संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : नाबालिगों के देहशोषण के अनगिनत मामलों से नसीहत, सावधानी सिखाएं
07-Jul-2024 2:39 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : नाबालिगों के देहशोषण के  अनगिनत मामलों से  नसीहत, सावधानी सिखाएं

छत्तीसगढ़ के एक नए बने जिले गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही में एक शिक्षक ने अपनी छात्रा रही नाबालिग आदिवासी लडक़ी को फंसाकर 12 बरस तक उससे देहसंबंध बनाए रखे, और छात्रा का कहना है कि उसे बंधक बनाकर  उससे बलात्कार किया गया। अब लडक़ी बालिग है, इसी शिक्षक से गर्भवती है, और उसने रिपोर्ट लिखाई है कि इस काम में इस शिक्षक की वकील बीवी ने भी उसका साथ दिया है। रिपोर्ट के आधार पर पति-पत्नी दोनों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया है। छात्रा के बयान के मुताबिक उसकी 12 बरस की उम्र से उस पर शिक्षक यह जुल्म ढा रहा था, और अब वह गर्भवती है तो पुलिस डीएनए जांच से भी लडक़ी की शिकायत को परख सकती है।

छत्तीसगढ़ में हर कुछ दिनों में ऐसी खबर आ रही है कि नाबालिग लडक़ी को बहला-फुसलाकर, शादी का वायदा करके उससे देहसंबंध बनाए जाते हैं, और चूंकि कानून की नजर में नाबालिग लडक़ी की सहमति कोई मायने नहीं रखती, ऐसे संबंध पॉक्सो एक्ट के तहत नाबालिग से बलात्कार के दर्जे में आते हैं। ऐसे मामलों में तुरंत ही गिरफ्तारी भी होती है, और कुछ मामलों में हाईकोर्ट तक पहुंचने पर भी उम्रकैद कायम रखी गई है। अभी चार दिन पहले ही मानसिक-विचलित कहे जा रहे एक बुजुर्ग को नाबालिग से बलात्कार के आरोप में मिली उम्रकैद में हाईकोर्ट ने कोई भी रियायत देने से मना कर दिया। ऐसे में जब लडक़ी या महिला दलित या आदिवासी तबके की हो, तो इन पर एसटी-एससी एक्ट और लग जाता है, और सजा बढ़ जाती है, या अधिक कड़ी हो जाती है। इस पूरी नौबत को बारीकी से समझने की जरूरत है, और नाबालिगों को समझ देने की भी।

यह जरूर है कि देश में नाबालिग लड़कियों के शोषण के खिलाफ कड़ा कानून है, और अधिकतर मामलों में कार्रवाई करना पुलिस की मजबूरी भी हो जाती है, फिर चाहे वह किसी दबाव में कार्रवाई से कतराना भी चाहे। लेकिन ऐसी कार्रवाई से लडक़ी की कोई भरपाई नहीं हो पाती। सरकार से बलात्कार की शिकार को मिलने वाली आर्थिक मदद भी मिल जाए, तो भी इससे सामाजिक और भावनात्मक भरपाई नहीं हो पाती। ये दोनों ही जख्म किसी लडक़ी का पीछा बाकी तमाम जिंदगी करते हैं, और समाज की सोच ऐसी रहती है कि बलात्कार की शिकार लडक़ी या महिला बाकी लोगों के लिए भी मानो उपलब्ध रहती हो। इसलिए बलात्कार से बचना ही सबसे बेहतर विकल्प है।

बलात्कार करने वाले लोगों को समझाने का काम उनके बचपन से उनके परिवार अगर करते आए रहते तो वे ऐसे मुजरिम भी नहीं बनते। लेकिन हिन्दुस्तानी समाज लड़कियों को ही सावधानी सिखाने का आदी रहता है, और बलात्कारी लडक़ों के बारे में समाज ठीक वही सोचता है जो कि अभी कुछ बरस पहले ही मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि लडक़े हैं, गलती हो जाती है। छत्तीसगढ़ में हर दिन दो-चार ऐसी शिकायतें दर्ज हों, और अनगिनत मामले बिना रिपोर्ट भी दब जाएं, यह नौबत ठीक नहीं है। नाबालिग लड़कियों को यह समझाने की जरूरत है कि शादी की किसी भी तरह की चाह, या झांसे के चलते वे किसी को अपना बदन नहीं सौंप देना चाहिए। फिर यह भी है कि देहशोषण करने वाले को सजा दिलवाने से अपना गर्भ कहीं नहीं चले जाता, अनचाही संतान को जन्म देना, या गर्भपात से गुजरना, ये दोनों ही बातें बड़ी तकलीफ की रहती हैं। इसे बचने की कोशिश करनी चाहिए। नाबालिग लड़कियों को खतरों की समझ भी शायद कुछ कम रहती है, और वे देहसंबंधों के साथ-साथ अंतरंग पलों की तस्वीरें भी खिंचवाने को तैयार हो जाती हैं, और वीडियो बनवा लेती हैं, या उनकी जानकारी के बिना भी छुपे कैमरों से यह काम कर लिया जाता है, जो बाकी पूरी जिंदगी तबाह करने के लिए अक्सर ही इस्तेमाल होता है। रिवेंज पोर्न नाम से दुनिया भर में ऐसे अंतरंग पलों के वीडियो फैले हुए हैं, और उन्हें जड़ से खत्म करना किसी टेक्नॉलॉजी या कानून के बस में नहीं हैं। जब लोग प्रेम में पड़े रहते हैं, या देहसंबंधों का सुख उनकी तर्कशक्ति को कुछ वक्त के लिए खत्म कर देता है, तो वे अपने लिए ऐसे खतरे खड़े कर लेते हैं। न सिर्फ छत्तीसगढ़ में बल्कि पूरे देश में नाबालिग लड़कियों, और लडक़ों को भी फोटो और वीडियो के ऐसे खतरों से आगाह करने की जरूरत है। आज पश्चिमी देशों में सेक्सटॉर्शन नाम से लोगों से वीडियो कॉल पर उनके कपड़े उतरवाकर जो रिकॉर्डिंग की जाती है, वह ब्लैकमेलिंग के काम आती है, और इसके शिकार बहुत से स्कूली लडक़े भी खुदकुशी कर रहे हैं। हिन्दुस्तान और छत्तीसगढ़ में भी सेक्सटॉर्शन के शिकार बहुत से लोग पुलिस तक पहुंचते हैं, और हमारा अंदाज है कि इससे सैकड़ों गुना अधिक लोग चुपचाप ब्लैकमेलरों को भुगतान करते रहते हैं।

इन दिनों लडक़े-लड़कियों की सेक्स की जरूरत कुछ कम उम्र में शुरू हो जाती है, और उस वक्त तक उन्हें बाकी की जिंदगी और दुनिया के तमाम खतरों की समझ नहीं आ पाती। सरकार और समाज को मिलकर इस नई पीढ़ी को चौकन्ना करने की जरूरत है, क्योंकि अब तो जो मामले सामने आ रहे हैं, उनमें रिटायरमेंट के बाद के लोग भी सेक्सटॉर्शन के शिकार हो रहे हैं। एक साइबर जुर्म, और एक रूबरू जुर्म, इन दोनों से बचाव जरूरी है। समाज में जहां अच्छे-खासे बालिग लोग आसपास के नाबालिगों का देहशोषण करते हैं, उस जुर्म से बचने की नसीहत भी बाकी लोगों को दी जानी चाहिए। जब हर किसी को जागरूकता मिल चुकी रहेगी, तभी जाकर ऐसे जुर्म घटेंगे, और लोग ऐसे जुर्म का शिकार होने से बचेंगे। स्कूल की उम्र से ही लडक़ों को भी ऐसे जुर्म करने से बचने की नसीहत देना चाहिए, वरना उसके खतरे भी बता देने चाहिए, जो कि महज कैद तक नहीं रह जाते, कैद के बाद बाकी तमाम जिंदगी को भी बर्बाद कर देने वाले रहते हैं।

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

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