विचार / लेख

इस बार भाजपा उत्तर प्रदेश से ज्यादा ताकत पश्चिम बंगाल में क्यों झोंक रही है?

Posted Date : 15-May-2019



भाजपा के एक सूत्र बताते हैं कि इस चुनाव में उत्तर प्रदेश से ज्यादा संसाधन बंगाल भेजे गए हैं और यहां के चुनाव की मॉनिटरिंग सीधे गुजरात से की जा रही है

पश्चिम बंगाल की 42 सीटें देश का अगला प्रधानमंत्री तय करने वाली हैं. भाजपा के एक बंगाली नेता ने जब यह बात अपने पार्टी मुख्यालय में चार महीने पहले कही थी तो जोर का ठहाका लगा था. तब उत्तर प्रदेश के कुछ नेता उन्हें समझाने में जुट गए थे कि 80 सीटों वाला उत्तर प्रदेश ही प्रधानमंत्री की कुर्सी तय करेगा. लेकिन वक्त और उत्तर प्रदेश की सियासत बड़ी तेज़ी से बदली. भाजपा का अपना आकलन है कि उत्तर प्रदेश में 2014 जैसे नतीजे नहीं आने वाले. इंटरव्यू में पूछने पर अमित शाह यहां की 73 प्लस सीटों का दावा करते हैं और योगी आदित्यनाथ 74 प्लस की बात करने लगते हैं. लेकिन भाजपा के अंदर चुनाव लड़ाने वाली टीम के सदस्य से बात करें तो वे कुछ और कहते हैं. इनके मुताबिक ‘उत्तर प्रदेश की कुछ सीटें हम जीत रहे हैं और कुछ सीटों पर महागठबंधन का समीकरण ऐसा बैठा है कि हम कितनी भी ताकत लगा लें जीत ही नहीं सकते. इसलिए विकल्प में भाजपा के सभी थिंक टैंक पश्चिम बंगाल पर नजऱ गड़ाए बैठे हैं.’
चुनावी संसाधनों की बात करें तो भाजपा के एक सूत्र बताते हैं कि इस लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से ज्यादा संसाधन बंगाल भेजे गए हैं. हेलीकॉप्टर से नेताओं को भेजने का सवाल हो या फिर गली-गली टीम पहुंचाने का. हर मामले में बंगाल इस बार भाजपा के रडार पर है. यह जानकर बेहद ताज्जुब होगा कि बंगाल के चुनाव की मॉनिटरिंग दिल्ली से ज्यादा गांधीनगर से की जा रही है. गुजरात में चुनाव खत्म होते ही वहां के कई नेताओं को भी बंगाल भेजा गया है. और सुनी-सुनाई यह भी है कि दिल्ली से लेकर गांधीनगर तक तीन कंट्रोल रूम बने हैं जो बंगाल के एक एक जिले को मॉनिटर कर रहे हैं.
किसी पत्रकार द्वारा अमित शाह से यह पूछे जाने पर कि क्या बंगाल में इतनी ताकत 2024 के लिए लगाई जा रही है, उनका जवाब था कि भाजपा वहां की 42 में से कम से कम 23 सीटें जीतने जा रही है. ममता बनर्जी के करीबी भी बताते हैं कि दीदी ने अपनी ज़िंदगी में ऐसा कठिन चुनाव कभी नहीं लड़ा है. उन्हें उनके घर में ही घेरने की कोशिश हर तरफ से की जा रही है. दोनों ही तरफ से एक-एक जिले, एक एक बूथ तक के लिए फील्डिंग बिछाई गई है.
दरअसल पश्चिम बंगाल में इस बार लड़ाई प्रधानमंत्री बनने की है. ममता बनर्जी के विश्वस्त नेता कहते हैं कि अगर गठबंधन की सरकार बनी तो ममता किसी भी कीमत पर प्रधानमंत्री की कुर्सी से समझौता नहीं करना चाहेंगी. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के एक मंत्री का कहना है कि दीदी दिल्ली जाएंगी और अभिषेक बाबू कोलकाता की गद्दी संभालेंगी, पार्टी का फिलहाल यही मूड बन रहा है. लेकिन ऐसी सूरत तभी बनेगी जब तृणमूल को 42 में से कम से कम 38 सीटें मिले. भाजपा के अंदर ग्राउंड रिपोर्ट पढऩे वाले नेता कहते हैं कि राहुल गांधी से लडऩा भाजपा के लिए आसान है, लेकिन ममता बनर्जी तो नरेंद्र मोदी को उनके तरीके से ही टक्कर दे सकती है.
भाजपा में संगठन का काम देखने वाले एक प्रचारक ने कुछ पत्रकारों को समझाते हुए बताया कि भाजपा इस बार पश्चिम बंगाल का चुनाव उसी अंदाज़ में लड़ रही है जैसे 2014 में उसने उत्तर प्रदेश का चुनाव लड़ा गया था. 2014 से पहले भाजपा उत्तर प्रदेश में चौथी ताकत थी. लेकिन बूथ से लेकर प्रदेश स्तर तक ऐसा माहौल बनाया गया मानो सभी की असली टक्कर वहां भाजपा से ही है. बंगाल भी इस बार वैसी ही प्रयोगशाला है. बंगाल के चुनावी कवरेज पर नजऱ रखने वाले एक अनुभवी बंगाली पत्रकार की मानें तो पश्चिम बंगाल में पहली बार चुनाव पूरी तरह धर्म के आधार पर लड़ा जा रहा है. इससे पहले बंगाल का चुनाव कैडर के दम पर ज्यादा लड़ा जाता था. लेकिन अब वामपंथी कैडर रामपंथी हो गया है. ममता को मुसलमान वोट तो मिल रहा है, लेकिन हिंदू वोटों का बहुत तेज़ी से ध्रुवीकरण हो रहा है.
जब लोकसभा चुनाव का ऐलान हुआ था उस वक्त भाजपा के पास पश्चिम बंगाल की सभी 42 सीटों पर खड़े करने के लिए मजबूत उम्मीदवार तक नहीं थे. लेकिन इसके बाद उसने अपने सारे विकल्प खोल दिए और जिस पार्टी से जो भाजपा में आया उसे टिकट दे दिया गया. 2014 में उत्तर प्रदेश में भी बिल्कुल ऐसा ही हुआ था. उत्तर प्रदेश की तरह पश्चिम बंगाल में भी हर जिले के पार्टी अध्यक्षों को कहा गया है कि किसी भी तरह के संसाधनों में कोई कमी नहीं की जाएगी. अगर कहीं तृणमूल कैडर का डर है तो चुनाव आयोग से डायरेक्ट हॉटलाइन स्थापित की जाती है. इसलिए चुनाव के वक्त सबसे ज्यादा ट्रांसफर की खबरें भी बंगाल से ही आ रही हैं और ममता बनर्जी बार-बार कह रही हैं कि चुनाव के वक्त उनकी प्रदेश सरकार कोई और चला रहा है.
भाजपा के एक केंद्रीय नेता के शब्दों में कहें तो बंगाल में इस बार लड़ाई आर-पार की है. अगर इस बार यहां चुनाव नहीं जीते तो फिर अगले कुछ दशकों तक ऐसा कर पाना मुश्किल है. और अगर इस बार 15-20 सीटें भी पा गए तो यह ममता बनर्जी के लिए खतरे की घंटी होगी. दार्शनिक अंदाज़ में यही नेता बताते हैं कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को राहुल गांधी से ज्यादा विपक्ष के दो दिग्गज नेताओं से खतरा लगता था - बिहार से नीतीश कुमार और बंगाल से ममता बनर्जी. नीतीश कुमार अब नरेंद्र मोदी के साथ हैं और मुख्यमंत्री ही बने रहना चाहते हैं, इसलिए 2019 में बारी ममता बनर्जी की है. अगर ममता हारी तो मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए पूरी ताकत लगाएंगी और अगर ममता ने यह युद्ध जीत लिया तो वे प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए सबसे ताकतवर उम्मीदवार बनकर उभरने वाली हैं. इसलिए इस बार उत्तर प्रदेश से नहीं बंगाल से प्रधानमंत्री का फैसला हो सकता है. (सत्याग्रह ब्यूरो)




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