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राजपथ-जनपथ : मानसून सत्र की उहापोह
20-Jun-2024 4:30 PM
राजपथ-जनपथ : मानसून सत्र की उहापोह

मानसून सत्र की उहापोह

विधानसभा के मानसून सत्र की घोषणा हुए करीब सप्ताह भर हो गया है। सत्र की घोषणा स्वयं स्पीकर ने की थी। ऐसे में समझा जाता है कि सरकार ने सत्रावधि को अंतिम रूप देकर सहमति दी है। इस समझ के पीछे कारण भी कि स्पीकर ने सीएम हाउस में हुई बैठक के बाद यह घोषणा की। लेकिन अब तक अधिसूचना जारी नहीं की जा सकी है। इसे लेकर विधानसभा सचिवालय में बड़ी बेचैनी है। वैसे स्पीकर द्वारा घोषणा भी पहली बार हुई है।  यह भी कहा जा रहा है कि क्या घोषित सत्रावधि सरकार के अनुकूल नहीं है। यदि नहीं तो क्या सरकार बदलाव करना चाह रही है। ऐसा करना भी विशेषाधिकार का मामला बन सकता है। उम्मीद की जा रही है कि कल कैबिनेट की बैठक में तिथियों को अंतिम रूप देकर अधिसूचना संबंधी फाइल विधानसभा भेज दी गई होगी, लेकिन नहीं। फाइल आने के बाद ,अधिसूचना जारी करने तक कई औपचारिकताएं करनी होती है। इसमें पूरा एक दिन लगता है।  सरकार का संसदीय कार्य विभाग प्रस्ताव भेजता है, और उसे  विधानसभा सचिवालय, राजभवन को। राज्यपाल की अनुमति के बाद अधिसूचना जारी की जाती है। वैसे विधानसभा सचिवालय ने प्रस्ताव आने की स्थिति में एक घंटे में अधिसूचना जारी करने की तैयारी कर रखी है, भले फाइल आधी रात को आए।

मोइली क्या निकालेंगे?

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी हार हुई है। यह पहला मौका है जब हारे हुए नेताओं ने किसी पर दोषारोपण नहीं किया। और खामोशी से हार को स्वीकार कर लिया। अलबत्ता, पखवाड़े भर बाद ताम्रध्वज साहू ने चुप्पी तोड़ी, और उन्हें कोई नहीं मिला, तो हार के लिए ईवीएम पर दोषारोपण कर दिया। अब एआईसीसी ने छत्तीसगढ़ में पार्टी के खराब प्रदर्शन के लिए कर्नाटक के पूर्व सीएम वीरप्पा मोइली, और राजस्थान के नेता हरीश चौधरी को जांच कर रिपोर्ट देने के लिए कहा है। एआईसीसी से जुड़े लोगों का मानना है कि लोकसभा चुनाव में कोई लहर नहीं थी। अलबत्ता, संविधान बचाओ-आरक्षण बचाओ की मुहिम के चलते कांग्रेस के पक्ष में अनुकूल माहौल था। और कम से कम चार सीटों पर जीत की उम्मीद थी। मगर ऐसा नहीं हुआ। कांग्रेस सिर्फ कोरबा सीट जीतने में कामयाब रही। यानी पिछले लोकसभा चुनाव से भी खराब प्रदर्शन रहा। जबकि यहां के बड़े नेता जीत को लेकर बढ़ चढक़र दावे कर रहे थे। स्थानीय कुछ नेताओं का दावा है कि साधन संपन्न नेताओं को उतारने की पार्टी रणनीति भारी पड़ गई। भूपेश बघेल, ताम्रध्वज साहू, देवेन्द्र यादव, और डॉ. शिवकुमार डहरिया के खिलाफ बाहरी का मुद्दा भारी पड़ गया। स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने ही अपनी पार्टी प्रत्याशियों का साथ नहीं दिया। लिहाजा, ये सभी बुरी तरह हार गए। देखना है कि मोइली कमेटी क्या कुछ करती है।

निगम-मण्डल ?

कल हुई कैबिनेट से पहले एक खबर आई कि निगम मंडलों में अध्यक्ष नियुक्ति की पहली सूची जारी हो सकती है । और इस पहली सूची में  13-14 नाम होने की भी चर्चा आम हुई। उम्मीद से बैठे भाजपा नेताओं में हलचल बढ़ गई। सभी टीवी न्यूज चैनल, पोर्टल के स्क्रीन पर नजरें लगाए बैठे रहे। इस दौरान कुछेक नाम भी सामने आए। एक पूर्व सांसद, एक पूर्व विधायक आदि आदि।

कहते हैं कि पूर्व सांसद ने मना कर दिया। पूर्व विधायक उत्कृष्ट रह चुके हैं लेकिन उनकी विधानसभा में भाटापारा वाले युवा पंडित की घुसपैठ से इस बार टिकट नहीं मिली। शुरुआती नाराजगी के बाद पहले विस, फिर लोस में जमकर मेहनत की। और अब लालबत्ती की दहलीज पर हैं। इसी तरह से पहले 2018 फिर 23 में टिकट खो चुके  एक और नेता भी निगम अध्यक्ष बनने जुटे हुए हैं। कभी चार स्तंभ में से एक के मुखिया रहे हैं। इस पर हाई और लो प्रोफाइल का प्रश्न उठाने वालों को बता दे कि भाजपा में मुख्यमंत्री, बाद में मंत्री (स्व. बाबूलाल गौर) भी रह चुका है। वैसे ये नेता उसी निगम का अध्यक्ष बनना चाहते हैं जिसके वो पूर्व में एक बार रह चुके हैं। देखना यह है कि सूची से किसकी लॉटरी निकलती है।

निगम-मंडलों में नियुक्ति अभी दूर

लोकसभा चुनाव के बाद हुई पहली कैबिनेट बैठक में प्रदेश के जिन पांच प्राधिकरणों का स्वरूप तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल में बदल दिया गया था, उसे फिर से उसी ढांचे में लाने का निर्णय लिया गया, जैसे पहले की भाजपा सरकार के समय थी। इन प्राधिकरणों का जो कार्यक्षेत्र हैं, वहां के कुछ विधायकों को प्राधिकरण में उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालने का मौका मिलेगा। पर बाकी निगम- मंडलों में नियुक्तियों का कोई प्रस्ताव नहीं आया, न ही इस पर चर्चा हुई। विधानसभा चुनाव को 6 माह बीत चुके, इस दौरान लोकसभा चुनाव पार हो गया। दोनों ही चुनावों में भाजपा को बड़ी जीत मिली। अब कार्यकर्ताओं को इंतजार है सत्ता के साथ जुडऩे के मौके का। मगर, ऐसा लगता है कि कुछ इंतजार और करना पड़ सकता है। नगरीय निकायों के चुनाव हो जाने तक भी खिंच सकता है। आयोग, निगम-मंडलों में राजनीतिक नियुक्तियां होने से सरकार का खर्च बढ़ेगा। एक यह तर्क भी दिया जा रहा है कि विधानसभा चुनावों में की गई घोषणाओं के चलते सरकार वित्तीय दबाव में है। इसे पहले ठीक किया जाएगा, फिर सोचा जाएगा, कब लें, किस मापदंड से लें। जीते-हारे विधायकों को लेना है या नहीं, भाजपा में हाल के चुनावों के समय कांग्रेस या दूसरे दलों से आए लोगों को लेना है या नहीं, जैसे कई सवाल हैं। पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में तो नियुक्तियों का सिलसिला तो दो साल बाद ही शुरू हो सका था और आखिरी पांचवे साल तक चलता रहा। इसलिये अभी समय धैर्य रखने का है।

शिक्षकों के बिना प्रवेशोत्सव

विधानसभा में इस साल मार्च महीने में लोक शिक्षण संचालनालय की ओर से दिए गए आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश के स्कूलों में 33 हजार से अधिक शिक्षकों की कमी है। स्थिति यह है कि लगभग 5500 स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं वहीं 600 से अधिक स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं है। एक शिक्षक वाले स्कूल बस्तर और कोंडागांव जिले में अधिक हैं। दूसरी ओर रायपुर और महासमुंद जैसे जिले हैं, जहां 800-800 शिक्षक स्वीकृत पद से अधिक संख्या में तैनात हैं। सरकार ने 33 हजार शिक्षकों की नियुक्तियों के लिए सहमति तो दे दी है, पर अब तक आवश्यक वित्तीय स्वीकृति नहीं मिल सकी है। बुधवार को शिक्षा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने मंत्री के रूप में जो अंतिम समीक्षा बैठक ली उसमें भी यह बात साफ हुई। विज्ञापन वित्त विभाग की स्वीकृति के बाद ही जारी हो सकेंगे। उसके बाद कई चरणों में नियुक्ति की प्रक्रिया चलेगी। प्रक्रिया बिना व्यवधान के आगे बढ़ भी गया तो शिक्षकों की ज्वाइनिंग जब तक होगी, सत्र आधा बीत चुका होगा। फिलहाल, 26 जून को स्कूल खुलते ही प्रवेशोत्सव मनाने की तैयारी चल रही है।

मंदिर में भालू का आना-जाना

वन्य जीवों और मनुष्यों के बीच अच्छी समझ बन जाती है तो वे एक दूसरे का ख्याल रखने लगते हैं, हमले का डर खत्म हो जाता है। एमसीबी जिले के भरतपुर ब्लॉक के भगवानपुर स्थित एक मंदिर में एक भालू नियमित रूप से पहुंचता है। उसे जो भोग प्रसाद मिल जाए, खा लेता है और कुछ देर घूमने के बाद वापस भी लौट जाता है। मंदिर में आने-जाने का वह इतना अभ्यस्त हो गया है कि वह मौजूद लोगों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। लोग भी उसका ख्याल रखते हैं कि जंगल से मंदिर तक आने जाने के दौरान कोई उसे तंग न करे। भालू की इस मौजूदगी ने इस मंदिर को चर्चा में ला दिया है। और मंदिर प्रबंधन सहित गांव के लोग खयाल रखते हैं कि जंगल से मंदिर के बीच उसे कोई तकलीफ न हो। ([email protected])

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