संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  20 मई : एग्जिट पोल, मनोरंजन  तो बेईमान होता नहीं है
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 20 मई : एग्जिट पोल, मनोरंजन तो बेईमान होता नहीं है
Date : 20-May-2019

बीती शाम हिन्दुस्तानी आम चुनाव के आखिरी दौर का वोट खत्म हुआ, और एग्जिट पोल आना शुरू हुआ। अधिकतर समाचार चैनलों ने किसी न किसी एजेंसी के साथ मिलकर वोट डालकर निकले मतदाता का रूख भांपने का काम किया, और फिर पूरी तरह ईमानदार नतीजे सामने रखे, या जैसा कि लोगों की आशंका है मिलावटी नतीजे पेश किए, और जिन लोगों को पोल के नतीजे पसंद नहीं आए, उन्हें पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का उछाला हुआ एक नया शब्द याद पड़ा, और उन्होंने इन तमाम एग्जिट पोल को महामिलावटी साबित करने की कोशिश की। जिन लोगों की निजी पसंद जैसी थी, उनको ये नतीजे वैसे ही लगे। कुछ लोगों को लगा कि आएगा तो मोदी ही, और कुछ लोगों को लगा कि हिन्दुस्तानी मीडिया मोदी के हाथों बिका हुआ  गोदी मीडिया बन चुका है, और वह उसी नमक का बदला चुका रहा है। 

चुनाव के पहले के ओपिनियन पोल हों, या मतदान के बाद के एग्जिट पोल, इनमें गलती की गुंजाइश खासी हो सकती है, और पिछले बरसों में बहुत से नामी-गिरामी चैनलों, और नामी-गिरामी एजेंसियों के नतीजे गलत साबित हुए भी हैं। लेकिन इनको अधिक गंभीरता से नहीं लेना चाहिए क्योंकि हिन्दुस्तानी टीवी-समाचार चैनलों में से शायद सभी का सरकार में रजिस्ट्रेशन समाचार और मनोरंजन चैनल के रूप में है। ये चैनल इसीलिए दिन में कई बार कॉमेडी या नाच-गाना भी दिखाते हैं, महज समाचार नहीं। इसलिए ओपिनियन पोल हो, या एग्जिट पोल, इन दोनों को ही अपनी जरूरत जितनी गंभीरता से ही लेना चाहिए, वरना इन्हें मनोरंजन वाला हिस्सा मानकर इनका मजा लेकर फिर दूसरे किसी चैनल पर चले जाना चाहिए। 

हिन्दुस्तान में जो समाचार-पत्रिकाएं हैं, उनमें जो सबसे प्रतिष्ठित कही या मानी जाती हैं, उनमें भी एक चलन पिछले कई बरसों से लगातार चल रहा है। वे साल में एक-दो बार हिन्दुस्तानी नौजवानों, महिलाओं, या शादीशुदा जोड़ों के प्रेम और सेक्स संबंधों, विवाह से परे के बेवफाई के संबंधों के बारे में एक सर्वे करके उसे सनसनीखेज तरीके से छापती हैं। नतीजा यह होता है कि वह अंक खासा अधिक बिकता है, और जो लोग उस पत्रिका को पढऩा छोड़ चुके थे, वे भी कम से कम उस एक अंक की तरफ वापिस लौटते हैं, और एक यह संभावना बनती है कि वे एक बार फिर पाठक या ग्राहक बन सकते हैं। यह काम कहने के लिए तो पत्रकारिता के दायरे में आता है, लेकिन यह मोटे तौर पर बाहर किए गए एक सर्वे का नतीजा रहता है, और ऐसा सर्वे पत्रकारिता नहीं रहता, वह एक अलग तकनीक रहती है। सेक्स से लेकर वोट तक, लोगों की राय को जानकर, या बिना जाने भी, उस पर नतीजे निकालना, और उसे अपने ग्राहकों, पाठकों, या दर्शकों के सामने पेश करना कुछ लोगों को फिजूल का और बेईमानी का काम लग सकता है, कुछ लोगों को यह एक जरूरी जिम्मा लग सकता है। यह गर गंदा है, तो भी धंधा है, यही मानकर इसका मजा लेना चाहिए। भारत का चुनावी इतिहास हर किस्म के ओपिनियन और एग्जिट पोल से भरा हुआ है। कुछ लोग बार-बार गलत साबित होते हैं, और उसके बावजूद वे बाजार में बने भी रहते हैं। ऐसी भविष्यवाणी कुछ अखबारों में अब तक, इक्कीसवीं सदी में भी छपने वाले भविष्यफल जैसी रहती है जिसे कुछ लोग अब भी पढ़ते हैं, और उनमें से कुछ लोग अब भी भरोसा करते हैं। हिन्दुस्तान का इस बार का आम चुनाव इतना लंबा चला है कि लोग थक गए हैं, और इसी तरह के मनोरंजन से काम चलेगा। जिस तरह लोग अंतिम संस्कार के लिए मरघट जाते हैं, और वहां पर चिता की तैयारी में वक्त लगता है, फिर आग पकडऩे में समय लगता है, और कपालक्रिया की नौबत आने तक घंटे भर से ज्यादा लग चुका रहता है। वहां पर मौजूद लोग धूप, धूल, और धुएं से थककर मरने वाले की बेईमानी या बदचलनी, बदमिजाजी या बदनामी तक हर पहलू पर चर्चा कर लेते हैं, उसी तरह वोट डलने के हफ्तों बाद आने वाले नतीजों को लेकर लोगों को इंतजार भारी न पड़े, इसलिए टीवी पर कई तरह की बहस चलती हैं ताकि लोगों का वक्त कटे, और इस तरह के एग्जिट पोल सामने आते हैं ताकि लोग शर्त और सट्टा लगा सकें। इन्हें महज इतनी ही गंभीरता से लिया जाए तो किसी मीडिया पर बिके हुए होने का आरोप लगाने की नौबत नहीं आएगी क्योंकि मनोरंजन तो बेईमान होता नहीं है। 
-सुनील कुमार

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