संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 6 नवम्बर : छत्तिसगढिय़ा सबले बढिय़ा

Posted Date : 06-Nov-2018



छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान, इन तीन राज्यों के चुनावों में राजनीतिक मिजाज कुछ-कुछ एक सा रहता है, और कुछ-कुछ अलग-अलग भी। चूंकि इन तीनों जगहों पर मोटे तौर पर दो ही राष्ट्रीय पार्टियों में मुकाबला रहता है इसलिए उनकी संस्कृति कुछ हद तक तो हावी रहती है, और कुछ हद तक चीजों को काबू भी रखती है। इन तीनों राज्यों में छत्तीसगढ़ सबसे बेहतर इसलिए है कि यहां साम्प्रदायिकता की जगह नहीं है, मंदिर-मस्जिद जैसे भावनात्मक और भड़काऊ मुद्दे नहीं हैं, जाति के आरक्षण के हिंसक आंदोलन नहीं हैं, और राजनीति जातियों की उस किस्म की गुलाम नहीं है जैसी राजस्थान या मध्यप्रदेश में है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति कम हिंसक प्रचार देखती है, और इसके पीछे की वजहों को समझने की जरूरत है। 
राजस्थान और मध्यप्रदेश के मुकाबले यह राज्य जंगलों में बसी हुई एक अधिक बड़ी आबादी का है, और यहां पर दलित और आदिवासी वोट मिलाकर आधे से जरा ही कम हैं। यह प्रदेश साम्प्रदायिक दंगों से मुक्त रहा है, और हर पार्टी को यह बात अच्छी तरह समझ भी आती है कि दंगाई सिक्के यहां के बाजार में चलते नहीं हैं। यह प्रदेश मध्यप्रदेश और राजस्थान के मुकाबले कम सामंती है, और यहां की राजनीति में राजपरिवारों की वैसी दबंग-दखल नहीं है जो कि इन दो बड़े प्रदेशों में है। इन तीनों राज्यों में से खासकर मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह सरकार ने जितने घोर धर्मान्ध और हमलावर तरीके से राजनीति पर धर्म को लादा था, वैसी कोई मिसाल छत्तीसगढ़ में नहीं है। और कुछ महीनों के भीतर ही शिवराज सिंह से यह भुगतना भी पड़ा कि किस तरह भगवों को मंत्री का दर्जा देने का नतीजा होता है, एक शेर को खड़ा तो कर दिया गया, लेकिन उसने बनाने वाले शिवराज को ही नोंच खाया। ऐसे में छत्तीसगढ़ बेहतर राजनीति का केन्द्र बना हुआ है। 
कुछ लोग इसके पीछे कांग्रेस और भाजपा की वाहवाही कर सकते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि छत्तीसगढ़ की जमीन का मिजाज ही अमनपसंद है, और धार्मिक उन्माद यहां पर काम नहीं करता। जब प्रदेश की आधी आबादी दलित और आदिवासी हों, तो वहां पर साम्प्रदायिकता का हथियार काम नहीं आ सकता। इसलिए यह राज्य अपनी आम जनता के मिजाज के मुताबिक किसी भी तरह की हिंसा से दूर बसा हुआ है, और चुनावों में भी यही बात दिखती है। दिलचस्प बात यह है कि छत्तीसगढ़ के चुनावों में सबसे अधिक हमलावर, हिंसक, धर्मान्ध, साम्प्रदायिक, और आपत्तिजनक-गैरजिम्मेदार बयान उन नेताओं के आते हैं जो इस राज्य के बाहर से आते हैं, और अपनी पार्टियों के बड़े नेता कहलाते हुए वे यहां मीडिया या जनता के सामने गैरजिम्मेदार बात कह जाते हैं। दोनों ही पार्टियों को इसका बड़ा नुकसान होता है, लेकिन चूंकि यह सिलसिला दोनों खेमों में बराबरी से जारी है, इसलिए मुकाबले में बराबरी जारी रहती है। 
इस राज्य को जरूरत है अपनी इस खूबी का अहसास करने की, और इस पर फख्र करने की। इस सिलसिले को जारी रखना जरूरी है, और जब देश में चारों तरफ भड़काऊ बातों की सुनामी सी आई दिखती है, तब यह राज्य अपने सीधे और सरल मिजाज के साथ, किसी राजनीतिक दल का मोहताज हुए बिना, शांति का टापू सरीखा बना रहता है, दूसरों के सामने मिसाल बना रहता है। आज सुबह से सोशल मीडिया पर एक लतीफा चल रहा है कि किस तरह दिल्ली में कुछ नेताओं के भाषणों पर अभी रोक लगा दी गई है क्योंकि वहां की हवा में वैसे भी जहर बहुत अधिक हो गया है। छत्तीसगढ़ में मामूली तनाव की बातों को छोड़ दें, तो यहां के स्थानीय नेताओं की जुबान हिंसक बातों के राष्ट्रीय औसत से बहुत नीचे ही है, बहुत नर्म है। इसे ऐसा ही बनाए रखना जरूरी है। 
- सुनील कुमार 




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