संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 14 मई : एक कार्टून पर हुई गिरफ्तारी! कमजोर लोकतंत्र की निशानी

Posted Date : 14-May-2019



ममता बैनर्जी पर गढ़कर बनाई गई एक मजाकिया तस्वीर को लेकर उन्होंने अपनी आदत के मुताबिक ऐसा करने वाली एक युवती को गिरफ्तार करवा दिया। चूंकि चुनाव चल रहा है, और यह युवती भाजपा की कार्यकर्ता भी है, इसलिए मामला आनन-फानन सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया और आज वहां से कुछ अफरा-तफरी के बीच उसे जमानत मिल गई। सुप्रीम कोर्ट से इसे लेकर दो किस्म के समाचार आए। पहला समाचार यह निकला कि अदालत ने इस भाजपा नेता प्रियंका शर्मा को पहले ममता बैनर्जी से बिना शर्त माफी मांगने को कहा, और उसके बाद जमानत देने की बात कही। लेकिन जब उसके वकील ने अदालत से कहा कि माफी मांगने को कहना, भाषा एवं अभिव्यक्ति की आजादी को ठेस पहुंचाने वाली बात है। अभी इस बारे में समाचार आ ही रहे हैं कि प्रियंका ने माफी मांगी तब जमानत दी गई, या बिना उसके जमानत दी गई, लेकिन चाहे पल भर के लिए अदालत का जो रूख सामने आया, वह कुछ सदमा पहुंचाने वाला था।

भारतीय राजनीति में बहुत सी पार्टियों और नेताओं के बीच अंधाधुंध कटुता चल रही है। एक-दूसरे की बातों को तोड़-मरोड़कर उन्हें जनता के बीच बेइज्जत करने के काम में देश के कुछ सबसे बड़े नेता ओवरटाईम करते हुए दिख रहे हैं। लेकिन इसके बीच भी एक बात यह है कि किसी की तस्वीर को लेकर कार्टून बनाना, या किसी का मजाक उड़ाना अभिव्यक्ति की आजादी की बुनियाद है। लोग मजाक अलग-अलग किस्म से कर सकते हैं, लोगों का हास्यबोध और व्यंग्यबोध अलग-अलग हो सकता है। लोगों की संवेदनाएं अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन लोकतंत्र में किसी कार्टून का जवाब, किसी गढ़ी गई व्यंग्य तस्वीर का जवाब गिरफ्तारी नहीं हो सकता। दुनिया में सभ्यता और लोकतंत्र के विकास का एक पैमाना यह भी है कि उस समाज में, उस देश में किसी कार्टून को कितनी आजादी हासिल है।

हिंदुस्तान में अगर देखें तो सैकड़ों बरस पहले किसी लोकतंत्र के बिना, किसी कानून के बिना, अभिव्यक्ति की किसी लिखित स्वतंत्रता के बिना कबीर ने जितने पैने व्यंग्य किए हैं, उतने तो आज आजाद हिंदुस्तान में भी करना मुमकिन नहीं है। आज मस्जिद के किसी मुल्ला को मुर्गे की तरह बाग देकर अल्लाह को बुलाने की बात लिख दी जाए, तो वह दंगा फैलाने, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का जुर्म हो जाएगा। पश्चिम बंगाल में इसके पहले भी ममता बैनर्जी ने उन पर बनाए गए कार्टूनों पर ऐसा ही किया है और गिरफ्तारियां करवाई हैं। इस देश में उन्हें लोकतंत्र की महान परंपराओं को देखना चाहिए जब गांधी और नेहरू के खिलाफ रोजाना कार्टून बनते थे, और आए दिन अंबेडकर पर भी। लेकिन किसी ने कभी उसका बुरा नहीं माना। हाल के बरसों में नेताओं का बर्दाश्त खत्म हो गया है, और यह लोकतंत्र के कमजोर पडऩे का एक पुख्ता सुबूत है। भारत को तुरंत अपने आईटी कानून में फेरबदल करना चाहिए जिसके चलते अब तक भी राज्य सरकारें इसका बेजा इस्तेमाल करने की ताकत रख रही हैं, बेजा इस्तेमाल कर रही हैं। लेकिन जो सुप्रीम कोर्ट इस कानून में फेरबदल कर रहा है, कर चुका है, और आगे करने की ताकत रखता है, वही आज सुनवाई के दौरान जिस तरह एक युवती से बिना शर्त माफी मांगने की शर्त रख रहा था, वह आजादी की एक कमजोर समझ का संकेत भी है। सुप्रीम कोर्ट को आजादी को व्यापक अर्थों में लेना चाहिए था। खैर जो भी हो शायद आज जब यह आदेश अदालत से निकलेगा, वह सुधरा हुआ रहेगा।
-सुनील कुमार




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