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आपके सिगरेट का कश गर्भ में बच्चे को भी पहुंचा रहा है नुकसान
आपके सिगरेट का कश गर्भ में बच्चे को भी पहुंचा रहा है नुकसान
Date : 03-May-2019

अगर आप घर में अपनी पत्नी के आसपास धूम्रपान करते हैं तो संभल जाइए। यह लत न सिर्फ आपके और पत्नी के लिए नुकसानदायक है, बल्कि गर्भ में पल रहे शिशु के लिए भी खतरनाक है। पैसिव स्मोकिंग (धूम्रपान करने वालों के आसपास) के माहौल में रह रहीं गर्भवती महिलाएं समय से पहले शिशु को जन्म दे सकती हैं। एम्स के प्लमनरी मेडिसन विभाग के प्रमुख, प्रोफेसर अनंत मोहन ने यह जानकारी दी है।

गर्भवास्था में यूं होता है नुकसान
प्रोफेसर अनंत मोहन के मुताबिक, सिगरेट पीने वाली महिलाओं के अलावा आसपास धूम्रपान करने वाले लोगों के संपर्क में आने पर भी बच्चों पर बुरा असर पड़ता है। सिगरेट के धुएं के संपर्क में आने से कई खतरनाक रसायन फेफड़े के जरिए शरीर में पहुंच जाते हैं और बच्चे और गर्भनाल को क्षति पहुंचाते हैं। कुछ अन्य रसायन गर्भ तक ले जाने वाली नलियों को सिकोडक़र छोटा कर देते हैं। ऐसे में शिशु तक कम मात्रा में ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंच पाते हैं। इससे या तो छोटे आकार और कम वजनी बच्चा पैदा होता है या फिर कई बार समय से पहले बच्चे का जन्म हो सकता है। ऐसे बच्चों को जन्म के बाद भी काफी बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है।
प्रदूषण से बच्चों में बढ़ रहे अस्थमा के मामले
प्रदूषण से देश में तेजी से बच्चे अस्थमा का शिकार हो रहे हैं। एम्स के प्लमनरी मेडिसन विभाग के प्रमुख प्रोफेसर अनंत मोहन ने लेंसैंट की साल 2015 की रिपोर्ट के आधार पर बताया कि भारत में प्रदूषण की वजह से  350000 बच्चे अस्थमा के शिकार हुए। चीन के बाद दूसरे नंबर पर भारत है। वायु प्रदूषण के चलते दिल्ली में अस्थमा के मरीजों का बोझ बढ़ता ही जा रहा है। भारत में ही डेढ़ करोड़ से अधिक लोग अस्थमा से ग्रसित है। हवा में सूक्ष्म कणों की वृद्धि से वायु प्रदूषण का बढऩा,  धूम्रपान, बच्चों का गलत उपचार सहित कई इस बीमारी के कारण है।
बचपन में 50 फीसदी को अस्थमा होता है
डॉ अनंत मोहन ने कहा कि एम्स में ज्यादातर मरीज सांस लेने में परेशानी की शिकायत लेकर पहुंचते हैं, इसके अलावा दूसरे सिमटम्स को लोग नजरअंदाज करते हैं। देखने में आया है कि सांस लेने में परेशानी के अलावा लोगों को खांसी भी थी, जांच की गई तो पता चला कि खांसी अस्थमा की वजह से थी। मरीज से जब उसकी बीमारी के इतिहास के बारे में पता करते हैं तो 50 फीसदी मरीज बचपन से ही पी?ित निकलते हैं। उन्होंने कहा कि अस्थमा के इलाज को लेकर लोग लापरवाही बरतते हैं। यदि समय पर इसका ईलाज करा लिया जाए तो यह पूरी तरह से ठीक हो सकता है।
10 में सात मरीज इनहेलर इस्तेमाल नहीं करते
वायु प्रदूषण बढऩे से बच्चों में अस्थमा की बीमारी के मामले बढ़ रहे है। इस मामले में दिल्ली को 125 शहरों में 38 वां स्थान मिला है जो बेहद ही चिंताजनक बात है। अस्थमा के दस में से सात मरीज इनहेलर का प्रयोग नहीं करते है। उसको लेकर तरह-तरह के मिथक लोगों के मन में बने हुए है। जिसके लिए लोगों को जागरूक होने की जरूरत है।
अस्थमा के लिए इसलिए बेहतर है इनहेलर
चेस्ट केयर फाउंडेशन के प्रमुख डॉक्टर संदीप साल्वी कहते हैं अस्थमा के लिए इनहेलर बेहतर है। उन्होंने कहा कि इनहेलर के जरिए दवा सीधे फेफड़ों तक पहुंचती है। अस्थमा में इनहेलर से अच्छी कोई दवा नहीं है। अभी भी लोगों के मन में इनहेलर को लेकर शंका है। जबकि दवा से ज्यादा कारगर इनहेलर है। क्योंकि दवा पूरे शरीर में खून के माध्यम से फैलती है। इसमें दवा खाने के एक घंटे बाद से असर होता है। वहीं इनहेलर सीधे फेफड़े में पहुंचती है। जो मर्ज पर सीधे वार करती है। जब अस्थमा ठीक होने लगता है तो लोग दवा बंद कर देते है। जबकि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए इससे बीमारी के ओर ज्यादा बढऩे की संभावना प्रबल हो जाती है। इसके लिए जरूरी है कि मरीज इनहेलर का प्रयोग करें जिससे फेफड़ों को सीधा राहत मिलती है।
एम्स अस्थमा पीड़ित बच्चों पर शोध कर रहा
अस्थमा पीड़ित बच्चों पर प्रदूषण किस तरह असर करता है, यह जानने के लिए एम्स दिल्ली के स्कूली बच्चों पर शोध कर रहा है। एम्स के पल्मनरी मेडिसन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर करन मदान ने बताया कि इसके लिए बच्चों को पहनने के लिए खास बेल्ट दी जाएगी जो अलग-अलग जगहों पर प्रदूषण मापती है। इस शोध के द्वारा इनडोर और आउटडोर प्रदूषण के बीच संबंध भी पता चल सकेंगे। साथ ही यह भी पता लगाया जा सकेगा कि प्रदूषण का स्तर घटने-बढऩे का असर बच्चों पर किस तरह से पड़ रहा है।
.धूम्रपान न करने वालों में भी सांस की बीमारियां तेजी से बढ़ी हैं
.दमा और सांस रोगों से पीड़ित हर छठा मरीज भारतीय है
.इन रोगों की वजह से मरने वाला हर तीसरा मरीज भारतीय
प्रोफेसर विजय हाड्डा (पल्मनरी विभाग, एम्स) ने कहा - प्रदूषण और पैसिव स्मोकिंग का कम उम्र के बच्चों को अधिक नुकसान होता है। जब उनके फेफड़े बढ़ रहे होते हैं और तब धुआं सोखने लगे तो उन्हें अस्थमा या अन्य सांस रोग होने की आशंका बढ़ जाती है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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