संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : मुस्लिम छात्र को कसाब कहने वाले प्रोफेसर को कैद जरूर होनी चाहिए..
02-Dec-2022 4:12 PM
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :   मुस्लिम छात्र को कसाब  कहने वाले प्रोफेसर को कैद जरूर होनी चाहिए..

देश के एक सबसे बड़े निजी विश्वविद्यालय, कर्नाटक के मणिपाल विश्वविद्यालय में एक छात्र के कड़े विरोध के बाद उसका वीडियो चारों तरफ फैलने के दबाव में विश्वविद्यालय ने उस प्रोफेसर के खिलाफ जांच शुरू की है जिसने क्लास में एक मुस्लिम छात्र को मुम्बई हमले के आतंकी कसाब के नाम से बुलाया था। जो वीडियो बाहर आया है उसमें यह छात्र बहुत खुलकर प्रोफेसर का विरोध कर रहा है कि वे उसे एक आतंकी के नाम से कैसे बुला सकते हैं? उसने कहा कि इस देश में मुसलमान होना, और यह सब हर रोज झेलना मजाक नहीं है। उसने प्रोफेसर से भरी क्लास में कहा कि वे उसके धर्म का मजाक नहीं उड़ा सकते, उसे आतंकी नहीं कह सकते, और उसकी आस्था का अपमान नहीं कर सकते। जाहिर तौर पर एक कॉलेज की इस भरी क्लास में कोई भी दूसरे छात्र-छात्रा इस लडक़े का साथ देते नहीं दिखते, और प्रोफेसर का विरोध करते सुनाई नहीं पड़ते। यह तो साफ है ही कि इंजीनियरिंग कॉलेज में पहुंचने की वजह से ये सारे के सारे छात्र-छात्राएं इस देश के मतदाता हैं, और उनकी जागरूकता और जवाबदेही का हाल यह है कि एक प्रोफेसर की ऐसी घोर साम्प्रदायिक बात का भी वे कोई विरोध नहीं करते। इस देश की हकीकत यही रह गई है कि लोगों में सार्वजनिक, सामूहिक, और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना खत्म हो चुकी है। अगर क्लासरूम का यह पूरा मामला वीडियो रिकॉर्ड नहीं किया होता, तो यह बात भी आई-गई हो जाती, लेकिन यह वीडियो सामने आने के बाद इस प्रोफेसर को जिस तरह धिक्कारा जा रहा है, और विश्वविद्यालय जिस बुरी कानूनी नौबत में फंसा है, उस वजह से इस प्रोफेसर को काम से अलग करके उसके खिलाफ जांच शुरू करने की बात कही गई है। 

कोई भी जिम्मेदार हिन्दुस्तानी इस बात से इंकार नहीं करेंगे कि इस देश में आज मुस्लिमों का, दलितों और आदिवासियों का बराबरी से जीना नामुमकिन हो चुका है। चारों तरफ ताकतवर लोग दबंगता से नफरत फैलाने में लगे हुए हैं। आज जब हम इस बात को लिख रहे हैं, तो ठीक उसी वक्त सोशल मीडिया पर फैले अपने एक वीडियो की वजह से अभिनेता और बीजेपी नेता, भूतपूर्व सांसद परेश रावल अपने बयान पर माफी मांग रहे हैं जिसमें उन्होंने गुजरात की चुनावी सभा में मंच से कहा था कि अगर दिल्ली की तरह रोहिंग्या शरणार्थी और बांग्लादेशी आपके पड़ोस में आकर रहने लगेंगे, तो क्या बंगालियों के लिए मछली पकाओगे? जाहिर है कि गुजरात में हमलावर तेवरों के साथ भाजपा को चुनौती देते हुए दिल्ली के आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के प्रदेश का जिक्र करते हुए परेश रावल वोटरों को पड़ोसी देशों के मुस्लिम शरणार्थियों की दहशत दिला रहे थे, और नफरत पैदा कर रहे थे। यही परेश रावल सांसद भी रह चुके हैं, उन्हें सरकार ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का चेयरपर्सन भी बनाया था, और वे भाजपा के एक बड़े नेता हैं, उन्हें नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही पद्मश्री से सम्मानित किया था। परेश रावल मुम्बई में पैदा और बड़े हुए, लेकिन साम्प्रदायिकता से फिर भी नहीं उबर पाए। 

साम्प्रदायिक नफरत को हिन्दुस्तान में एक नवसामान्य दर्जा हासिल हो गया है। कर्नाटक जैसे विकसित राज्य में मणिपाल जैसी अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संस्था में एक प्रोफेसर को अगर मुस्लिम छात्र को कसाब कहकर बुलाना सूझ रहा है, तो इसका मतलब है कि पढ़ाई-लिखाई से लोगों की समझ का कुछ खास लेना-देना नहीं रह गया है। वे पढ़े-लिखे मूर्ख हैं, नफरतजीवी भी हैं, साम्प्रदायिक भी हैं, और परले दर्जे के गैरजिम्मेदार भी हैं। हमारा ख्याल है कि इस प्रोफेसर को कड़ी सजा मिलनी चाहिए, ताकि यह हिन्दुस्तान के बाकी लोगों के लिए एक मिसाल भी रहे। बहुत से लोगों को यह बात अभी याद नहीं होगी कि जब इंदिरा गांधी को उनके एक सिक्ख अंगरक्षक ने मार दिया था, तो उसके बाद देश भर में सिक्ख विरोधी दंगे भडक़ गए थे, और जगह-जगह सिक्खों को अपमानजनक तरीके से आतंकी या खाडक़ू कहा जाता था। देश को उस तनाव और नफरत से उबरने में खासा वक्त लगा था, और यह बात सिर्फ सिक्ख समुदाय के लोग ही समझ सकते हैं कि उस तनाव और अपमान के बीच वे किस तरह जीते थे। आजादी के करीब चालीस बरस बाद जिस तरह इस देश में सिक्ख विरोधी दंगे हुए थे, वे देश के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने लायक थे, और सिक्ख कौम की बहादुरी की अनगिनत मिसालों और कहानियों ने उस नौबत को सुधारने में मदद की थी। आज हिन्दुस्तान में बात-बात में मुसलमानों को बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोड़ा जा रहा है, और एक मुस्लिम हत्यारा किसी हिन्दू लडक़ी को बर्बर तरीके से अगर काट डालता है, तो उसे पूरे मुस्लिम समाज का प्रतिनिधि सा बनाकर पेश किया जा रहा है, ताकि मुस्लिमों के खिलाफ एक नफरत फैल सके। 

दुनिया में नफरत की बातें पूरी तरह से खत्म करने की ताकत विकसित लोकतंत्रों में भी नहीं हैं। अभी दो दिन पहले ब्रिटिश राजघराने का एक मामला सामने आया है जिसमें राजपरिवार की एक अधिकारी ने अफ्रीकी मूल की ब्रिटेन में पैदा हुई एक महिला से लंबी पूछताछ में जिस अपमानजनक तरीके से बातचीत की थी, उसे खुद राजपरिवार को खारिज करना पड़ा, और उसके लिए बहुत अफसोस जाहिर करना पड़ा। जब यह शिकायत सार्वजनिक हुई तो राजघराने ने एक अभूतपूर्व बदनामी झेली और यह माना कि यह बर्ताव बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। इस अफसोस के साथ-साथ राजघराने ने अपनी इस अफसर का इस्तीफा भी ले लिया। यह महिला 1960 से राजघराने के लिए काम कर रही थी, और महारानी एलिजाबेथ के साथ भी आधी सदी से काम किया था। उसने अपने बर्ताव पर माफी मांगी है, और शाही ड्यूटी से इस्तीफा दे दिया है। 

दुनिया में कोई लोकतंत्र महज लगातार चुनाव करवाने की वजह से महान नहीं हो जाते। लोकतंत्र में महानता गौरवशाली परंपराओं से आती है, समानता और इंसाफ से आती है। यह एक अलग बात है कि लोकतंत्र एक चुनाव प्रणाली के रूप में हिन्दुस्तान की तरह का गैरजिम्मेदार और संवेदनाशून्य समाज भी बना सकता है। आज हिन्दुस्तान में जिस तरह राष्ट्रीय चुनावों की जगह एक धार्मिक जनगणना ने ले ली है, उसने इस देश की लोकतांत्रिक सभ्यता के विकास को दशकों पीछे धकेल दिया है। संवैधानिक संस्थाओं और कड़े कानूनों के बावजूद आज नफरतजीवी लोग अपनी अतिसक्रियता के साथ अपने को इस देश में पूरी तरह महफूज महसूस करते हैं। नफरत को आज कोई खतरा नहीं है, और मोहब्बत को पीटने के लिए बाग-बगीचों में भी लगातार लाठियां लेकर तैनात रहते हैं, सडक़ों पर इन डंडों पर झंडे लगा लेते हैं, और सोशल मीडिया पर नफरत का लावा सा उगलते रहते हैं। हिन्दुस्तानी लोकतंत्र, यहां की संवैधानिक संस्थाओं, इन सबने इस नवसामान्य को पूरी तरह मंजूर कर लिया है। लेकिन हम इसे अपनी जिम्मेदारी समझते हैं कि इसके खतरों को गिनाते चलें। लोगों को यह समझना होगा कि यह सभ्यता के विकास की राह नहीं है, उसके विनाश की राह है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

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