संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : धर्म के नाम पर चमत्कारी और पाखंडी मेले कब तक?
24-Jan-2023 4:01 PM
 ‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : धर्म के नाम पर चमत्कारी और पाखंडी मेले कब तक?

पिछले कुछ दिनों से पहले नागपुर और अब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर बागेश्वर धाम के एक स्वघोषित चमत्कारी धीरेन्द्र शास्त्री नाम के नौजवान को लेकर खबरों में उबल रहे हैं। यह नौजवान कहने के लिए प्रवचनकर्ता या कुछ और है, लेकिन उसकी शोहरत धर्मालुओं के बीच मंच पर चमत्कार दिखाने की है। बहुत से लोगों का कहना है कि ये गढ़े गए चमत्कार रहते हैं, और यह एक पाखंड है, धोखा है। यह नौजवान अपने आपको अलौकिक शक्तियों वाला बताता है, मंच और माइक से धर्म के कपड़े ओढ़े हुए घोर साम्प्रदायिकता की बात करता है, तरह-तरह की धमकी देता है, और नागपुर में जब अंधविश्वास विरोधियों ने इसे चमत्कार साबित करने की चुनौती दी, तो यह वहां से भाग निकला। अब छत्तीसगढ़ में राजधानी के एक कांग्रेस विधायक विकास उपाध्याय ने अपनी धार्मिक गतिविधियों की कड़ी में इस धीरेन्द्र शास्त्री का एक और कार्यक्रम कराया जिसे कि टीवी समाचार चैनलों की मेहरबानी से एक बार फिर चमत्कार साबित करने की कोशिश की गई। अब यह तो वक्त बताएगा कि इस ‘चमत्कारी’ की साख बची या टीवी चैनलों की साख गई। 

लोगों के मन की बात बताने, उनका भूतकाल बताने, या भविष्य बताने, उनकी समस्याओं के समाधान बताने वाले ढेर सारे फर्जी और पाखंडी बाबाओं का हिन्दुस्तान में बोलबाला है। ये सिर्फ हिन्दू धर्म में नहीं हैं, ईसाईयों की चंगाई सभाएं होती थीं, जिनमें पोस्टर यही लगते थे कि अंधे देखने लगेंगे, लंगड़े चलने लगेंगे, बहरे सुनने लगेंगे। इसके बाद ईसाई धर्म प्रचारक मंच पर तैयार किरदारों को लाकर पहले उनके विकलांग होने का नाटक पेश करते थे, और फिर उन्हें ठीक करने का। अभी भी इंटरनेट पर ऐसे अनगिनत वीडियो तैर रहे हैं जिनमें मानसिक रूप से परेशान दिखती हुई महिलाएं ऐसे ईसाई धर्म प्रचारकों के छूते ही स्टेज पर झटके से गिरकर लोटपोट होने लगती हैं। हिन्दुस्तान में समाजसेवा का बहुत बड़ा काम करने वाली मदर टेरेसा को भी वैटिकन ने संत की उपाधि तभी दी थी जब वैटिकन की टीम ने किसी एक मरीज का यह बयान दर्ज किया कि मदर टेरेसा के चमत्कार से उसकी बीमारी ठीक हुई। बिना चमत्कार किसी को संत का दर्जा वैटिकन नहीं देता। यह एक अलग बात है कि आज हिन्दुस्तान में कई राज्यों में ऐसे कानून हैं जो चमत्कार से किसी बीमारी को ठीक करने के दावे को जुर्म करार देते हैं, और उन पर सजा है। अब मदर टेरेसा के मामले में तो ऐसे चमत्कार पर ही उनकी संत की उपाधि टिकी हुई है, यह एक अलग बात है कि ऐसा कोई दावा उन्होंने खुद ने नहीं किया था। 

एक ऐसे मुस्लिम बाबा का वीडियो भी कुछ समय से सोशल मीडिया पर चल रहा है जो कि विचलित और बीमार महिलाओं के दरबार में बच्चों की खेल की बंदूकों को उनकी तरफ तानकर, चलाकर उनका इलाज कर रहा है। हिन्दुस्तान में प्रचलित अन्य धर्मों में इस तरह के पाखंड की बात याद नहीं पड़ रही है। जैन, सिक्ख, बौद्ध धर्मों की नसीहत हो सकता है कि पाखंडों से परे ले जाती हो। लेकिन हिन्दुस्तान की हिन्दू आबादी ऐसे पाखंड की सबसे बुरी जकड़ में है। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि जब समाज में डॉक्टरी इलाज ठीक से हासिल नहीं रहता, मनोचिकित्सा हिन्दुस्तान में नहीं के बराबर मौजूद है, और हजार मनोरोगियों में से शायद वह सौ-पचास को भी हासिल नहीं है, तब ऐसे चमत्कारी पाखंडियों की दुकान चल निकलती है। कहीं कोई दरबार लगता है, कहीं प्रवचन के बीच इलाज होता है, तो कहीं पर निर्मल बाबा नाम का एक प्राणी इंटरनेट पर एडवांस बुकिंग से लोगों को टिकटें बेचता है, और हॉल में इक_ा लोगों को दुनिया के सबसे अनोखे समाधान सुझाता है। शुक्रवार को काले कुत्ते को पीले कपड़ों में जाकर लाल समोसा खिलाने से कृपा बरसेगी, जैसा समाधान बतलाने वाला निर्मल बाबा अभी पता नहीं कुछ समय से टीवी से गायब क्यों है, वरना कुछ टीवी चैनल उसी को समर्पित रहते थे। कई और बाबाओं की कई तरह की शोहरत रही, उन्होंने समाजसेवा के कुछ बड़े काम भी किए, लेकिन उनकी महिमा भी चमत्कार के रास्ते स्थापित हुई। पुट्टपर्थी के सत्य सांई बाबा हवा में हाथ उठाकर कई तरह की चीजें पैदा कर देते थे। किसी भक्त को घड़ी, किसी को गहने, और किसी को कुछ और मिल जाता था। उनके भक्त पिछले एक प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंहराव से लेकर बड़े-बड़े जज भी रहे, और ऐसी भक्त मंडली के चलते सत्य सांई बाबा का धार्मिक-आध्यात्मिक कारोबार बहुत फैला। उन्होंने हार्ट के ऑपरेशन के लिए अस्पताल बनाए जिनका गरीबों की जिंदगी में बहुत बड़ा योगदान है, और छत्तीसगढ़ में उनके अस्पताल के कम्प्यूटरों पर बिल बनाने और भुगतान लेने का कॉलम ही नहीं है। यहां सौ फीसदी इलाज मुफ्त होता है। अलौकिक चमत्कारों से जुटाए गए दान का आधुनिक मेडिकल चिकित्सा पर खर्च समझ आता है। लेकिन आज के कई बाबा जिस तरह नफरत फैलाते हुए घूम रहे हैं, साम्प्रदायिकता की बातें कर रहे हैं, वह हिन्दुस्तान को तोडऩे वाली बातें हैं। 

अब ऐसे अंधविश्वास और साम्प्रदायिकता को और ताकत तब मिल जाती है जब स्वघोषित धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस पार्टी के मंत्री-मुख्यमंत्री, या विधायक-सांसद ऐसे बाबाओं के आयोजन करवाते हैं, उनके पांवों में पड़े रहते हैं। लोगों को याद होगा कि बलात्कारी आसाराम के अनगिनत वीडियो आज मौजूद हैं जिनमें गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी आसाराम की स्तुति करते दिखते हैं। लेकिन उन्हीं वीडियो के साथ-साथ कुछ ऐसे वीडियो भी मौजूद हैं जिनमें कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह भी अपने मुख्यमंत्री होने के वक्त आसाराम के पैरों पर पड़े हैं। जिस देश में नेहरू ने एक वैज्ञानिक सोच विकसित की थी, जहां उन्होंने धर्म को निजी आस्था तक सीमित रखा था, हर किस्म के अंधविश्वास और पाखंड का विरोध किया था, हिन्दुस्तान की संस्कृति को धर्मान्धता से अलग करने का बहुत बड़ा काम किया था, आज उन्हीं की पार्टी के नेता पाखंडियों के आयोजन कर रहे हैं जो कि धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता दोनों को फैला रहे हैं। यह बात बहुत हैरान नहीं करती क्योंकि नेहरू की कांग्रेस में उनकी धर्मनिरपेक्ष सोच, और पाखंड का उनका विरोध उन्हीं की बेटी इंदिरा ने खत्म कर दिया था जब वे मचान पर बैठे देवरहा बाबा के लटके हुए पांव के नीचे अपना सिर टिकाने जाकर खड़ी हुई थीं। उसके बाद तो कांग्रेस में धर्मान्धता को औपचारिक मंजूरी ही मिल गई थी, जो आज भी जारी है। कांग्रेस में धर्मान्धता और साम्प्रदायिकता से पूरी तरह बचे हुए सोनिया परिवार के बावजूद पार्टी मोटेतौर पर धर्म के नाम पर धर्मान्धता को बढ़ा रही है। और भाजपा की तो पूरी बुनियाद ही धर्म पर टिकी हुई है। पूरे देश में फैली हुई महज दो ही पार्टियां हैं, और जब ये दोनों हिन्दुत्व की ए और बी टीम की तरह काम कर रही हैं, तो फिर वैज्ञानिक सोच की गुंजाइश कहां है? 

हम देश में फैल रही धर्मान्धता को लेकर महज भाजपा को कोसना इसलिए नहीं चाहते क्योंकि कांग्रेस उसी के पदचिन्हों पर चलते हुए उससे आगे निकलने की हड़बड़ी में दिख रही है। यह एक अलग बात है कि धर्मान्ध और साम्प्रदायिक लोगों को कांग्रेस के मुकाबले भाजपा अधिक माकूल बैठती है, और वे किसी बी टीम पर दांव क्यों लगाएंगे, जब खालिस और असली ए टीम अभी बाजार में मौजूद भी है, और अधिक कामयाब भी है। धर्मान्ध आयोजन करवाने वाले कांग्रेस नेताओं को यह समझ लेना चाहिए कि वे इस पाखंड में सडक़ों पर कितना ही नाचें, वोट के दिन धर्मान्ध लोगों को कांग्रेस सबसे बेहतर पार्टी नहीं लगने वाली है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस एक मामले में समझदारी दिखाई कि उन्होंने अपने ही विधायक और संसदीय सचिव के इस पाखंडी आयोजन में जाने से इंकार कर दिया, और नर्म शब्दों में सही, इसकी आलोचना भी की। धर्म पर आधारित नफरत की लड़ाई में कांग्रेस कभी भी भाजपा से नहीं जीत पाएगी, और उसे ऐसी कोशिश बंद कर देना चाहिए, क्योंकि ऐसी कोशिश के चलते हुए वह अपना चरित्र खो बैठ रही है, और उसके परंपरागत मतदाताओं को यह अब उनकी पसंदीदा पार्टी नहीं दिख रही है। 

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)

अन्य पोस्ट

Comments

chhattisgarh news

cg news

english newspaper in raipur

hindi newspaper in raipur
hindi news