संपादकीय

 दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 12 मई : चुनावी हुनर की मिसालें, और  उन्हें हासिल करने की जरूरतें
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 12 मई : चुनावी हुनर की मिसालें, और उन्हें हासिल करने की जरूरतें
Date : 12-May-2019

लोकसभा चुनाव अपने आखिरी दौर में है, और जो बात खुलकर सामने आई है वह भाजपा की तैयारी की है। पूरे चुनाव प्रचार, अभियान, मीडिया और सोशल मीडिया के इस्तेमाल, इन तमाम चीजों में नरेन्द्र मोदी की जो तैयारी दिखती है, वह चुनावी नतीजों को जाहिर तौर पर प्रभावित करने वाली है। नतीजे चाहे जो हों, मोदी अपनी तैयारियों के चलते अधिक वोट पाएंगे, और कांग्रेस पार्टी उनकी सबसे बड़ी विरोधी पार्टी होने के नाते अपनी कमजोर तैयारियों की वजह से संभावित वोटों को खोएगी। लोकतंत्र में वोट पाने के तमाम लोकतांत्रिक औजार सभी लोगों को बराबरी से हासिल हैं, लेकिन इसके बावजूद अगर कोई पार्टी अपनी चतुराई से उसका बेहतर इस्तेमाल कर लेती है, तो यह उसकी खामी नहीं, उसकी खूबी ही कहलाएगी। 

यह बात आज कुछ लोगों को थोड़ी सी अटपटी लग सकती है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने पर केन्द्रित इस पूरे चुनाव अभियान में कुछ बड़ी चूक भी की हैं, जिनमें से एक कल ही सामने आई है। एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने पाकिस्तान पर की गई सर्जिकल स्ट्राइक में अपनी रणनीतिक सूझबूझ को वायुसेना अफसरों पर लादने सरीखी एक बात कही जिसने उन्हें मीडिया और सोशल मीडिया पर मखौल का सामान बना दिया है। लेकिन इस बड़बोलेपन से परे उन्होंने आम जनता की जनधारणा पर असर डालने के लिए जितनी मेहनत से तरकीबें जुटाई हैं, वे भाजपा को चुनाव जीतने की एक मशीन की तरह स्थापित कर रही हैं। जिस तरह उन्होंने एक फिल्म अभिनेता को दिए गए एक तथाकथित गैरराजनीतिक साक्षात्कार का इस्तेमाल किया, और कई दिनों तक खबरों में वही छाया रहा। जिस तरह उन्होंने एक नमो चैनल शुरू करवाया, और बाद में चुनाव आयोग ने उसे गैरसमाचार चैनल मान लिया, और सिर्फ विज्ञापन चैनल का दर्जा देकर उसे चुनाव आचार संहिता से छूट दे दी। ये तमाम बातें एक बहुत ही नकारात्मक माहौल के बीच नरेन्द्र मोदी की अनोखी कोशिशें हैं जो कि जीत के उनके वोट बढ़ाने में मदद करेंगी, या उनकी हार को छोटा बनाने का काम करेंगी। 

चुनाव के बीच कौन सी बातें नहीं कहनी चाहिए, किस तरह नहीं कहनी चाहिए, इसका अगर कोई डिग्री कोर्स शुरू हो, तो उसमें कांग्रेस के बहुत से नेता पढ़ाने के लिए जा सकते हैं। इस बार मणिशंकर अय्यर को कांग्रेस ने किसी अज्ञातवास पर भेजा हुआ है, तो मानो उनकी कमी दूर करने के लिए सैम पित्रोदा आ गए, और अपनी टूटी-फूटी हिन्दी में सिक्खों के जख्मों पर नमक रगड़कर तब माफी मांगी जब राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से ऐसा करने को कहा। कांग्रेस पार्टी इस तरह की चूक से उबर नहीं रही है, हालांकि भोपाल में दिग्विजय सिंह ने अपना मुंह तकरीबन बंद रखने में कामयाबी पाई है, और उनकी बातों से कोई बखेड़ा खड़ा नहीं हो पाया है। इसकी एक वजह शायद यह भी रही कि वे साधुओं के बीच बैठकर मंत्र पढऩे में लगे रहे, और उस बीच कोई गलत बात कहने की गुंजाइश भी नहीं थी। भाजपा और उसके नेता तो अवांछित बातों को कहने के आदी रहे हैं, और उनकी ऐसी बातें उनके औजार-हथियार भी हैं, लेकिन कांग्रेस को अनर्गल बातों से कोई फायदा नहीं होता है, और उसे अपने लोगों पर बेहतर काबू रखना चाहिए। 

मीडिया से लेकर सोशल मीडिया, और इन दिनों स्मार्टफोन पर लोकप्रिय मैसेंजर सर्विसेज का जो इस्तेमाल भाजपा ने किया है, उसे देखकर कांग्रेस और बाकी पार्टियों को काफी कुछ सीखने की जरूरत है। कल ही एक टीवी इंटरव्यू में राहुल गांधी ने यह मंजूर किया है कि वे कुछ बातें मोदी से भी सीखते हैं कि कुछ कामों को कैसे-कैसे नहीं करना चाहिए। उन्हें यह भी सीखने की जरूरत है कि जनधारणा प्रभावित करने के कुछ काम कैसे-कैसे किए जाएं। अगर जनता की लहर ही किसी एक नेता, पार्टी, या गठबंधन के खिलाफ हो, या उसके साथ हो, तो छोटे-मोटे सभी औजार-हथियार बेकार हो जाते हैं। लेकिन अगर मामला कांटे की टक्कर का हो, तो ये सब बहुत असरदार हो जाते हैं। इन चुनावों के नतीजे तो अब तकरीबन तय हो चुके हैं, लेकिन कांग्रेस जैसी पुरानी, बड़ी, और संभावनाओं वाली पार्टी को जीत या हार के बाद आगे के लिए चुनावी हुनर हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए। 
-सुनील कुमार

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