विचार / लेख

काश! बाबा साहेब का सम्मान संयुक्त राष्ट्र की तरह होता

Posted Date : 14-Apr-2019



-डॉ. गोल्डी एम. जॉर्ज

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म दिवस और उनके योगदान को याद करने के लिए 14 अप्रैल को एक उत्सव से कहीं ज्यादा उत्साह के साथ उनकी जयंती को मनाते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने बाबा साहेब को सम्मान करते हुए संस्था के शीर्ष अधिकारी ने इन प्रख्यात भारतीय समाज सुधारक को हाशिए पर जी रहे लोगों के लिए 'एक वैश्विक प्रतीक' करार दिया और उनके विजन को पूरा करने के लिए भारत के साथ मिलकर काम करने की इस वैश्विक निकाय की कटिबद्धता प्रदर्शित की। भीमराव के अलावा विश्व में केवल दो ऐसे महापुरूष हैं जिनकी जयंती संयुक्त राष्ट्र ने मनाई हैं। मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला।
भीमराव, किंग और मंडेला ये तीनों महापुरूष मानवाधिकार संघर्ष के सबसे महान नेता रहे हैं। पर क्या भारत का समाज और सत्ता उन्हें इस तरह के सम्मान के लायक समझता है? भारत के संदर्भ में शायद ही डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर के समतुल्य कोई व्यक्तित्व पिछले कई सैकड़ों वर्षों  में पैदा हुआ। अंबेडकर का महत्व भारत में लोग काफी कम जानते हैं। पढ़े-लिखे लोग इन्हें तुछ श्रेणी के मानते हैं। यदि पढ़े-लिखे लोगों की कतार को और थोड़ी लंबी की जाए तो चाहे आईआईटी, आईआईएम या अन्य किसी प्रतिष्ठित संस्थान में पढ़-लिखकर यहां तक कि जो प्रोफेसर की श्रेणी तक पहुंच जाते हैं उनके बीच में भी अंबेडकर के संदर्भ में बात करें तो वे भी इससे ज्यादा कुछ कह नहीं पाते हैं। 
यह बहुत ही अचंभित करने वाली बात है कि जहां दुनिया के लोग अंबेडकर को एक उच्च श्रेणी मानववादी और समाज को नई दिशा एवं दशा देने वाले के रूप में जानते हैं तथा उनके जन्मदिवस को नॉलेज डे के रूप में सारे संसार में मान्यता दी गई है, वहीं स्वयं उनकी अपने देश के लोग ही आज भी उन्हें नहीं पहचान पाए। ऐसी परिस्थिति क्यों और कैसे पैदा हुई कि बाबा साहेब अंबेडकर को अपने ही देश के लोग कम जानते-पहचानते और मानते हैं?
डॉ. भीमराव अंबेडकर भारतीय संविधान के पिता थे जिन्होंने भारत के संविधान का ड्रॉफ्ट (प्रारुप) तैयार किया था। वो एक महान मानवाधिकार कार्यकर्ता थे जिनका जन्म 14 अप्रैल 1891 को हुआ था। उन्होंने भारत के निम्न स्तरीय समूह के लोगों की आर्थिक स्थिति को बढ़ाने के साथ ही शिक्षा की जरुरत के लक्ष्य को फैलाने के लिए भारत में वर्ष 1923 में 'बहिष्कृत हितकारिणी सभा'  की स्थापना की थी। इंसानों की समता के नियम के अनुसरण के द्वारा भारतीय समाज को पुनर्निर्माण के साथ ही भारत में जातिवाद को जड़ से हटाने के लक्ष्य के लिए 'शिक्षित करना-संघर्ष करना-संगठित करना'  के नारे का इस्तेमाल कर एक सामाजिक आंदोलन चलाया। अस्पृश्य लोगों के लिए बराबरी के अधिकार की स्थापना के लिए महाराष्ट्र के महाड़ में वर्ष 1927 में उनके द्वारा एक मार्च का नेतृत्व किया गया जिन्हें सार्वजनिक चॉदर झील के पानी का स्वाद या यहां तक की छूने की भी अनुमति नहीं थी। 
जाति विरोधी आंदोलन, पुजारी विरोधी आंदोलन और मंदिर में प्रवेश आंदोलन जैसे सामाजिक आंदोलनों की शुरुआत करने के लिए भारतीय इतिहास में उन्हें चिन्हित किया जाता है। वास्तविक मानव अधिकार और राजनीतिक न्याय के लिए महाराष्ट्र के नासिक में वर्ष 1930 में उन्होंने मंदिर प्रवेश के लिए आंदोलन का नेतृत्व किया था। उन्होंने कहा कि दलित वर्ग के लोगों की समस्याओं को सुलझाने के लिए राजनीतिक शक्ति ही एकमात्र तरीका नहीं है, उन्हें समाज में हर क्षेत्र में बराबर का अधिकार मिलना चाहिए। 1942 में वाइसराय की कार्यकारी परिषद की उनकी सदस्यता के दौरान निम्न वर्ग के लोगों के अधिकारों को बचाने के लिए कानूनी बदलाव बनाने में वे गहराई से शामिल थे।
भारतीय संविधान में राज्य नीति के मूल अधिकारों (सामाजिक आजादी के लिए, निम्न समूह के लोगों के लिए समानता और अस्पृश्यता का जड़ से उन्मूलन) और नीति निदेशक सिद्धांतों (संपत्ति के सही वितरण को सुनिश्चित करने के द्वारा जीवन निर्वाह के हालात में सुधार लाना) को सुरक्षा देने के द्वारा उन्होंने अपना बड़ा योगदान दिया।
आधुनिक भारत में यदि देखा जाए तो जाति व्यवस्था के भेदभाव, शोषण, अन्याय, बहिष्कार एवं एक संप्रदाय के दूसरे पर सदा काल के लिए आधिपत्य स्थापित करने वाले भयानक चतुरवर्ण व्यवस्था के खिलाफ सुनियोजित एवं व्यवस्थित संघर्ष की गाथा अंबेडकर से आरंभ होती है। इसके अलावा अंबेडकर ने पितृसत्ता, वर्ग व्यवस्था, रंगभेद, एक अलग प्रकार के बौद्ध आंदोलन को प्रेरित करना, आदिवासियों के स्वतंत्र अधिकारों को संवैधानिक मान्यता प्रदान करना, श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के अधिकारों को क़ानूनी अमलीजामा भी पहनाया। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि एवं न्याय मंत्री, भारतीय संविधान के जनक एवं भारत गणराज्य के निर्माता थे।
अंबेडकर ने  समस्त नागरिकों को समतुल्य मानते हुए एक ऐसी व्यवस्था का जन्म दिया जो न्यायसंगत, समतामूलक, बंधुत्व-आधारित एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर स्थित हो। बाबा साहेब अंबेडकर के इन सिद्धांतों एवं मूल्यों पर आधारित  भारत का संविधान बना। आज उनके प्रति इतनी नफरत फैल गई है कि उनके नेतृत्व में रची गई संविधान को दिनदहाड़े सड़कों पर जलाए जाते हंै। उनकी प्रतिमाओं को तोड़ा जा रहा है और जूतों के मालों ंंसे अलंकृत किया जा रहा है। क्योंकि उनके नेतृत्व में रचना की गई संविधान को आज भी भारत के अधिकांश उच्च वर्ग नहीं मानते। वह आज भी इस आशा में बैठे हैं कि कभी ना कभी, कहीं ना कहीं यह संविधान को पलटकर मनुस्मृति को स्थापित करने का समय आएगा। उन्हें हिंदू विरोधी समझा जाता है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि उन्होंने हिंदू धर्म का विरोध किया था, पर क्यों? बाबा साहेब ने कहा कि, हमने हिन्दू समाज में समानता का स्तर प्राप्त करने के लिए हर तरह के प्रयत्न और सत्याग्रह किए, परन्तु सब निरर्थक सिद्ध हुए। हिन्दू समाज में समानता के लिए कोई स्थान नहीं है।
हिन्दू समाज का यह कहना था कि 'मनुष्य धर्म के लिए हैं' जबकि अम्बेडकर का मानना था कि 'धर्म मनुष्य के लिए है।' अम्बेडकर ने कहा कि 'ऐसे धर्म का कोई मतलब नहीं जिसमें मनुष्यता का कुछ भी मूल्य नहीं। जो अपने ही धर्म के अनुयायियों  (अछूतों को) को धर्म शिक्षा प्राप्त नहीं करने देता, नौकरी करने में बाधा पहुंचाता है, बात-बात पर अपमानित करता है और यहाँ तक कि पानी तक नहीं देता ऐसे धर्म में रहने का कोई मतलब नहीं। वे एक अन्य अवसर पर कहते है, 'मैं उस धर्म को पसंद करता हूँ जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे का भाव सिखाता हैं।'
आज भारत के तथकथित प्रबुद्धजन और सरकार जब डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर की जयंती मना रहे हैं, तब अंबेडकर को केवल एक दलित नेता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। दरअसल यह सबसे बड़ी विडंबना है। सारी दुनिया विश्व का प्रणेता कहकर उनका गौरव कर रही है, पर अपने घर में वे केवल अछूतों के नेता है। 
वे एक विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद् , दार्शनिक, लेखक, पत्रकार, समाजशास्त्री, मानवविज्ञानी, शिक्षाविद्, धर्मशास्त्री, इतिहासविद्, प्रोफेसर, संपादक और समाज सुधारक थे। उन्होंने दलितों के अलावा सारे देश के लोगों के लिए काम किया। लेकिन उनके अपने देश के लोग आज तक उन्हें इन प्रतिभाओं के आधार पर नहीं पहचान पाए। जो लोग मेरिट मेरिट का राग अलापते हैं वे सच्चे प्रतिभाओं को देखकर अपने आंखों पर पट्टी, कानों में रुई और मुंह में पानी भर लेते हैं। जब अंबेडकर या फिर दलित आदिवासी मूल निवासी समाज के महत्वपूर्ण प्रतिभाओं को उनके काबिलियत पर पहचानने की बात उठती हो तो यह असंभव सा हो जाता है।
इस नीरस परिस्थिति के लिए दलित, आदिवासी, मूल निवासी लोग भी जिम्मेदार है। इन्ही कारणो से अंबेडकर ने 18 मार्च 1956 को कहा, 'हमारे समाज की शिक्षा में कुछ प्रगति हुई है। शिक्षा प्राप्त करके कुछ लोग उच्च पदों पर पहुंच गए हैं। परन्तु इन पढ़े-लिखे लोगों ने मुझे धोखा दिया है। मैं आशा कर रहा था कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे समाज की सेवा करेंगे, किन्तु मै देख रहा हूँ कि छोटे और बडे क्लर्कों की एक भीड़ एकत्रित हो गई है, जो अपनी तौदें (पेट) भरने में व्यस्त हैं। यह विडम्बना आज भी कायम है जब स्वयं को आंबेडकरॉयट के रूप में परिभाषित करने वाले अपनी जिम्मेदारियों से मुकर जाते हैं।
आज जब देश मे जातिवाद, धर्मवाद, प्रान्तवाद, पुरुषवाद, इत्यादि अपना तान्ङव नृत्य नाच रही है, बाबासाहेब ने समता, स्वतंत्रता और न्याय के आधार पर जिस करवा को एक ऊँचे स्तर पर पहुँचाया था, वह अब धुंधला होता नजर आ रहा है। ऐसे में यह देश की वर्तमान स्तिथि के सामने एक बहुत बड़ी चिंता का विषय है।
(लेखक एक सामाजिक कार्यकर्ता, समाज वैज्ञानिक एवं लेखक हैं)




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