संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 25 मई : राहुल की लीडरशिप पर सवाल, पहला पत्थर मारने का हक...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 25 मई : राहुल की लीडरशिप पर सवाल, पहला पत्थर मारने का हक...
Date : 25-May-2019

कांग्रेस की सबसे बड़ी कमेटी की बैठक अभी चल रही है, और उससे यह खबर छनकर आ रही है कि अध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव के नतीजों को लेकर इस्तीफे की पेशकश की, कांग्रेस कार्यसमिति ने खारिज कर दिया। ऐसी चर्चा पिछले दो दिनों से चली आ रही थी, और इसमें अटपटा कुछ नहीं था क्योंकि किसी भी पार्टी के मुखिया को एक बहुत बड़ी शिकस्त की जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए। अब सवाल यह उठता है कि यह कितनी बड़ी शिकस्त है? 

राहुल गांधी 2014 के आम चुनावों के बाद पार्टी के अध्यक्ष बने, और यह उनका पहला आम चुनाव रहा। वे खुद पहले संसद का चुनाव जीतते आए हैं, और इस बार भी दो में से एक सीट पर उनकी जीत बरकरार है। वे परिवार की पुरानी परंपरागत सीट अमेठी को खो बैठे हैं, और इसे भी लीडरशिप से इस्तीफे की एक बड़ी वजह करार दिया जा रहा है। लेकिन आंकड़ों को देखकर यह समझने की जरूरत है कि अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी ने क्या पाया है, और क्या खोया है। पिछले आम चुनाव, 2014 में कांग्रेस के वोट 19.5 फीसदी रह गए थे, और भाजपा के वोट 31.34 फीसदी थे जिससे नरेन्द्र मोदी की सरकार बनी थी। इसके बाद अभी के ताजा नतीजों में कांग्रेस के वोट 19.5 फीसदी बरकरार हैं, और भाजपा के वोट बढ़कर 37.4 फीसदी हो गए हैं। 2014 में कांग्रेस ने 44 सीटें पाई थीं, और उसकी अगुवाई वाली यूपीए गठबंधन को 90 सीटें मिली थीं। अभी 2019 में कांग्रेस की सीटें 10 फीसदी से अधिक बढ़कर 52 हो गई हैं, और यूपीए गठबंधन की सीटें 92 हो गई हैं। देश भर में एनडीए और नरेन्द्र मोदी की जैसी लहर दिखाई पड़ रही है, और नतीजों में उन्हें जितनी अधिक सीटें मिली हैं, उन्हें देखते हुए ऐसा लग रहा है कि यह यूपीए और राहुल गांधी की बहुत बुरी शिकस्त है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि यूपीए और कांग्रेस इन दोनों को पिछले आम चुनाव से अधिक सीटें मिली हैं, और उनका वोट जरा भी कम नहीं हुआ है। यहां पर यह भी याद रखने की जरूरत है कि भाजपा एक वक्त लोकसभा में महज दो सदस्यों की पार्टी थी, और वहां से बढ़ते हुए वह तीन सौ से अधिक तक पहुंची है। इसलिए आंकड़ों की संभावनाएं हर किसी के सामने रहती हैं। 

वे तमाम लोग जो कि पिछले पांच बरस या उसके भी पहले से राहुल गांधी को पप्पू साबित करने पर उतारू थे, उनका यह हक बनता है कि वे राहुल गांधी से इस्तीफे की मांग करें, और कांग्रेस पार्टी को खत्म करने की भी मांग करें। लोकतंत्र में लोग एक-दूसरे पर इतना हमला तो करेंगे ही करेंगे। लेकिन जहां तक यूपीए, कांग्रेस, और राहुल का सवाल है, तो ये राष्ट्रवाद और ध्रुवीकरण की ऐसी सुनामी के बीच भी अपने पैरों पर पांच बरस पहले की जगह पर अगर टिके हुए हैं, तो यह सोचने की जरूरत है कि क्या यह बहुत बुरी शिकस्त है? लोगों के अपने-अपने पैमाने रहते हैं, और मीडिया ने मोदी के मुकाबले राहुल गांधी को पेश करके खबरों के लिए जो नाटकीयता खड़ी की थी, वह उसकी अपनी रोजी-रोटी की मजबूरी थी। इस आम चुनाव में इन दोनों गठबंधनों के अलावा इतनी बड़ी संख्या में क्षेत्रीय पार्टियां गठबंधन के बाहर भी थीं, और चुनावी नतीजे भी बताते हैं कि इन दोनों से परे के सांसदों की गिनती यूपीए के सांसदों से अधिक है। किसी राज्य में तीन उम्मीदवार मैदान में थे, तो कहीं चार। ऐसे में यह जाहिर है कि कुछ दशक पहले जिस तरह कांग्रेस के मुकाबले बाकी तमाम पार्टियों में वोट बंटते थे, उसी तरह इन दो आम चुनावों में भाजपा के मुकाबले बाकी पार्टियों में वोट बंटे हैं। नतीजा यह है कि मोदी और एनडीए ने सरकार बनाने की जरूरत से बहुत अधिक सीटें हासिल कीं। लेकिन एक और बात जो याद रखने की है वह यह कि कुछ महीने पहले ही राहुल गांधी की ही अगुवाई में उनकी अपनी कांग्रेस पार्टी ने मोदी की भाजपा की सरकारों को तीन राज्यों, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, और राजस्थान से बेदखल किया था। उस जीत के वक्त भी कांग्रेस के मुखिया राहुल गांधी ही थे जो कि लोकसभा चुनाव में भी थे। 

अब राहुल के खिलाफ एक और बात जो रह जाती है वह वंशवाद की है। आज बहुत से लोग इस बात को कह और मान रहे हैं कि कांग्रेस जब तक एक परिवार के कब्जे में रहेगी, वह आगे नहीं बढ़ पाएगी, जिंदा भी नहीं रह पाएगी। लोकतंत्र में वंशवाद जाहिर तौर पर बुरी बात है। और इस बुरी बात के बारे में थोड़ा सा सोचें तो ठाकरे वंश के कब्जे की शिवसेना याद पड़ती है, बादल वंश के कब्जे का अकाली दल याद पड़ता है, एक वक्त एनडीए के साथ रहे चन्द्राबाबू नायडू का परिवार याद पड़ता है, अभी कल तक भाजपा की भागीदार रही मेहबूबा की पीडीपी याद पड़ती है, एनडीए की पिछली पारी में उसके साथ रहे कश्मीर के अब्दुल्ला परिवार की तीसरी पीढ़ी याद पड़ती है, और यह फेहरिस्त काफी लंबी हो सकती हैं। इसलिए वंशवाद पर पहला पत्थर चलाने का हक उस गठबंधन को ही हो सकता है जिसमें वंशवादी नेता और पार्टियां न हों। अभी कल तक चुनावी नतीजों के जो विश्लेषण आ रहे थे, उनमें भाजपा नेताओं की भी दूसरी पीढ़ी के ढेरों नाम आ रहे थे। ऐसे में कांग्रेस पार्टी अपना मुखिया किसे रखती है, यह पार्टी के भीतर तय होना है, और अगर उस पार्टी को लगता है कि देशभर में बिखरे उसके महत्वाकांक्षी नेताओं के बीच शक्ति संतुलन बनाकर रखने और उन्हें एक साथ बांधकर रखने के लिए सोनिया परिवार का कोई जरूरी है, तो यह उस पार्टी की अपनी जरूरत और अपनी सोच है। हम इसी जगह पर कुनबापरस्ती के खिलाफ दर्जनों बार लिखते आए हैं, लेकिन यह हमला छांट-छांटकर कुछ पार्टियों और कुछ नेताओं पर करना जायज नहीं है। गुड़ खाने वाले गुलगुलों को कोसें, यह कुछ नाजायज बात है।

फिर भी कांग्रेस पार्टी के सामने एक लंबा भविष्य है, और जब 15 बरस पहले देश सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री मान चुका था, कांग्रेस संसदीय दल उन्हें औपचारिक रूप से नेता चुन चुका था, जब डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के राष्ट्रपति भवन में सोनिया गांधी के नाम की चि_ी शपथ ग्रहण के लिए टाईप हो चुकी थी, तब सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया था, और राष्ट्रपति को चि_ी दुबारा टाईप करवानी पड़ी थी, यह बात डॉ. कलाम ने खुद अपनी किताब में लिखी है। इसलिए यह परिवार आज अध्यक्ष की कुर्सी किसी और को देता है तो भी वह अटपटी बात नहीं होगी, और नहीं भी देता है, तो भी वह इस कुनबापरस्त देश की बाकी पार्टियों के बीच अटपटी बात नहीं होगी। किसी एक हार से, और जैसा कि हमने शुरू में गिनाया है, यह कांग्रेस की आंकड़ों की हार नहीं है, सीटों की हार नहीं हैं, और राजनीति में लोकतांत्रिक मुद्दों की, नैतिकता की हार भी नहीं है, ऐसे में उसके नेता के इस्तीफे की कोई जरूरत भी नहीं है। इस बहुत ही चुनौतीपूर्ण चुनाव में भी कांग्रेस और यूपीए अगर मोटेतौर पर लोकतांत्रिक मूल्यों पर बने रहे, तो यह आंकड़ों के मुकाबले लोकतंत्र की अधिक बड़ी जीत है। और जैसा कि कल पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने ट्वीट किया है- लोकतंत्र में किसी हारे हुए का मखौल नहीं उड़ाना चाहिए। ऐसा करने वाले विजेता को आगे इसका खासा दाम चुकाना पड़ता है। इस देश में पहले इससे बड़ी चुनावी जीत भी देखी है लेकिन अहंकार आगे चलकर शिकस्त दिलाता है। इसलिए मखौल उड़ाने वाले सावधान रहें।
-सुनील कुमार

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