा और आईएसआईएस के अंदर से मुख़बिरों की भर्ती ने आतंकवादी हमलों को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया है.

लेकिन पिछले साल अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी और पश्चिमी देशों की अराजक रुख़सत ने एक बार फिर से अल-क़ायदा की वापसी के दरवाज़े खोल दिए हैं.

ये तथ्य अपने आप में चिंता बढ़ाने वाला है कि अल-ज़वाहिरी तालिबानी नेतृत्व के क़रीब काबुल के एक ''सेफ़ हाउस'' में रह रहा था. ये दिखाता है कि तालिबान के भीतर कट्टर जिहादी मानसिकता वाले लोग अल-क़ायदा से अपने संबंध बनाए रखना चाहते हैं.

अल-क़ायदा के लिए अफ़ग़ानिस्तान का विशेष महत्व है.

1980 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान पर अपना कब्ज़ा जमा चुके सोवियत संघ के ख़िलाफ़ जवान, रईस और आदर्शवादी ओसामा बिन लादेन ने अपने परिवार के इंजीनियरिंग कौशल का इस्तेमाल कर सोवियत सेना से लड़ने के लिए गुफ़ाओं में मोर्चा बनाया.

साल 1996-2001 के बीच, वो यहीं तालिबान के संरक्षण में पांच साल तक रहा और यहीं अल-क़ायदा अब दोबारा अपने पैर पसारना चाहता है.

जहां कभी अल-क़ायदा भौगोलिक रूप से छोटा, केंद्रित और सीमित संगठन था, वहीं आज ये एक ऐसा वैश्विक संगठन बन गया है जिसके अनुयायी दुनिया के हर कोने में मिल जाते हैं. ज़्यादातर अनियंत्रित या बुरी तरह शासित जगहों पर.

उदाहरण के लिए सोमालिया में अल-कायदा से संबद्ध रखने वाला "अल-शबाब" सबसे प्रमुख जिहादी समूह बना हुआ है.

अफ़्रीका अल-कायदा और आईएस जैसे जिहादी समूहों के लिए नए युद्ध के मैदान के रूप में उभरा है, विशेष रूप से उत्तर पश्चिम अफ्रीका में साहेल के आसपास के क्षेत्र.

वे केवल ऐसी सरकारों को गिराने के ख़िलाफ़ नहीं काम कर रहे, जिसे वे ''धर्म त्यागी'' मानते हैं, बल्कि वे एक-दूसरे से लड़ रहे हैं,और इस संघर्ष में नागरिक पिस रहे हैं.

अल-क़ायदा अभी भी मध्य पूर्व का ही एक आतंकी समूह है.

बिन लादेन सऊदी अरब का था, अल-ज़वाहिरी मिस्र का, और इसके वरिष्ठ नेताओं में लगभग सभी अरबी हैं.

पश्चिमोत्तर सीरिया में अल-क़ायदा की एक महत्वपूर्ण उपस्थिति है, जहाँ अमेरिका ड्रोन हमले और विशेष बलों के ज़रिए समय-समय पर इनके संदिग्ध ठिकानों पर हमला करता रहता है.

अल-ज़वाहिरी की मौत के बाद, अल-क़ायदा अब एक नए नेता और नई रणनीति के साथ फिर से पाँव जमाने का फैसला कर सकता है.

ऐसे कोई मूर्ख ख़ुफिया एजेंसी ही होगी जो इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इस गुट का ख़तरा अल-ज़वाहिरी की मौत के साथ ही ख़त्म हो गया. (bbc.com)

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