संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 1 मई : सुप्रीम कोर्ट न्याय की प्रक्रिया को पूरी तरह कुचलते हुए सामूहिक-आत्मरक्षा में जुटा..
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 1 मई : सुप्रीम कोर्ट न्याय की प्रक्रिया को पूरी तरह कुचलते हुए सामूहिक-आत्मरक्षा में जुटा..
Date : 01-May-2019

हिन्दुस्तानी न्यायपालिका की जिंदगी में अभी पिछले बरस ऐसा लगा था कि उसके भीतर से ही चार जजों ने प्रेस कांफ्रेंस लेकर जो तोहमतें लगाई थीं, वे उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा धब्बा बनी रहेंगी। लेकिन भेदभाव और बेईमानी की तरफ इशारा करती हुई उस प्रेस कांफ्रेंस में शामिल चार जजों में से एक, जस्टिस रंजन गोगोई ने आज अपने पर लगी हुई सेक्स-शोषण की तोहमत पर जो रूख अपनाया है, और उनके रूख के साथ अब तक सुप्रीम कोर्ट के कम से कम चार जज खड़े हुए दिख रहे हैं, इस ताजा एकदम काले धब्बे के मुकाबले पिछले बरस का धब्बा तो हल्का स्याह ही लगने लगा है। कौन यह सोच सकता था कि हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी अदालत जो कामकाज की जगह पर सेक्स-शोषण को रोकने के लिए सरकार और संसद के भी मुकाबले अधिक संवेदनशील रवैया लेकर चलती है, और जिसने सरकार-संसद को इस पर एक अधिक कड़ा कानून बनाने को बेबस किया, वह अदालत अपने मुखिया को तोहमतों से बचाने के लिए पहली नजर में मामूली समझ रखने वाले को नाजायज और गैरकानूनी दिखने वाला रूख अख्तियार कर रही है, और मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की आत्मरक्षा की इस कोशिश में कम से कम चार जज अब तक उनके साथ खड़े दिख रहे हैं जो कि एक बुनियादी रूप से नाजायज जांच में हिस्सा बने हुए हैं, और कथित प्रताडऩा की शिकार महिला का शिकार करते हुए भी दिख रहे हैं। लोगों को याद होगा कि यह वही हिन्दुस्तान है जहां उत्तर भारत के बहुत से थानों में जब बलात्कार की शिकार महिला रिपोर्ट लिखाने पहुंचती है, तो वहां तैनात पुलिस भी बहती हुई गंगा में हाथ धो लेने जैसी धार्मिक भावना से खुद भी उस महिला पर बलात्कार करने में जुट जाती है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ सेक्स-शोषण की शिकायत हलफनामे पर करने वाली महिला के साथ जो सुलूक जांच में बैठे तीन जज कर रहे हैं, उसके चलते कोई हैरानी की बात नहीं है कि इस महिला ने कल इन जजों की कार्रवाई में हिस्सा लेने से मना कर दिया। 

सुप्रीम कोर्ट ने मानो अपने लिए एक अलग ही संविधान बना लिया है, और अपने मुखिया के खिलाफ सेक्स-शोषण की इस अभूतपूर्व और ऐतिहासिक शिकायत की जांच का जो तरीका उसने अपनाया है, उसमें शिकायतकर्ता महिला के बुनियादी अधिकारों को कुचलते हुए एक मौलिक और असंवैधानिक तरीका इस्तेमाल हो रहा है। इस शिकायतकर्ता महिला ने एक लंबे बयान में कल यह खुलासा किया है कि वह क्यों अब जजों की इस कार्रवाई का बहिष्कार कर रही है। उसके मुताबिक कल जब उसने अपने साथ वकील की इजाजत मांगी, तो उसे खारिज कर दिया गया। उसने इस कार्रवाई की रिकॉर्डिंग करने की मांग की, तो उसे खारिज कर दिया गया। उसे जजों ने हिदायत दी कि वह मीडिया से इस सुनवाई के बारे में कोई बात न करे। और जैसा कि इस महिला ने लिखा है, उसका पक्ष जाने बिना ही मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में तीन जजों की बेंच ने बिना उसका पक्ष जाने उसका चरित्रहनन कर दिया। उसने यह भी लिखा कि किस तरह एक केन्द्रीय मंत्री (अरूण जेटली) ने उसकी शिकायत के बाद ब्लॉग लिखकर उसके खिलाफ अनर्गल बातें लिखीं। इसके पहले जब उसने मुख्य न्यायाधीश की खुद की तय की हुई तीन जजों की बेंच ने एक ऐसे जज के रहने पर आपत्ति की थी जो कि मुख्य न्यायाधीश गोगोई के बहुत करीबी निजी दोस्त हैं, परिवार के सदस्य जैसे हैं, तब उसकी आपत्ति सार्वजनिक होने के बाद इस जज ने अपने आपको जांच से अलग किया था। 

इस पूरे सिलसिले से यह बात जाहिर है कि मुख्य न्यायाधीश ने अपने खिलाफ आई शिकायत की सुनवाई न सिर्फ खुद शुरू कर दी, बल्कि एक गैरमौजूद महिला के खिलाफ तरह-तरह के लांछन जवाब में लगाए। उन्होंने खुद तीन जजों की एक ऐसी कमेटी या बेंच बना दी जिसमें एक जज उनका एकदम ही करीबी था, और तीन जजों में से दो पुरूष थे जबकि महिला की ऐसी शिकायत पर जांच की कमेटी में महिलाओं का बहुमत होना जरूरी कानून में ही बताया गया है। हमने इसी जगह पिछले कुछ दिनों में एक से अधिक बार इस मामले में लिखा है, और आज उसी की अगली कड़ी के रूप में यह लिखने को बेबस हो रहे हैं कि अगर इस महिला की ताजा शिकायत को देखा जाए, और उसे पहली नजर में सही माना जाए, तो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से परे भी ये चार जज जिनके नाम अब तक इस जांच के सिलसिले में कमेटी में रखे गए, वे अपनी कानूनी जिम्मेदारी पूरी करते नहीं दिख रहे हैं, और संस्था की जो सामूहिक जिम्मेदारी बनती है, उससे भी सब कतराते दिख रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के ये दिग्गज चार जज और उनके मुखिया इस पूर्वाग्रह और इस निष्कर्ष के साथ काम करते दिख रहे हैं कि यह महिला झूठी है, उसकी तोहमतें एक साजिश हैं जो कि सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता पर एक हमला है। 

यह बात अब साफ है कि सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज इस मामले की जांच करके देश की न्यायप्रक्रिया की साख को और चौपट ही करेंगे। इसकी जांच एक ऐसी जूरी के हवाले करनी चाहिए जिसमें कुछ रिटायर्ड जज हों, और कुछ ऐसी महिला वकील हों जिनके नाम शिकायतकर्ता महिला और आरोपों से घिरे सीजेआई दोनों को मंजूर हों। जिस तरह अमरीकी न्याय व्यवस्था में एक जूरी चुनी जाती है, इस मामले में ऐसी ही एक जूरी की जरूरत है। मुख्य न्यायाधीश के मातहत जज उनकी जांच करें, यह मुमकिन हो नहीं सकता। यह न्याय की प्रक्रिया के भी खिलाफ है। एक साधारण शिकायत पर सुप्रीम कोर्ट को जिस संस्थागत तरीके से सामान्य जांच करनी थी, उसमें पूरी नीयत को बदनीयत बताते हुए, संस्था की अपनी साख चौपट करते हुए जिस तरह से इस मामले को लिया गया है, वह बहुत ही भयानक है। जब तक संसद के शायद 50 से अधिक सांसद महाभियोग का प्रस्ताव लेकर न आएं, तब तक जनता तो किसी जज के खिलाफ कुछ भी नहीं कर सकती। यह एक मामला अगली संसद के सामने एक चुनौती रहेगी। सीजेआई ने सेक्स-शोषण चाहे न किया हो, लेकिन उन्होंने खुद के खिलाफ आई शिकायत को कुचलने में जिस तरह से सक्रिय अगुवाई की है, वे एक पल भी उस कुर्सी पर रहने के हकदार नहीं हैं। 

लोगों को याद होगा कि जिस वक्त हिन्दुस्तान में आपातकाल लगाने के लिए इंदिरा और संजय गांधी ने बहाने ढूंढे थे, तो उस वक्त देश को अस्थिर करने, सेना को बगावत के लिए भड़काने जैसा बेबुनियाद तर्क ढूंढा था। ऐन उसी अंदाज में अब सुप्रीम कोर्ट की आजादी खत्म करने का तर्क ढूंढकर न्याय की प्रक्रिया को कुचलते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और न्यायाधीश एक सामूहिक आत्मरक्षा में जुट गए हैं।
-सुनील कुमार

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