विशेष रिपोर्ट

रायपुर, पगारिया भाईयों के अदालती-बंटवारे में आदिवासी जमीन भी बंटी!
रायपुर, पगारिया भाईयों के अदालती-बंटवारे में आदिवासी जमीन भी बंटी!
Date : 22-May-2019

शिकायत के बाद आईटी ने सवा सौ एकड़ जमीन अटैच की

विशेष संवाददाता
रायपुर, 22 मई (छत्तीसगढ़)।
आयकर विभाग ने बेनामी पूंजी निवेश को पकडऩे की एक बड़ी कार्रवाई करते हुए रायपुर के एक बड़े कारोबारी पगारिया परिवार की बेनामी जमीनों को जब्त किया है। इस परिवार ने आदिवासियों की जमीनों को अपने परिचित आदिवासियों के नाम पर खरीदा, और उसे अपने कब्जे में भी रखा। बेनामी पूंजी निवेश का यह ऐसा बड़ा मामला है जिसमें राजनीतिक प्रभाव से होने वाली कमाई से ये जमीनें खरीदने की बात जांच में स्थापित हुई है। आयकर विभाग की कार्रवाई में अभी दो आदिवासियों के नाम पर खरीदी गई ऐसी करीब 14 करोड़ रूपए की जमीन पकड़ाई है। और इन दो आदिवासियों ने एक लखेश्वर बघेल मौजूदा कांग्रेस विधायक हैं, और बस्तर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष भी हैं। दूसरे आदिवासी, राजेश कर्मा एकदम ही गरीब किसान हैं जिसके नाम पर करोड़ों की जमीन खरीदी गई है। इन तीनों नामों से कई जिलों में खरीदी गई 136 एकड़ से अधिक जमीनें आयकर विभाग ने अटैच कर ली हैं।

रायपुर के उपमहापौर रहे, और मैट्स यूनिवर्सिटी के चांसलर गजराज पगारिया, और उनके छोटे भाई सुशील पगारिया ने अपने अलावा अपनी मां की ओर से भी ऐसी बेनामी जमीनें खरीदी थीं। आयकर विभाग को शिकायत मिलने के बाद जब जांच की गई तो पाया गया कि पारिवारिक संपत्ति बंटवारे में रायपुर के जिला न्यायाधीश की अदालत में जो बंटवारानामा दस्तखत किया गया, उसमें भी इन सारी आदिवासी जमीनों को आपस में बांटा गया, और अदालत के डिक्रीनामे में ऐसी सारी आदिवासी जमीन सुशील पगारिया के हिस्से में दे दी गई। 
आयकर विभाग द्वारा अटैच की गई जमीनों में से सौ एकड़ से कुछ कम जमीन लखेश्वर बघेल के नाम की है, 25 एकड़ से कुछ अधिक जमीन स्व. ईश्वरी बघेल के नाम की है, और 18 एकड़ से अधिक जमीन राजेश कर्मा के नाम की है।

जानकार सूत्रों के मुताबिक आयकर विभाग की जांच में सुशील पगारिया ने बताया कि पारिवारिक-कारोबारी विवाद में मां और भाई की लिखाई गई रिपोर्ट के आधार पर उसे जेल में रखा गया था। उसके जेल में रहते हुए ही गजराज पगारिया और उनकी मां ने एक बंटवारानामा तैयार करके जिला न्यायाधीश की एक जिला अदालत में पेश किया, और सुशील पगारिया को इस पर दस्तखत के लिए जेल से एक जिला अदालत लाया गया। इस बंटवारेनामे में सैकड़ों जमीनों के खसरा नंबर थे जिन्हें बांटा गया था, और मौके पर ही सुशील पगारिया को इस पर दस्तखत करने पड़े। बाद में जेल से छूटने पर उन्होंने यह पाया कि आदिवासियों के नाम पर खरीदी गई जमीनों को बड़े भाई ने सुशील के नाम पर ही डाल दिया। 

इसके बाद आयकर विभाग की एक जांच में सुशील पगारिया ने यह बेनामी पूंजी निवेश मंजूर भी किया। 

बस्तर जिले की तहसील बस्तरनार में एक आदिवासी राजेश कर्मा से आयकर विभाग ने उनके नाम पर दर्ज कई जमीनों के बारे में पूछताछ की। इस पर राजेश कर्मा ने एक से अधिक तरह के बयान विभाग को दिए जिसमें एक में उन्होंने इन जमीनों को अपना नहीं माना, और बयान में कहा कि उनकी सालाना आय कुल दस हजार रूपए है, और उन्होंने बैंक के अपने खाते का भी कभी उपयोग नहीं किया है। उन्होंने विभाग को दिए गए बयान में कहा कि न तो उनकी आय करयोग्य रही, न ही उन्होंने कभी आईटी रिटर्न भरा, और न ही उनके पास पैन है। 

वे थोड़ी सी खेती और महुआ बीनकर काम चलाते हैं, और खुद कोई जमीन नहीं ले पाए हैं। उन्होंने बयान में बताया कि उनके पिता गरीबी रेखा के नीचे दर्ज हैं, और उन्हें इंदिरा आवास, सरकारी गैस कनेक्शन मिला है। राजेश कर्मा ने पुरखों की तीन एकड़ जमीन के अलावा अपने पास कोई भी जमीन होने से मना कर दिया था। 
लेकिन आयकर विभाग को दिए गए एक बयान के बाद अपने वकील की तरफ से उन्होंने उनके नाम पर खरीदी गई जमीन अपनी होने का दावा किया, जिसे आयकर विभाग ने मानने लायक नहीं पाया, और ऐसी जमीनों को अटैच कर लिया। 

इस मामले में गजराज पगारिया के छोटे भाई सुशील पगारिया का भी एक लंबा बयान आयकर विभाग ने लिया है जिसमें उन्होंने खुलासे से आदिवासी जमीनों को लेने की जानकारी दी है, और बहुत सी सनसनीखेज बातें भी हलफनामे पर विभाग को बताई है। सुशील पगारिया ने बताया कि गजराज पगारिया के साथ उनका एक संयुक्त कारोबार रहा है, और दो नंबर के पैसों से उनके परिवार ने लखेश्वर बघेल, और राजेश कर्मा के नाम पर आदिवासी जमीनें खरीदी हैं। उन्होंने आयकर जांच में बताया कि चूंकि वे आदिवासी जमीन कानूनन नहीं खरीद सकते, इसलिए उनके परिवार ने नगद भुगतान करके लखेश्वर बघेल, श्रीमती भगवती बघेल, और राजेश कर्मा के नाम पर  ऐसी जमीनें खरीदीं। सुशील पगारिया ने बताया कि उनका पारिवारिक व्यवस्थापन विलेख रायपुर की अदालत में पेश किया गया था, और उसमें भी इन जमीनों का उल्लेख है। उन्होंने कहा कि वे इन जमीनों की पूरी सूची खसरा-रकबा सहित विभाग को दे रहे हैं। 

सुशील पगारिया ने विभाग के सवाल के जवाब में हलफनामे पर आयकर को कहा  कि इन जमीनों के लिए नगद रूपया राजनीतिक रूप से की गई अघोषित कमाई से आया है। सुशील ने बताया कि उनके बड़े भाई गजराज पगारिया राजनीति में हैं, जनता कांग्रेस दल (जोगी) के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष भी हैं, और शिक्षा के क्षेत्र में भी काम करते हैं। सुशील पगारिया ने यह भी कहा कि गजराज पगारिया 1994 से 1999 तक रायपुर के उपमहापौर थे। इन सब कामों से इनके पास बड़ी मात्रा में नगद रकम इक_ा हुई, और इसका कोई हिसाब नहीं है। इन्हीं नगद रूपयों से वे आदिवासी जमीनें आदिवासियों के नाम पर खरीदी गईं। इस बयान में कहा गया कि 1994 से लेकर 2004 तक इस तरह कमाई गई रकम से आदिवासी जमीनें खरीदी गईं। 
आयकर विभाग को दिए बयान में सुशील पगारिया ने यह भी बताया कि गजराज पगारिया पहले 1990 से 1994 तक कांग्रेस नेता श्री विद्याचरण शुक्ल के साथ रहे, फिर पांच साल रायपुर के उपमहापौर रहे, और इस पूरे दौर में उन्होंने नगद सृजन किया। बाद में जोगी कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रहे, और वहां भी नगद सृजन का बहुत बड़ा काम हुआ। उन्होंने बताया कि लखेश्वर बघेल से उनके परिवार का बहुत अच्छा संबंध है, और लखेश्वर बघेल पगारिया परिवार की ही एक रिहाइशी इमारत महावीर प्लाजा में रहते हैं। 

सुशील पगारिया ने आयकर विभाग को बताया कि अदालत में 2017 में पारिवारिक संपत्ति के व्यवस्थापन की डिक्री हो जाने के बाद भी जमीनों के कागजात गजराज पगारिया ने उन्हें नहीं दिए हैं, इसलिए वे विभाग को कागजात नहीं दे सकते। सुशील पगारिया ने बताया कि बंटवारे के समय वे जेल में थे, और गजराज पगारिया, उनकी मां ने बंटवारे के कागज बनवाए थे, उन्हें इस पर दस्तखत करने के लिए जेल से सीधे लाया गया था, इसलिए उन्हें यह मालूम भी नहीं था कि अदालत से आदिवासी जमीन की जानकारी छुपाकर, उसे फैसले में रखवाकर अदालत को गुमराह किया गया है। ऐसी जमीनें बस्तर के अलावा महासमुंद जिले में भी लखेश्वर बघेल के नाम पर जमीन खरीदी गई है, लेकिन इनके कागज गजराज पगारिया के पास ही हैं। 

आयकर विभाग ने सुशील पगारिया से नगद रकम आने और उसे रखने के बारे में भी कई सवाल किए। सुशील पगारिया ने यह भी बताया कि जिन आदिवासियों के नाम पर जमीनें खरीदी गईं उसमें उन आदिवासियों का कोई पैसा नहीं लगा है। 

विभाग को गजराज पगारिया की ओर से दिए गए लिखित जवाब में कहा है कि वे चूंकि राजनीति में सक्रिय रहे, इसलिए उन्होंने कारोबार चलाने का जिम्मा (इस केस के शिकायतकर्ता, अपने छोटे भाई सुशील पगारिया को दे दिया था।) उन्होंने विभाग को अपने वकील की तरफ से तैयार किए गए अंग्रेजी के एक लंबे जवाब में यह भी कहा कि आज उनका भाई सुशील पगारिया इस मामले का शिकायतकर्ता है, लेकिन हकीकत यह है कि इन जमीनों की सुशील पगारिया द्वारा खरीदी की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने यह भी कहा कि पारिवारिक बंटवारे में सुशील पगारिया ने इन जमीनों को जुड़वाया। गजराज पगारिया ने विभाग को एक जवाब में कहा है कि बंटवारे में लिखित शर्तों से यह साफ होता है कि ये जमीनें न केवल शिकायकर्ता सुशील पगारिया के मालिकाना हक की हैं, बल्कि शुरू से ही उनके कब्जे में भी है, और उनसे गजराज पगारिया का कोई लेना-देना नहीं है। उन्होंने किसी भी बेनामी संपत्ति से अपने किसी भी रिश्ते की बात नकार दी है। 

राजेश कर्मा ने बाद में एक हलफनामा देकर अपने नाम पर बताई गई सारी संपत्ति को अपना कहा और यह कहा कि आयकर विभाग ने उनका जो बयान लिया था उसे वह पूरी तरह समझे बिना दे चुके थे, और इस हलफनामे से वे इस सारी संपत्ति को अपना खरीदा हुआ बता रहे हैं। 

कांग्रेस विधायक लखेश्वर बघेल ने आयकर विभाग को दिए गए हलफिया बयान में कहा कि वे चुनाव आयोग के समक्ष अपनी सारी संपत्ति का हलफनामा 2018 में दे चुके हैं, और उसके अलावा उनके पास कोई भी और चल-अचल संपत्ति नहीं है। लखेश्वर बघेल ने सुशील पगारिया के हलफनामे की बातों को गलत कहा है, और कहा है कि उन्होंने उनके और पत्नी के नाम की सारी जमीनों को अपनी पारिवारिक कमाई से खरीदा है। उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि पगारिया परिवार के बंटवारे में उनकी संपत्तियों को दिखाना कोई साजिश है, और वे उसके खिलाफ अलग से मुकदमा करेंगे। 

फिलहाल विभाग ने लखेश्वर बघेल, उनकी पत्नी स्व. भगवती बघेल, और राजेश कर्मा के नाम पर खरीदी गई ऐसी सारी संपत्ति जिसका जिक्र पगारिया परिवार के बंटवारे में सुशील पगारिया को देने का किया गया है, उसे अटैच कर लिया है। 

सुशील पगारिया का कहना है कि...
आयकर विभाग की इस कार्रवाई के बारे में पूछने पर सुशील पगारिया ने इस अखबार ‘छत्तीसगढ़’ को बताया कि जब वे जेल में बंद थे, और कैंसर से बुरी तरह पीडि़त थे, मुंबई में उनका कैंसर का इलाज चल रहा था, तब उन्हें अचानक अदालत बुलाकर संपत्ति का बंटवारा दस्तखत करवाया गया था। ये कागज उन्होंने पहले नहीं देखे थे इसलिए उनको इसमें आदिवासी जमीन उनके हिस्से में डाल देने की जानकारी भी नहीं थी। उन्होंने कहा कि वे पिछले कई बरस से कैंसर के शिकार हैं, और दुबारा इलाज के लिए जब उन्हें यहां से डॉक्टर मुंबई भेज रहे थे, तब उनके बड़े भाई गजराज पगारिया और उनकी मां ने इलाज के लिए भी उनकी जमानत का विरोध किया था और हाईकोर्ट तक में अपने वकील खड़े किए थे। अब जब अदालत से बंटवारा हो गया है, तो भी गजराज पगारिया किसी संपत्ति के कोई कागज उन्हें नहीं दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने तमाम बातें सच-सच आयकर विभाग को शपथपत्र पर बता दी हैं, और हर सवाल का जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि पारिवारिक संपत्ति के बंटवारे में बेनामी आदिवासी जमीनों को बड़े भाई और मां ने उनके (सुशील पगारिया के) हिस्से में डाल दिया है, और यह बात पता लगते ही उन्होंने खुद ही इसे आयकर को बताया है, और हाईकोर्ट में भी इसके खिलाफ शिकायत की है कि अदालती बंटवारे में ऐसा किया गया है। उन्होंने कहा कि जिस अदालत में बंटवारा हुआ, उसे भी गजराज पगारिया ने अंधेरे में रखा और वहां सच को छुपाया।

Related Post

Comments