संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 13 मई : हर सरकार को पिछली सरकार की जांच करवानी ही चाहिए...

Posted Date : 13-May-2019



छत्तीसगढ़ में रमन सिंह की भाजपा सरकार जाने के बाद भूपेश बघेल की कांग्रेस सरकार ने लगातार पिछले बरसों में हुए गलत सरकारी कामकाज की कड़ी जांच शुरू करवाई है जिसमें से कुछ मामले लोगों को पहले से मालूम थे, और कुछ मामले अभी सामने आए हैं। कुछ लोगों को यह भी लग सकता है कि नई सरकार नया कामकाज करने के बजाय गड़े मुर्दों को उखाडऩे का काम कर रही है, लेकिन सवाल यह है कि जिन पुरानी मौतों को लेकर कांग्रेस पार्टी लगातार यह कहते आई थी कि वे कत्ल के मामले थे, अब सरकार में आने के बाद उन मामलों की जांच न करवाना तो विपक्ष के दिनों में जनता से किए गए वायदे के खिलाफ जाना ही होगा। इसलिए हर सत्तारूढ़ पार्टी को चुनाव के पहले के अपने आरोपों और वायदों को पूरा करने के लिए अपनी कानूनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और अगर लोग गुनहगार मिलते हैं, तो उन्हें सजा भी दिलवानी चाहिए। 

लोकतंत्र में लोग ऐसी सरकार को सज्जन मान बैठते हैं जो बीते बरसों के दूसरी पार्टी के कामकाज की छानबीन न करे, और आगे बढ़ ले। लेकिन सवाल यह है कि हर सरकार आरोपों से बचने के लिए अगर ऐसा ही करते चलेगी, तो सरकार में बैठे लोगों के सरकारी जुर्म आखिर कब कटघरे तक पहुंच पाएंगे? हम इसी जगह पहले भी अपनी सोच लिख चुके हैं कि हर पार्टी को सरकार में आने पर पिछली दूसरी पार्टी की सरकार के कामकाज पर एक खुला जांच आयोग बिठा देना चाहिए, और अपने खुद के लगाए आरोप उसे दे देना चाहिए, और जनता से भी शिकायतें या आरोप बुलवाकर, सुबूत बुलवाकर उस आयोग को दे देना चाहिए। जनता के प्रति जवाबदेही ऐसे ही पूरी हो सकती है कि सत्ता ने जितने किस्म के गलत काम किए थे, उन पर इंसाफ की गारंटी की जाए। 

छत्तीसगढ़ में हो सकता है कि नई सरकार कुछ जांच राजनीतिक हिसाब चुकता करने के लिए भी शुरू कर रही हो। लेकिन जो लोग हिन्दुस्तान की जांच एजेंसियों का हाल जानते हैं, और यहां की अदालतों की संस्कृति और संभावनाएं पहचानते हैं, उनको अच्छी तरह मालूम है कि सौ गुनहगार बचकर निकल जाते हैं, लेकिन किसी बेकसूर को शायद ही कभी सजा होती हो। ऐसे में पिछली सरकार में बहुत ही ताकतवर रहे हुए, और सक्षम-संपन्न हो चुके लोगों को आज जांच से बचने के लिए पूरा मौका हासिल है, उनके पास महंगे वकील हैं, जांच में पलट जाने वाले गवाह मौजूद हैं, सुबूत वक्त के साथ कमजोर और बहुत कमजोर होते चलते हैं, और ऐसे में किसी बेकसूर को शायद ही कभी सजा हो सके। लेकिन ऐसी जांच का एक दूसरा फायदा यह है कि आज की सरकार के साथ जिन अफसरों को इन पांच बरस काम करना है, उनके दिमाग में यह बात साफ रहेगी कि पांच बरस बाद जो सरकार आएगी, वह अगर आज की सरकार से अलग होगी, तो वह भी इन पांच बरसों के कामों की जांच करवा सकती है। किसी भी सरकार में गलत काम उसी वक्त अंधाधुंध बढ़ते हैं जब सरकार हांक रहे लोगों को यह भरोसा होने लगता है कि वे अमर हो चुके हैं, और कुर्सी पर उनका कब्जा धरती के खत्म होने तक जारी रहने वाला है। पांच-पांच बरस में सरकार बदल जाना इस हिसाब से ठीक है कि सत्ता पर बैठे लोग एक दबाव के तहत काम करते हैं। यह दबाव राजनीतिक दबाव नहीं रहता जो कि सत्ता के दूसरे या तीसरे कार्यकाल में सब कुछ काबू कर लेता है, यह दबाव एक कानूनी दबाव रहता है कि पांच बरस के भीतर-भीतर सारा भांडाफोड़ होने का पूरा खतरा रहेगा। 

कोई भी सरकार अगर राजनीतिक बयानबाजी से बचे, और महज जांच एजेंसियां खुली आजादी से अपना काम करें, तो जनता के खजाने पर डकैती डालने वाले नेताओं और अफसरों को कटघरे में लाया भी जा सकता है, और सरकार दुश्मनी के आरोप से बच भी सकती है। हमारा ख्याल है कि जब पिछली सरकार के कामों के खिलाफ पुख्ता सुबूत हों, तो फिर नई सरकार को कड़े बयान देने की जरूरत नहीं पडऩी चाहिए। जब जांच एजेंसियां ही पिछले सत्तारूढ़ लोगों को जेल भेजने जितने सुबूत जुटा रही हैं, तो राजनीतिक बयान देकर जांच का वजन कम नहीं करना चाहिए। आगे-आगे देखें, जांच से अदालतों में क्या साबित होता है। 




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