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दैनिक 'छत्तीसगढ़' का आजकल, 20 मई : उनके सपनों का हिस्सा बनने...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का आजकल, 20 मई : उनके सपनों का हिस्सा बनने...
Date : 20-May-2019

-सुनील कुमार

छोटे बच्चों का दिल बहलाने के लिए परिवार के लोग आमतौर पर उनके सामने टीवी, कम्प्यूटर, या मोबाइल फोन पर बच्चों के गानों के वीडियो लगा देते हैं। ये गाने बच्चों के गाए हुए नहीं रहते, ये बच्चों को बहलाने के लिए खास तैयार किए गए गाने रहते हैं, और अलग-अलग आवाजों में अलग-अलग वीडियो इंटरनेट पर मुफ्त में मौजूद भी रहते हैं। नतीजा यह होता है कि दवा पिलाने से लेकर, खाना खिलाने तक, दिल बहलाने के लिए बच्चों को वीडियो के हवाले कर दिया जाता है। ऐसे बहुत से गाने अंग्रेजी में हैं, और बहुत से हिन्दी में भी। बहुत से गाने दूसरी भारतीय भाषाओं में भी वीडियो की शक्ल में मौजूद हैं, और हो सकता है कि बोलियों में भी लोकगीत हों। लेकिन इनके बारे में कुछ और गहराई से सोचने की जरूरत है। 

वैसे तो टीवी, कम्प्यूटर, और स्मार्टफोन, ये सब एक आय वर्ग से ऊपर के लोगों को ही नसीब है, लेकिन इन दिनों कई जगहों पर मुफ्त का इंटरनेट रहता है, और गरीब भी खींचतान कर किसी तरह स्मार्टफोन पा जाते हैं। ऐसे में लगता है कि जो रंगारंग वीडियो बच्चों के लिए, उनके गानों के साथ, अच्छे संगीत के साथ नजारे पेश करते हैं, वे सबसे गरीब बच्चों को कहां ले जाते हैं? यह तो ठीक है कि हर बच्चे को सपने देखने का हक होना चाहिए, परीकथाओं को पढऩे का हक होना चाहिए, लेकिन हिन्दुस्तान जैसे देश में आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा है जो अपने अंत तक ऐसे सपनों को हकीकत में तब्दील होते नहीं देख पाता। ऐसे बच्चों के लिए ऐसे गाने और ऐसे वीडियो क्या मायने रखते हैं, और उन्हें कहां ले जाकर छोड़ते हैं? 

कुछ बरस पहले का एक तजुर्बा मैंने किसी और कॉलम में शायद लिखा था। एक प्रदेश की राजधानी की महिला जेल में महिला कैदियों के साथ बंद उनके छोटे बच्चों से मिलने जब एक समाजसेवी संगठन के लोग पहुंचे, उनसे बात की, कि वे क्या सोचते हैं, क्या करना चाहते हैं, तो उनकी एक अलग ही दुनिया सामने आई। ऐसे बच्चे छह बरस की उम्र तक ही अपनी कैदी मां के साथ जेल में रहते हैं, उसके बाद उन्हें बाहर परिवार के पास भेज दिया जाता है, या सरकार के किसी दूसरे बाल संरक्षण गृह में रखा जाता है। इस शहर की महिला जेल के भीतर अहाते में से जेल के पास की एक होटल का बोर्ड दिखता था। होटल की छत पर लगा हुआ यह बोर्ड रात में भी होटल के नाम को दिखाते हुए चमचमाता था, और जेल के बच्चे उस नाम को लेकर उत्सुक थे कि वह क्या है? उनको पूछताछ से यह पता लगता था कि यह होटल है, लेकिन होटल क्या होता है, कैसा होता है, यह उनको समझ नहीं पड़ता था क्योंकि समझ आने के पहले वे जेल आ चुके थे, या जेल में ही पैदा हुए थे, और किसी होटल को देखना कभी हुआ नहीं था। इस समाजसेवी संस्था के सदस्यों ने तय किया कि वे अफसरों से इजाजत लेकर इन बच्चों को पास की ही इस होटल तक ले जाएंगे, और वहां के रेस्त्रां में खाना खिलाकर वापिस जेल छोड़ देंगे। लेकिन इस सोच पर एक प्रतिक्रिया भी आई कि जिन बच्चों को अभी कुछ बरस जेल में ही रहना है, या बाहर निकलकर भी किसी बाल संरक्षण गृह में रहना है, या बिना मां के किसी परिवार में उपेक्षित रहना है, उसे एक बार ऐसी होटल दिखाकर और वहां खाना खिलाकर उन्हें क्या दिया जाएगा? क्या महज एक बार का ऐसा तजुर्बा जिसके दुबारा होने का आसार बरसों तक शायद उनकी जिंदगी में न आए? 

कुछ ऐसा ही हाल बच्चों के लिए बनाए गए रंगबिरंगे वीडियो और गानों का भी होता है जो कि बहुत गरीब तबके के किसी बच्चे से सपनों के स्तर पर भी नहीं जुड़े रहते। वे एक ऐसी चमकीली और रंगीन, चकाचौंध करने वाली और खूबसूरत दुनिया दिखाते हैं जो फुटपाथ या झोपड़पट्टी पर बैठकर, या लेटकर सपने देखने के लायक भी नहीं होते। जाहिर है कि दुनिया के बहुत से दूसरे सामानों की तरह खूबसूरत बाल-गीतों की दुनिया भी उन्हीं के लायक, और शायद उन्हीं के लिए भी, बनाई जाती है जो कि किसी चीज के ग्राहक हो सकते हैं, चॉकलेट या खिलौनों के, कपड़ों और जूतों के, या साइकिल और तिपहिया के। ऐसे गानों के साथ इस तरह के सामानों को बेचने की एक नीयत साथ-साथ चलती है, और इन सामानों के इश्तहारों से ऐसे गानों का खर्च भी निकलते चलता है। इसलिए यह जाहिर और जायज है कि ऐसा गीत-संगीत एक न्यूनतम आय वर्ग से ऊपर के तबके के बच्चों के लिए और उनके लायक ही बनता है। महज कागजों तक सीमित कुछ गाने, गीत, और बाल कविताएं ऐसे हो सकते हैं जो कि गरीब बच्चों की कल्पनाओं से भी मेल खाते हुए हों, उनके भी काम के हों। लेकिन उनके लायक, और उनकी जिंदगी के साथ तालमेल से चलने वाले गाने कैसे हो सकते हैं, कैसे बन सकते हैं, यह एक बहुत बड़ी चुनौती भी हो सकती है। 

हो सकता है कि बाल मनोविज्ञान के जानकार यह कहें कि जिन्हें हासिल नहीं है उन्हें भी हसरत करने के लिए ऐसी रंगीन कल्पनाएं जरूरी हैं, या ठीक हैं। हो सकता है यह बात सही हो, लेकिन फिर भी यह लगता है कि इतनी रंगीन और चमकीली दुनिया को कुछ मिनट देखने के बाद क्या इन बच्चों को अपना खुद का फुटपाथ या झोपड़पट्टी का दायरा खटकता नहीं होगा? क्या उनके बीच एक हीनभावना नहीं आती होगी? न तो मैंने ऐसे तबके के बच्चों से बहुत अधिक बात की है, और न ही मुझे बाल मनोविज्ञान की कोई जानकारी है। बस महज सहज समझ से इतना लगता है कि उनकी असल जिंदगी और ऐसे चमकीले गानों के बीच का एक विरोधाभास शायद उनके लिए अच्छा न रहता हो। यहां मैं जो लिख रहा हूं, वह किसी किस्म की सलाह नहीं है क्योंकि इस विषय पर सलाह देने जितनी जानकारी और समझ मेरी नहीं है। मैं महज एक फिक्र और उत्सुकता सामने रख रहा हूं कि वंचित तबके के बच्चों के लिए क्या होना चाहिए? उनकी सपनों की दुनिया का हिस्सा बनने के लिए किस तरह के गाने और वीडियो होने चाहिए?

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