संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : ताकतवर मुजरिम आंखें दिखाते हैं इस लोकतंत्र में
08-Jul-2024 4:08 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय :  ताकतवर मुजरिम आंखें  दिखाते हैं इस लोकतंत्र में

तीन अलग-अलग खबरें हैं जिन्हें जोडक़र यह नतीजा निकलता है कि किस तरह पैसों की ताकत सरकार को भी आंखें दिखाती है। छत्तीसगढ़ के दुर्ग के एक व्यक्ति ने हाईकोर्ट में यह जनहित याचिका लगाई कि वहां के एक व्यक्ति ने अपने कर्मचारी के बैंक खाते से करोड़ों रूपए नगद निकाले हैं, और इसमें कानून तोड़े गए हैं। याचिकाकर्ता ने पहले राज्य सरकार को कई बार इस बारे में लिखा था लेकिन कोई कार्रवाई न देखकर वह हाईकोर्ट पहुंचा था। हाईकोर्ट में राज्य शासन ने एक हक्का-बक्का करने वाला तर्क दिया कि जिस निजी बैंक, यस बैंक, का यह मामला है वह जांच में सहयोग नहीं कर रहा है। इसके बाद अदालत ने इस बैंक को भी इस केस में नोटिस भेजा है। अब सवाल यह उठता है कि छत्तीसगढ़ की जमीन पर काम करने वाला कोई बैंक पहली नजर में ही करोड़ों की अफरा-तफरी की शिकायत या एफआईआर पर चल रही जांच में राज्य की पुलिस से सहयोग कैसे नहीं करेगा? पुलिस के पास तो ऐसे बैंक और उसके अफसरों पर कार्रवाई के लिए बहुत से अधिकार हैं, और अलग-अलग राज्यों में हम देखते हैं कि किस तरह बड़े-बड़े लोगों को गिरफ्तार कर लिया जाता है। अब अगर पहली नजर की इस जालसाजी और दोनंबरी बैंकिंग पर भी अगर राज्य की पुलिस हाईकोर्ट में दीन-हीन और मासूम बनकर खड़ी हो जाती है, तो यह बात तो ईमानदार नहीं लगती है। एक दूसरी खबर बताती है कि किस तरह छत्तीसगढ़ के कुख्यात महादेव ऐप नाम के सट्टेबाजी के धंधे में हजारों करोड़ रूपए के दांव लगवाने के लिए जो बैंक खाते इस्तेमाल किए गए, उनमें से अधिकतर खाते निजी बैंकों में थे। जाहिर है कि इतने बड़े पैमाने पर रकम की आवाजाही देखते हुए भी अनदेखा करने की आपराधिक भागीदारी निजी बैंकों में ही अधिक मुमकिन थी। अब ऐसे बैंक अफसरों के खिलाफ बड़े पैमाने पर कोई कार्रवाई हुई हो, ऐसा दिखाई नहीं पड़ता, जबकि ऑनलाईन सट्टेबाजी जैसे संगठित अपराध में सैकड़ों खाते खोलकर सैकड़ों करोड़ की रकम इधर-उधर करना बैंकों से अनदेखा नहीं रह सकता था। एक तीसरी खबर कल की है कि राजधानी रायपुर में एक बड़े होटल में एक लडक़ी का कत्ल हो गया, कातिल लडक़े ने जाकर रेल पटरी पर खुदकुशी कर ली, और इसकी पिछली रात जब गायब लडक़ी को ढूंढने पुलिस पहुंची, तो होटल मैनेजमेंट ने उन्हें रजिस्टर दिखाने से मना कर दिया, उनके असली पुलिस होने पर भी शक जाहिर किया, और बड़े अफसरों का नाम बताकर जांच अफसरों को धमकाया भी। रात भर पुलिस को जानकारी नहीं मिली, और अगले दिन जाकर जब बड़े अफसर पहुंचे तो होटल में रजिस्टर दिखाया, जो कि हो सकता है बाद में भरा गया हो।

वैसे तो सोशल मीडिया पर लगातार ऐसे वीडियो तैरते रहते हैं जिनमें पुलिसवाले किसी गरीब को कूट रहे हैं, बहुत बुरी तरह जख्मी कर रहे हैं, और वर्दी की सारी ताकत बेसहारा पर उतार रहे हैं। दूसरी तरफ जब ऐसे बड़े लोग किसी जुर्म में शामिल होते हैं, तो पुलिस की हालत खराब हो जाती है, और जिस तरह वह पुणे में अरबपति के बिगड़ैल, शराबी, नाबालिग कार चलाते लडक़े द्वारा दो-दो लोगों को कुचल मारने के बाद भी थाने में उसकी खातिर करते दिखते हैं, उसी तरह का हाल अतिसंपन्न लोगों के साथ हर जगह दिखता है। वरना क्या ऐसा हो सकता था कि कोई बैंक पुलिस से जांच में सहयोग न करे, और पिछली कांग्रेस सरकार से लेकर अब तक वह जांच अधूरी रह जाए? देश-प्रदेश की राजधानियों में जिन बड़े कारोबारियों का सत्ता के ताकतवर लोगों के साथ लंबा-चौड़ा लेन-देन रहता है, उनके बीच तेजी से भागीदारी हो जाती है, और वहां ऐसे दोनंबरी से लेकर दसनंबरी तक कारोबारी सत्ता की ताकत का भी इस्तेमाल करते दिखते हैं, इनमें शराबमाफिया से लेकर भूमाफिया तक, शामियाना वाले से लेकर केटरिंग वाले तक, कई किस्म के लोग रहते हैं। सत्ता के सबसे बड़े लोगों की निजी पार्टियों में भी ऐसे लोग आमंत्रित मेहमानों से हाथ मिलाते घूमते हैं, जबकि वे वहां एक कारोबारी की हैसियत से केवल खाना परोसने के लिए मौजूद रहते हैं। एक कत्ल के मामले में, लडक़ी के गायब हो जाने, और उस होटल में आने का पुख्ता सुराग रहने के बाद भी तमाम रात अगर होटल मैनेजमेंट पुलिस को भी जानकारी देने से मना कर दे, तो इससे शर्मनाक और क्या हो सकता है? यही पुलिस किसी गरीब के हाथ लगने पर, उसे बूटों से कूट-कूटकर उसका कीमा बना डालती, लेकिन यहां अरबपति होटल मालिक बड़े अफसरों का नाम लेकर मझले अफसरों को धमकाते दिखता है।

हम पुलिस की किसी संविधानेत्तर ताकत की हिमायत नहीं करते, लेकिन अपनी ड्यूटी पूरी करते हुए अगर पुलिस को कड़ाई और सख्ती से पूछताछ करनी चाहिए थी, और निजी बैंकों के कर्ताधर्ता पुलिस जांच में सहयोग न करे, और पुलिस बेबस मासूम बच्चे की तरह हाईकोर्ट में खड़ी होकर अपनी दीनता दिखाए, यह बात इस राज्य के कई ईमानदार और सख्त अफसरों की साख से मेल नहीं खाती। अब पता नहीं क्यों यस बैंक की जिस धांधली का मामला पिछली कांग्रेस सरकार के समय से चले आ रहा है, उसके साथ आज की भाजपा सरकार की पुलिस भी क्यों नरमी बरत रही है? कल ही एक ऐसा वीडियो सामने आया है जिसमें एक रेलवे स्टेशन पर एक बहुत ही कमजोर और गरीब आदमी को एक पुलिसवाला बहुत बुरी तरह मार रहा है, और उसे रेलवे पटरियों पर उल्टा लटकाकर वहां फेंक देने की कोशिश कर रहा है। सबके चेहरे दिख रहे हैं, और आसपास दर्जनों लोग भी यह नजारा देख रहे हैं। ऐसे पुलिसवाले की न सिर्फ तुरंत बर्खास्तगी होनी चाहिए थी, बल्कि उसका प्रचार भी होना चाहिए था ताकि ऐसे और मुजरिम-पुलिसवालों को सबक मिल पाए।

भारतीय लोकतंत्र में पैसा अपने आपमें एक कानून है। अरबपति और करोड़पति मुजरिम के घेरे में आने की गुंजाइश बड़ी ही कम रहती है। ऐसे घेरे या कटघरे की हर सलाख बिकने पर आमादा रहती है, पुलिस, गवाह, फोरेंसिक लैब, वकील, और जज, इनमें से जाने कितने ही लोग बिक जाते हैं, और ताकतवर मुजरिम अगला जुर्म करने के लिए आजाद रहते हैं। यह सिलसिला अब वीडियो-सुबूतों के आने के बाद थोड़ा सा मुश्किल हो गया है, और अगर पुख्ता सुबूत मौजूद हैं, तो फिर न्याय प्रक्रिया की अलग-अलग सीढिय़ों को बिक जाने की सहूलियत हासिल नहीं रहती है। लेकिन लोगों को किसी भी जुर्म में किसी ताकतवर का नाम आने पर यह याद रखना चाहिए कि उनके बच निकलने की गुंजाइश कितनी अधिक है। अब कल ही मुम्बई में सत्तारूढ़ पार्टी के एक नेता के लडक़े ने कार से कुचलकर एक महिला, या उसकी लाश को तीन किलोमीटर तक घसीटा, और अब वह फरार है। आगे जाकर पता नहीं उसके खिलाफ कोई गवाह और सुबूत बच भी जाएंगे या नहीं, हिन्दुस्तानी लोकतँत्र ऐसा ही है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

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