संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 24 अप्रैल : दलबदल की गंदगी खत्म करने निष्ठा और नीचता का फर्क...

Posted Date : 24-Apr-2019



भाजपा सांसद, और देश के एक चर्चित दलित नेता, उदित राज आज सुबह कांग्रेस में शामिल हो गए। वे जेएनयू से पढ़े हुए, और आईआरएस अफसर रहे हुए हैं, और 2003 में सरकारी नौकरी छोड़कर इंडियन जस्टिस पार्टी बना चुके हैं। 2014 में वे भाजपा में शामिल हुए थे, और लोकसभा चुनाव में भाजपा टिकट मिलने पर उन्होंने घोषणा की थी कि दलितों का भाजपा में बेहतर भविष्य है। अब पिछले कुछ दिनों से भाजपा उन्हें इस चुनाव दुबारा टिकट देते नहीं दिख रही थी, और उन्होंने कल लिखा था कि मेरे टिकट की घोषणा में देर होने से पूरे देश में मेरे दलित समर्थकों में रोष है, और जब मेरी बात पार्टी नहीं सुन रही, तो आम दलित कैसे इंसाफ पाएगा। उन्होंने यह भी लिखा था कि मैं टिकट की राह देख रहा हूं जो न मिली तो मैं भाजपा को अलविदा कह दूंगा। और हुआ वही। उनकी सीट से दूसरे को टिकट दे दी गई और आज सुबह वे कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके साथ-साथ यह चर्चा भी शुरू हो गई कि कांग्रेस उन्हें उत्तरप्रदेश से उम्मीदवार बना सकती है। आज देश में लोकसभा के चुनाव चल रहे हैं, मतदान के कई दौर हो चुके हैं, कुछ दौर बाकी हैं, और आधी लोकसभा सीटों पर वोट डलने के बाद बाकी सीटों पर कहीं-कहीं नामांकन बाकी है, और उन्हीं सीटों को लेकर यह आखिरी वक्त तक का दल-बदल चल रहा है। 

भारत में एक दिक्कत यह भी है कि दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, या और किसी धर्म या जाति के नेता अपने आपको मिलने वाले महत्व को अपने समुदाय को महत्व मिलने के बराबर बताने लगते हैं, या अपने हाशिए पर चले जाने को समुदाय को हाशिए पर धकेल दिया जाना बताते हैं। ऐसे लोग अपने समुदाय के ऐसे ठेकेदार रहते हैं जो कि समुदाय की प्रतिबद्धता को, समुदाय के समर्थन को ऐसे फाइनांसर के हाथों आनन-फानन बेच देते हैं जो उन्हें चुनाव में एक टिकट, या मंत्री का एक ओहदा, या संगठन में कोई बड़ा पद दे देते हैं। उनके लिए उनका निजी भला ऐसा होता है जिसे कि वे समुदाय को अपना भला मान लेने को कहते हैं, और हो सकता है कि उनका समुदाय किसी आस्था या झांसे के चलते ऐसा मान भी लेता हो। ऐसे लोग अपने समुदाय की गिनती, और उसके वोटों को अपने मालिकाना हक के रेवड़ की भेड़ों की तरह गिनवाने लगते हैं, और मंडी में खड़े-खड़े उन भेड़ों की बोली भी लगवा देते हैं। ऐसा महज एक दलित नेता के बारे में नहीं लिखा जा रहा है, ऐसा दूसरी जातियों, दूसरे धर्मों के लोगों के साथ भी होता है, और वे ऊपर खरीददार को अपने एक विशाल जनाधार होने का झांसा देते रहते हैं, और नीचे बिकने को तैयार की गई भीड़ को अपने पीछे चलने को ही उद्धार का झांसा भी देते हैं। 

यह रूख, दोनों तरफ का यह रूख देश भर में जगह-जगह देखने मिलता है, और इसीलिए भारतीय राजनीति में बहुत से धर्मों की गद्दियां सम्हाले हुए लोगों को सरकारी और संवैधानिक कुर्सियां नसीब होती हैं, और जनता को लूटकर कमाने का मौका भी दिया जाता है। अगर हिन्दुस्तान के दलितों की बुनियादी दिक्कतें ऐसी हैं कि जिनका सबसे बड़ा समाधान बीती शाम तक भाजपा के हाथ में था, और आज सुबह कोई ऐसा ईश्वरीय चमत्कार हो गया कि वह समाधान कांग्रेस के हाथ आ गया, तब तो उदित राज का फैसला जायज माना जा सकता है। वरना तो यह बात साफ है कि बाकी दूसरे बहुत से नेताओं की तरह, धार्मिक और सामाजिक मुखियाओं की तरह उदित राज भी अपने निजी नफे-नुकसान के लिए उनके समर्थक बताए जा रहे समुदाय के हितों को कभी इस हाथ बेच रहे हैं, तो कभी उस हाथ। अपने करीब के छत्तीसगढ़ में भी हमने बीती आधी सदी में ऐसे बहुत से नेताओं को देखा है जो अपनी जाति के ठेकेदार की तरह बर्ताव करते हैं, अपने धर्म के ठेकेदार की तरह बर्ताव करते हैं। 

बात महज उदित राज और उनके आज कांग्रेस में शामिल होने की नहीं है। हो सकता है कि शाम तक कांग्रेस का कोई नेता भाजपा में शामिल हो जाए, इस झांसे के साथ कि उसके साथ, उसके पीछे उसका पूरा समुदाय खड़ा है। हम पिछले महीनों में कई बार यह बात लिख चुके हैं कि चुनाव के वक्त दल-बदल का यह धंधा खत्म करने के लिए चुनाव सुधार में एक ऐसे फेरबदल की जरूरत है जो कि नामांकन के छह महीने पहले, या एक साल पहले से दल-बदल पर ऐसी रोक लगाए कि नई पार्टी की ओर से दलबदलू को उम्मीदवार न बनाया जा सके। यह एक बहुत बुनियादी और मामूली फेरबदल होगा लेकिन इससे सौदेबाजी और दलबदल की गंदगी खत्म हो जाएगी। लोगों को भी यह समझ आएगा कि वे रातोंरात अपनी निष्ठा बदलकर नीचता नहीं कर सकते। ये दोनों शब्द उच्चारण में बड़े आसपास के हैं, और इन दोनों शब्दों को किसी भी धर्म या जाति से परे सभी के लिए लागू करके देखने की जरूरत है क्योंकि लोकतंत्र अगर दलबदल की इजाजत देता है, तो संसदीय परंपराएं राजनीतिक खरीद-बिक्री, मोलभाव, और ब्लैकमेलिंग के खिलाफ मजबूत भी होना जरूरी है। 
-सुनील कुमार

 




Related Post

Comments