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घोड़ी पर चढक़र शादी: सवर्ण अहंकार  को चुनौती या पाखंड की नकल?
घोड़ी पर चढक़र शादी: सवर्ण अहंकार को चुनौती या पाखंड की नकल?
Date : 21-May-2019

रतन लाल
दबंग जातियां शादी के दौरान घोड़ी पर चढऩा अपना विशेषाधिकार समझती हैं, इसलिए दलितों द्वारा ऐसा करना उन्हें बगावत या सामाजिक ताने-बाने का टूटना लगता है। लेकिन ऐसी शादी करके दलितों को मिलेगा क्या?

गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश तीन ऐसे प्रमुख राज्य हैं, जहां दलित दुल्हे को घोड़े पर चढऩे से रोकने से संबंधित विवाद अक्सर सामने आते है। जो अक्सर दलितों के खिलाफ एकतरफा हिंसा, मार-पीट, आगजनी के रूप में प्रकट होता है। हालांकि, ऐसी घटनाएं कई और राज्यों में भी होती हैं।

सदियों से सवर्ण की एक ख़ास जाति और कुछ कथित पिछड़े घोड़ी पर चढक़र, लम्बी मूछों और तलवार के साथ शादी करने की प्रथा को अपना एकाधिकार मानती रहीं हैं। ज़ाहिर है दलितों द्वारा इस परंपरा का अनुकरण उन्हें उनके एकाधिकार में सेंधमारी जैसा लगता है। सनद रहे! वर्ण और जाति व्यवस्था के जनक अर्थात् ब्राह्मणों में अमूमन इस प्रथा का चलन नहीं है, जो अपने आप में एक शोध का विषय है।

पिछले दिनों में मध्यप्रदेश के रतलाम (जहां दूल्हे को सवर्णों की पत्थरबाजी से बचने के लिए हेलमेट लगाना पड़ा), उत्तर प्रदेश के कासगंज, संजरवास गाँव (दादरी जिले), हरियाणा के कुरुक्षेत्र से ऐसी खबरें आईं। लेकिन गुजरात आजकल ऐसी खबरों के लिए छाया हुआ है। पिछले हफ्ते वहां मेहसाणा, सांबरकाठा से ऐसी घटनाएँ सामने आईं हैं। इन घटनाओं को अंजाम देने में आम तौर पर सवर्ण या कथित पिछड़े वर्ग के पुरुष शामिल होते हैं।

लेकिन, लैंगिक भेदभाव के नाम पर 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग कर रही महिलाएं भी इस जातिवादी कुकर्म में पीछे नहीं रहीं। अरवल्ली जिले के खामबिसार गांव में घोड़ी पर चढ़े दलित दुल्हे को रोकने के लिए महिलाएं सडक़ पर बैठ कर कीर्तन करने लगीं।  उसी हिन्दू धर्म का कीर्तन, जिस धर्म के कथित रीति-रिवाज़ के अनुसार दलित दूल्हा घोड़ी पर बैठा था और उन्हीं महिलाओं के द्वारा, जिन्हें 33 प्रतिशत आरक्षण चाहिए!

ऐसे मौकों पर जब पुलिस आती है और यदि आप पुलिसकर्मी से पूछो की उसका क्या काम है तो वह आपको शायद यह जवाब देगा, ‘शांति बनाए रखना।’ और अमूमन यह काम जाति-व्यवस्था बनाए रखकर किया जाता है। ज्यादातर दबंग जातियों के पक्ष में!

मिसाल के तौर पर, कीर्तन के जरिए बारात रोकने वाले केस में पुलिस का काम था रास्ता रोकने वाले कीर्तनियों को हटाकर सडक़ साफ करना। लेकिन उन्हें कीर्तन करने वालों को सुरक्षा दी और बारात को रोक दिया।

क्या घोड़ी पर चढऩा सामाजिक क्रांति है?
चूँकि दबंग जातियां शादी के दौरान घोड़ी पर चढऩा अपना विशेषाधिकार समझती हैं। इसलिए दलितों द्वारा ऐसा करना उन्हें बगावत या सामाजिक ताने-बाने का टूटना लगता है। यह बगावत कई रूपों में व्यक्त हो सकती है। सवर्ण के सामने बीड़ी/सिगरेट पीना, ज़मीन खरीद लेना, आर्थिक रूप से समृद्ध हो जाना, साफ़-सुथरे वस्त्र पहनना, जूते पहनकर चलना, सीधा तनकर स्टाइल में चलना, नोकदार मूंछे रख लेना, बुलेट बाइक या महंगी कार पर चलना इत्यादि। इन सारी घटनाओं ने कई बार सवर्णों में हिंसक प्रतिक्रिया को जन्म दिया है। यहां डॉ. आंबेडकर को याद करना प्रासंगिक होगा। वे लिखते हैं, ‘यदि किसी हिन्दू से पूछो यदि किसी अस्पृश्य के जीवन में सुधार आता है तो आपको क्या समस्या है, तब वह बोलेगा जिसे आप सुधार कहते हैं, वह सुधार नहीं बल्कि हमारे धर्म के विरुद्ध विद्रोह है, और धर्म की जड़ें हमारे शास्त्रों में है।’ यह अकारण नहीं है कि अरवल्ली जि़ले के पीडि़त परिवार ने बौद्ध धर्म अपनाने की घोषणा की है। यह 21वीं सदी का भारत है और दलितों की आकांक्षाएं बार-बार उन्हें ऐसे ‘विद्रोह’ के लिए प्रेरित करती हैं।

सार्वजनिक प्रदर्शन और उत्सव
घोड़ी-प्रकरण से भी वीभत्स घटनाएं आज भी जारी है। जैसे- किसी स्वाभिमानी दलित की हत्या, आम हत्याओं की तरह नहीं होती, बल्कि आनुष्ठानिक वध होता है, सरेआम जि़न्दा जलाया जाता है, सडक़ों पर घसीटा जाता है, पंचायत सजाई जाती है, पूरे मोहल्ले को इक_ा किया जाता है, महिलाओं की हत्या से पहले सामूहिक बलात्कार होते हैं। अंग-भंग किया जाता है और नंगा करके बाज़ारों में घुमाया जाता है।
ऐसा क्यों है कि ऐसी घटनाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जाता है – विडियो बनाकर वायरल किया जाता है? इसके मूल में है कुछ घटनाओं के द्वारा बहुसंख्यक जातियों को आतंकित करना, जिससे कि वह अपने अधिकारों (भूमि, सत्ता, विद्या-अर्जन और अवसर) की मांग न करें।

यही है सबसे मारक हिंसा!
ऐसे ज़्यादातर मामलों में अपराधी छूट जाते हैं। बिहार के दलित नरसंहारों में अक्सर अभियुक्त ऊंची अदालतों से बरी होते देखा गया है। ऐसी स्थिति की व्याख्या करते हुए डॉ. आंबेडकर ने लिखा है, ‘अधिकारी अस्पृश्य विरोधी और हिन्दू समर्थक होता है। जब भी उसे अपने अधिकार या विवेक का प्रयोग करना होता है, तो वह उसका प्रयोग पूर्वाग्रह से अस्पृश्य के विरुद्ध करता है। पुलिस कर्मचारी और मजिस्ट्रेट अक्सर भ्रष्ट होते हैं। यदि केवल भ्रष्ट हों तो स्थिति संभवत: उतनी खऱाब न हो, क्योंकि भ्रष्ट अधिकारियों को तो कोई भी पक्ष खरीद सकता है। 

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि पुलिस कर्मचारी तथा मजिस्ट्रेट भ्रष्ट होने की अपेक्षा अधिक पक्षपातपूर्ण होते हैं। हिन्दुओं के प्रति उनके इस पक्षपातपूर्ण और अस्पृश्यों के प्रति विरोधपूर्ण रवैये के कारण ही अस्पृश्यों को न्याय और सुरक्षा नहीं मिल पाती। एक के प्रति पक्षपात और दूसरे के प्रति विरोध का कोई निदान नहीं है, क्योंकि यह सामाजिक और धार्मिक नफरत की भावना पर आधारित है, जो हर हिन्दू में जन्मजात होती है।’
 

 

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