विशेष रिपोर्ट

शहर में मोदी का असर, तो गांवों में कांग्रेस का दबदबा

Posted Date : 16-Apr-2019



नांदगांव लोकसभा सीट 
प्रदीप मेश्राम
छत्तीसगढ़ संवाददाता
राजनांदगांव, 16 अप्रैल।
राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र में वैसे तो दर्जनभर उम्मीदवार चुनावी मैदान में किस्मत आजमा रहे हैं, पर मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है। चुनाव प्रचार के आखिरी दिन तक कांग्रेस प्रत्याशी भोलाराम साहू और भाजपा प्रत्याशी संतोष पांडे को एक-दूसरे के गृह जिले में अपनी पहचान बनाने में ऐड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ा। संतोष पांडे को शुरूआत से ही राजनांदगांव जिले में अपना परिचय बताने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ा। इसी जद्दोजहद से भोलाराम साहू को पांडे के गृह जिले कवर्धा जिले में करना पड़ा। दोनों के बीच यही बात एक समान रही कि एक-दूसरे के गृह जिले में पहचान बताने और बनाने के लिए कई तरह की पेचदगियों से दो-दो हाथ करना पड़ा। 

राजनांदगांव लोकसभा चुनाव प्रचार मंगलवार की शाम थमेगा। यहां 18 तारीख को मतदान होगा। करीब 20 दिन के प्रचार में दोनों दल लोगों के बीच पहुंचाने के लिए जोर लगाते रहे। तकरीबन 300 किमी की लंबाई वाले इस लोकसभा का एक बड़ा हिस्सा चुनावी प्रचार से अछूता रहा। आज भी कई ऐसे इलाके हैं जहां राजनीतिक दलों की पहुंच नहीं हो पाई। कांग्रेस और भाजपा राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र के एक बड़े हिस्से में समय के अभाव के चलते प्रचार से दूर रहे। खासतौर पर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में राजनीतिक दलों की वालपेटिंग और बैनर-पोस्टर नजर नहीं आया है। चुनाव प्रचार में शहरी मतदाताओं ने एक तरह से मोदी के असर से उम्मीदवार संतोष पांडे को समझना शुरू कर दिया है। शहरी मतदाताओं के दिलो-दिमाग में राष्ट्रीय मुद्दे और मोदी के 5 साल के कार्यकाल का आंकलन साफतौर पर दिख रहा है। 

पांडे का शुरूआती प्रचार तंत्र बेहद ही बिखरा रहा, किन्तु बमुश्किल धीरे-धीरे  प्रचार की व्यवस्था को सम्हाला गया। मोदी के बूते भाजपा इस चुनाव में अपनी नैया पार होने की आस में है। उधर कांग्रेस के भोलाराम साहू को सिर्फ प्रदेश के मंत्री मो. अकबर ने ही प्रचार की दिशा में आगे बढ़ाया है। हालांकि कांग्रेस के कई सीनियर नेता घर बैठकर तमाशा भी देख रहे हैं। बताया जा रहा है कि भोलाराम साहू की मेहनत ज्यादा असरकारक नहीं दिख रही है। इसके पीछे भोलाराम साहू का चुनिंदा नेताओं पर भरोसा करना एक बड़ा कारण है। कांग्रेस को इस चुनाव में बोनस और धान के मुद्दों से ज्यादा फायदा होता नहीं दिख रहा है, लेकिन राज्य में सरकार होने का स्वभाविक लाभ भोलाराम को मिलता दिख रहा है। यह सीट करीब दो दशक से भाजपा के कब्जे में है। 

कांग्रेस राज्य की कमान सम्हालने के बाद इस सीट पर अपनी जीत की संभावना तलाश रही है। प्रचार के दौरान भाजपा ने मोदी के लिए गए फैसलों को आम लोगों के बीच जमकर उछाला। चुनाव प्रचार में सेना द्वारा किए गए सर्जिकल स्ट्राईक को भी प्रचार  के दौरान बताया गया। वहीं कांग्रेस के पास पूरे प्रचार में मुद्दों की कमी रही। कुल मिलाकर कांग्रेस राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा लिए गए फैसलों का पुलिंदा लोगों तक पहुंचाया। राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र के आठों विधानसभा में दोनों प्रत्याशी की इक्का-दुक्का बार ही पहुंच पाए। कवर्धा जिले के पंडरिया और कवर्धा विधानसभा में भोलाराम साहू और संतोष पांडे के बीच  थोड़ी खंदक की लड़ाई दिख रही है। जबकि राजनांदगांव के खैरागढ़, डोंगरगढ़, डोंगरगांव, राजनांदगांव, मोहला-मानपुर व खुज्जी विधानसभा में भी कांटे की स्थिति है। राजनांदगांव को 6 सीटों पर शहरी मतदाताओं पर भाजपा को ज्यादा भरोसा है। जबकि ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस अपनी पकड़ को मजबूत समझ रही है। 

गत् लोकसभा में भाजपा ने करीब 2 लाख 35 हजार मतों से बाजी मारी थी। बीते चुनाव की तुलना में यह चुनाव एकतरफा नहीं दिख रहा है। भाजपा के अभिषेक सिंह ने कांग्रेस के कमलेश्वर वर्मा को आसानी से मात देकर जीत हासिल की थी। 5 वर्ष में राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र की सियासी स्थिति बेहद बदल गई है।  ऐसे में कांग्रेस और भाजपा में जीत को लेकर सिर्फ दावे ही दिख रहे हैं।

 




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