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बुकर पुरस्कार
15-Sep-2022 10:57 AM
बुकर पुरस्कार

बुकर पुरस्कार को साहित्य का ऑस्कर माना जाता है।  इसमें 50 हजार पाउंड की राशि दी जाती है। इसके लिए पहले उपन्यासों की एक लंबी सूची तैयार की जाती है फिर पुरस्कार वाले दिन की शाम के भोज में विजेता की घोषणा की जाती है।

भारती मूल के कई साहित्यकारों को यह सम्मान प्राप्त हो चुका है। इनमें शामिल हैं- सलमान रश्दी। विवादास्पद लेखक सलमान रश्दी न केवल चार बार बुकर के लिए चुने गए हैं बल्कि उन्होंने बुकर ऑफ बुकर्स और द बेस्ट ऑफ द बुकर भी जीता है। पहली बार 1981 में उन्हें उनके उपन्यास मिड नाईट चिल्ड्रेन पर बुकर पुरस्कार मिला। रश्दी की 1988 में लिखी गई किताब द सैटेनिक वर्सेस काफी विवादास्पद रही थी। इसे लेकर उनके खिलाफ फतवा भी जारी किया गया। इसे 1993 में बुकर की 25 वीं सालगिरह पर विशेष पुरस्कार के लिए चुना गया था।

 अरुंधति रॉय को अपने पहले ही उपन्यास द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स के लिए 1997 में बुकर पुरस्कार मिला। यह उपन्यास जुड़वां भाई-बहनों के जरिए समाज और राजनीति के कई पहलुओं की पड़ताल करता है। शिलौंग में 24 नवंबर 1961 को जन्मी अरुंधति राय ने अपने जीवन के शुरुआती दिन केरल में गुजारे। उसके बाद उन्होंने आर्किटेक्ट की पढ़ाई दिल्ली से की। मैसी साहब फिल्म में उन्होंने अभिनय किया। उन्होंने कई फिल्मों के लिए पटकथाएं भी लिखीं हैं। वे अपनी तीखी राजनीतिक टिप्पणियों के लिए भी जानी जाती हैं। नर्मदा आंदोलन से वे सीधे तौर पर जुड़ीं। माओवाद को लेकर अपने कमेंट से भी वे विवाद में रहीं।

 किरण देसाई ने अपने दूसरे उपन्यास द इन्हेरिटेंस ऑफ लॉस के लिए 2006 में बुकर पुरस्कार जीता। इस उपन्यास में ग्लोबलाइजेशन को लेकर निराशा और भारतीय ग्रामीण जीवन में मौजूद आत्मीयता की कहानी है। इसे पुरस्कृत करते हुए निर्णायकों ने इसे मानवीय संवेदना और सोच को उजागर करने वाली महत्वपूर्ण किताब बताया। उन्होंने राजनीतिक बारीकियों पर प्रकाश डालने की इसकी विशेषता की भी चर्चा की। जबकि समीक्षकों ने किरण की इस किताब को मजेदार और पारिवारिक आख्यान करार दिया। किरण देसाई भारतीय मूल की जानी-मानी लेखिका अनीता देसाई की पुत्री हैं।

 इसके अलावा चेन्नई के रहने वाले अरविंद अडिगा को उनके पहले उपन्यास द व्हाइट टाइगर के लिए वर्ष 2008 में बुकर पुरस्कार मिला। इस उपन्यास में भूमंडलीकृत विश्व में भारत के विभिन्न वर्गों के आत्मसंघर्ष को रोचक रूप में व्यक्त किया गया है। इस उपन्यास ने अडिगा को बुकर पुरस्कार प्राप्त करने वाला दूसरा सबसे छोटा लेखक बनाया। वे चौथे ऐसे लेखक थे जिन्हें अपने पहले उपन्यास के लिए ही बुकर पुरस्कार मिला। इसमें एक ऐसे व्यक्ति को दिखाया गया है जो शीर्ष पर जाने के लिए किसी भी रास्ते को गलत नहीं मानता है। उपन्यास की कहानी उसके मुख्य पात्र बलराम हलवाई के आसपास घूमती है जो गरीबी से छुटकारा पाने का सपना देखता है और यह सपना उसे दिल्ली और बेंगलुरु की यात्रा करा देता है।

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