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राजपथ-जनपथ : आखिरी गेंद तक बधाई नहीं...
10-Jul-2024 4:04 PM
 राजपथ-जनपथ : आखिरी गेंद तक बधाई नहीं...

आखिरी गेंद तक बधाई नहीं... 

सरकार चाहे कोई भी हो, कई बार अफसर-कर्मियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग सीनियर अफसरों को भी चौंका देती है। पिछले दिनों राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों की ट्रांसफर लिस्ट निकली। आदेश जारी होने से पहले एक अफसर को एक संस्थान में पदस्थापना के लिए बधाई भी मिलनी शुरू हो गई। उन्हें नए संस्थान में बकायदा कार्य भी आबंटित कर दिया गया था। आदेश निकला, तो ठीक इसका उल्टा हुआ। अफसर की दूसरी जगह पोस्टिंग हो गई। 

दूसरी तरफ, संस्थान में ऐसे अफसर की पोस्टिंग हो गई जिन्हें सरकार बदलने के बाद एक तरह से सजा के दौर पर बस्तर के एक नक्सल प्रभावित जिले में भेज दिया गया था। मगर 6 महीने के भीतर अफसर अच्छी पोस्टिंग पाने में सफल रहे। ट्रांसफर लिस्ट जब विभाग प्रमुख के पास पहुंची, तो वो भी फेरबदल देखकर चौंक गए। कुछ इसी तरह का तबादला उच्च शिक्षा विभाग में हुआ। 

मंत्री जी ने चुनाव आचार संहिता से पहले एक विश्वविद्यालय के कुलसचिव के लिए नोटशीट चलाई थी। जिनके नाम की नोटशीट थी उन्हें बधाई मिलना शुरू हो गया। चुनाव निपटने के बाद कुलसचिव के रूप में किसी दूसरे की पोस्टिंग हो गई। खैर, किस अफसर की कितनी पहुंच है, यह अंदाजा लगाना कठिन होता है। 

देखना है आगे क्या होता है

सरकार बदलने के बाद जांच एजेंसियां शराब और कोल मामले में ऐसे-ऐसे साक्ष्य जुटा पाने में सफल होती दिख रही है जिससे आरोपियों की मुश्किलें बढ़ सकती है। आईएएस रानू साहू, और जमीन कारोबारी दीपेश टांक को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई है, लेकिन ईओडब्ल्यू ने उनके खिलाफ अलग प्रकरण दर्ज किया हुआ है। जिससे उनका फिलहाल छूटना मुश्किल दिख रहा है। 

दूसरी तरफ, पीडीएस घोटाले की ईडी पड़ताल कर रही है। ईडी मिलरों का बयान ले रही है। जिससे भ्रष्टाचार के काफी कुछ जानकारी मिल रही है। चर्चा है कि इसके तार कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल से भी जुड़े हैं। रामगोपाल अग्रवाल पिछले सालभर से गायब है। ईडी उनसे पूछताछ नहीं कर पाई है। ये अलग बात है कि उनके सारे करीबी राइस मिलरों से ईडी पूछताछ कर चुकी है, और भ्रष्टाचार के काफी कुछ साक्ष्य जुटा चुकी है। देखना है आगे क्या होता है। 

सडक़ बीच, महुआ बीज

महुआ के फलों से बीज निकालने का काम इन दिनों सडक़ के किनारे दिखाई दे रहा है। फलों को किसी ठोस जमीन पर रखकर तोडऩा पड़ता है और इसके लिए गांव से गुजरने वाली सडक़ सबसे ठीक जगह है। बस, जब पास से आप गुजरें तो ध्यान रखें, वाहन सावधानी से चलाएं और दुर्घटना से दूर रहें।

पुलिस की कार्रवाई पर सवाल

इसी महीने शुरू हो रहे विधानसभा के मॉनसून सत्र में दूसरे कई अहम मुद्दों के अलावा नक्सल समस्या पर कांग्रेस सरकार को घेर सकती है। बीजापुर जिले के पीडिया में 10 मई को हुए मुठभेड़ को लेकर आरोप है कि पुलिस ने जिन्हें नक्सली एनकाउंटर बताकर मार डाला उनमें 10 लोग स्थानीय तेंदूपत्ता मजदूर थे। वे सुरक्षा बलों से घबराकर पेड़ के ऊपर चढ़ गए या छिप गए थे। कांग्रेस के अलावा आदिवासी संगठनों ने भी इस गांव में अपना जांच दल भेजा। उनका भी दावा है कि जिन्हें नक्सली बताया गया वे निर्दोष ग्रामीण थे। इसके बाद नक्सलियों ने भी एक प्रेस नोट जारी कर यही बात कही कि मारे गए लोग हमारे लोग नहीं थे। हालांकि पुलिस ने दावा किया कि सभी नक्सली थे और इनमें से कुछ के ऊपर ईनाम घोषित था। अब एक मामला फिर बीजापुर जिले से ही सामने आया है। यहां के नेडपल्ली गांव को सुरक्षा बलों ने सुबह 4 बजे घेर लिया और 95 लोगों को पकडक़र उसूर थाने ले आई। इनमें छात्र, किसान और बीमार लोग शामिल थे। बाद में उनमें से कुछ को छोडक़र बाकी सभी छोड़ दिए गए। कांग्रेस का आरोप है कि उन्हें थाने लाकर प्रताडि़त किया गया। जिस महिला ने आईईडी ब्लास्ट में अपने दोनों पैर गंवाए, उसके बेटे को भी पुलिस ने पकड़ा था।

विधानसभा में सरकार नक्सली मोर्चे पर अपनी सफलता का दावा इस आधार पर कर सकती है कि पिछले महीनों में 150 से ज्यादा माओवादी मार गिराए गए। हाल ही में बस्तर के पुलिस अफसरों ने दावा किया है कि वह कई धुर नक्सल प्रभावित इलाकों में घुसने में कामयाब रहे हैं, खासकर अबूझमाड़ में। मगर पीडिया और नेडपल्ली की घटनाओं से संकेत मिलता है कि स्थानीय आदिवासियों और सुरक्षा बलों के बीच विश्वास का रिश्ता कायम होने में काफी वक्त लगेगा।

कुछ गरीब और मेहनतकश लोगों की मजबूरी हो जाती है, दुपहिये को तिपहिये जैसा इस्तेमाल करना...

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