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दैनिक 'छत्तीसगढ' का आजकल, 27 मई : कांग्रेस को दो बिन मांगी सलाहें
दैनिक 'छत्तीसगढ' का आजकल, 27 मई : कांग्रेस को दो बिन मांगी सलाहें
Date : 27-May-2019

सुनील कुमार

आम चुनाव में जीत पाने मेें नाकामयाबी के बाद कांग्रेसाध्यक्ष राहुल गांधी की पहली कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक इस्तीफे की खबरों से भरी रही। बैठक के पहले और बाद इस्तीफे की चर्चा रही, और यह बात भी सामने आई कि किस तरह कार्यसमिति के सभी लोगों ने राहुल के इस्तीफे को नकार दिया, और लीडरशिप जारी रखने को कहा। लेकिन एक दूसरी खबर यह आई कि राहुल ने तीन बड़े नेताओं के नाम लेकर नाराजगी जाहिर की, और कहा कि उन्होंने अपने बेटों को टिकट दिलाने और जिताने में अधिक दिलचस्पी दिखाई, बजाय पार्टी को जिताने के। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ, और एक पूर्व कांग्रेसी केन्द्रीय मंत्री रहे पी.चिदंबरम तो अपने बेटों को सांसद बना पाए, लेकिन राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने बेटे को टिकट दिलाने में पूरी ताकत लगाने के बाद, उम्मीदवार बनने के बाद भी उसे जिता नहीं पाए। यह बात थोड़ी सी अटपटी लगती है कि कांग्रेस पार्टी में कोई हाईकमान के मर्जी के बिना भी, मर्जी के खिलाफ भी अपने बेटों को टिकट दिला सकते हैं। लेकिन जब राहुल ने ऐसा कहा है तो जाहिर है कि ऐसा हुआ होगा। 

दूसरी तरफ राहुल की कही इस बात को लेकर सोशल मीडिया में उम्मीद के मुताबिक तुरंत ही यह आलोचना चालू हो गई है कि सोनिया गांधी की बगल में बैठकर राहुल गांधी भला किस मुंह से यह बात कह सकते हैं? यह बात राहुल की लीडरशिप को वंशवाद का बोझ बताने वाले दूसरे भी बहुत से लोग लिख रहे हैं, और ऐसे बड़े नामी अखबारनवीसों की कमी नहीं है जो कि राहुल गांधी की जगह किसी और नेता में कांग्रेस की बेहतर संभावनाएं देखते हैं। 

हमने इसी अखबार में अभी-अभी राहुल के इस्तीफे के खिलाफ लिखा था और इस बात को बड़े खुलासे से सामने रखा था कि कांग्रेस जीती नहीं, यह तो एक अलग बात है, लेकिन वह हारी भी नहीं है क्योंकि 2014 के चुनाव के मुकाबले कांग्रेस और यूपीए की सीटें बढ़ी हैं, इसलिए इस्तीफे की कोई बुनियाद नहीं बनती। लेकिन बात इस्तीफे से अलग है, और ऊपर भी है। अब जब राहुल ने खुलकर औलादों को आगे बढ़ाने के खिलाफ नाराजगी जाहिर कर ही दी है, और देश के बहुत से मीडिया में लगातार यह बात सामने आ रही है कि कांग्रेस के प्रदेशों के नेता भी किस तरह अपनी औलादों को, अपने कुनबों को आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं, तब कांग्रेस को एक कड़ा फैसला लेने की जरूरत है। 

कांग्रेस में अगर हिम्मत हो, तो वह अगले किसी चुनाव आने के पहले, आज की तारीख में ही यह घोषणा कर सकती है कि आज के बाद उसके किसी भी नेता के परिवार से एक से अधिक लोगों को विधानसभा या संसद की टिकट नहीं दी जाएगी। एक से अधिक लोग अगर टिकट चाहते हंै, तो वे घर में तय करने के बाद ही पार्टी में आवेदन करें, या फिर पार्टी की प्रत्याशी-चयन समिति के सामने कोई भी अर्जी तभी आए जब उसके साथ यह हलफनामा हो कि उनके परिवार के और कोई व्यक्ति संसद या विधानसभा में नहीं है। इस बात को अगर कांग्रेस कड़ाई से लागू कर सकती है, और अगले चुनाव में सोनिया या राहुल में से कोई एक ही चुनाव लडऩे की शर्त पर अमल करने को तैयार हों, तो देश के कांग्रेस कार्यकर्ताओं और छोटे नेताओं में एक नया उत्साह आ सकता है। छत्तीसगढ़ में भाजपा ने लोकसभा चुनाव में पूरे ग्यारह के ग्यारह के उम्मीदवार बदल दिए, और उनमें से नौ लोग खासे वोटों से जीतकर आए। कांग्रेस पार्टी को भी वंशवाद को कम करने के लिए ऐसा स्पष्ट पैमाना अभी से घोषित कर देना चाहिए ताकि जिन्हें पार्टी में रहना है रहें, जिन्हें जाना है वे सांसद या विधायक माता, पिता, या पति-पत्नी को कांग्रेस में छोडक़र दूसरी पार्टी चले जाएं। 

दरअसल कांग्रेस को पुराने ढर्रे से हटकर सोचना होगा वरना उसका कोई भविष्य नहीं है, सिवाय यह इंतजार करने के कि मोदी सरकार या भाजपा अपने ही कामों से जनता की नजरों में गिर जाएं, और जनता एक विकल्पहीन हाल में कांग्रेस को फिर चुन ले। ऐसा होते इसलिए नहीं दिख रहा है कि पूरे देश में एनडीए और यूपीए से परे तीसरी पार्टियां कांग्रेस-यूपीए से अधिक ताकतवर हो चुकी हंै, और बनी भी रहेंगी। इसलिए मोदी के विकल्प के रूप में कांग्रेस अपने आप विजेता हो जाएगी, यह भी सोचना ज्यादती होगी। इसलिए कांग्रेस को अगले किसी चुनाव की बारी आने के काफी पहले, शायद अगले कुछ हफ्तों में ही, ऐसी एक नीति घोषित करना चाहिए जिससे पार्टी की हर स्तर की लीडरशिप में नए लोगों को जगह मिले, नई पीढ़ी को जगह मिले, और पार्टी पर से वंशवाद के आरोप कम से कम आने वाले दिनों में तो हट जाएं। पिछले दिनों में तो कुछ हो नहीं सकता, लेकिन अगला आम चुनाव वैसे भी शायद सोनिया गांधी को एक उम्मीदवार के रूप में न देखे, और उन्हें घर बैठे पार्टी की फिक्र करते पाए। ऐसे में राहुल गांधी को दिल कड़ा करके यह तय करना होगा कि परिवार की एक मान्य परिभाषा के मुताबिक पति-पत्नी, बच्चों, भाई-बहनों में से कोई एक ही संसद या विधानसभा की टिकट पाए। 

कांग्रेस को अभी से अपने मौजूदा सांसद-विधायक के नाम देखने होंगे कि जिन परिवारों के एक से अधिक लोग आज सदनों में हैं, उनमें से एक या सभी के कौन से बेहतर विकल्प हो सकते हैं। अभी से ऐसे पैमाने को घोषित करना चाहिए, ताकि लोग अपना भविष्य तय कर सकें। इसके अलावा कांग्रेस को संगठन के जो सबसे महत्वपूर्ण पद हैं, कम से कम राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश अध्यक्ष, इन पर भी यह बंदिश लागू करनी चाहिए कि या तो ये पद पर रहें, या इनके परिवार के लोग उम्मीदवार बनने की सोचें। आज कांग्रेस पार्टी में मझले दर्जे के कार्यकर्ता भी निराश रहते हैं कि वे जितनी बन सके उतनी कोशिश कर भी लें, तो भी चुुनावी टिकट या पार्टी के पद तो गिने-चुने कुनबों में ही बंट जाएंगे। 

अभी छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में कांग्रेस सरकार निगम-मंडल और आयोगों में, लाभ के और सहूलियतों के दूसरे पदों पर पार्टी के नेताओं को मनोनीत करेगी। इनको लेकर भी एक साफ पैमाना बनना चाहिए कि सांसद, विधायक, मंत्री ऐसे पदों पर मनोनीत नहीं किए जाएंगे, और न ही उनके कुनबे के दूसरे लोग ऐसी कुर्सियां पाएंगे। छत्तीसगढ़ जैसे एक प्रदेश में पार्टी के सांसद, विधायक, और दूसरे मनोनीत पद, कुल मिलाकर दो सौ के भीतर रहते हैं। और जैसा कि पार्टी दावा करती है, उसके लाखों कार्यकर्ता हैं, तो फिर गिने-चुने कुनबों से परे औरों के बीच सत्ता का विकेन्द्रीकरण क्यों नहीं होना चाहिए?

राहुल गांधी अपने पहले के फैसलों को तो अब नहीं बदल सकते, और न ही गुजर चुके कल को सुधार सकते हैं। लेकिन आने वाले वक्त को लेकर वे पार्टी की एक स्पष्ट नीति अभी से सामने रख सकते हैं, और उसके मुताबिक तैयारी कर सकते हैं। इस अकेली बात से इस पार्टी में जान नहीं आ जाने वाली है, लेकिन इस एक बात से पार्टी में नीचे तक उत्साह दौड़ पड़ेगा, और जिन राज्यों में आने वाले महीनों में विधानसभा के चुनाव होने हैं, कोई भी उपचुनाव होने हैं, या छत्तीसगढ़ की तरह म्युनिसिपल-पंचायत चुनाव होने हैं, उन सब पर अगर ऐसा पैमाना अभी से घोषित हो जाएगा तो पार्टी में बहुत से लोगों की महत्वाकांक्षा जागेगी, और लोग मेहनत करेंगे।  राहुल गांधी को पार्टी से उस वंशवाद को उखाड़ फेंकने का अभी भी मौका है, और वे ऐसा करके पार्टी के भीतर और बाहर, दोनों ही जगहों पर अपना कद बढ़ा सकेंगे। 

कांग्रेस संगठन की बाकी मरम्मत कैसे करनी है, इसकी बहुत सी जरूरतें और तरकीबें लोग सुझाएंगे, और हो सकता है कि पार्टी के खुद के दिमाग में भी ये बातें हों। लेकिन कांग्रेस को तुरंत ही जिस एक बात से नसीहत लेनी चाहिए वह यह है कि ममता बैनर्जी और नवीन पटनायक किस तरह लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में महिलाओं को उम्मीदवार बनाया, और वे किस बड़े अनुपात में जीतकर आई हैं। जिन पार्टियों को महिला आरक्षण पर सचमुच ही भरोसा है, और जो ईमानदारी से इसे लागू करना चाहती हैं, उनको आज भी अपनी पार्टी के भीतर महिला आरक्षण से भला किसने रोका है? इसलिए राहुल गांधी को आने वाले तमाम चुनावों के लिए 50 या 40 फीसदी टिकटें महिलाओं को देने की घोषणा अभी से करनी चाहिए। जो पार्टियां महिला आरक्षण के नाम पर संसद में मामले को अंतहीन टालते जा रही हैं, वे अपनी बेईमानी के दाम चुकाएंगी। ममता और नवीन पटनायक ने इस बार जो किया है, अगले चुनावों में कुछ और पार्टियों को वैसा करना सूझेगा या उनकी मजबूरी रहेगी। कांग्रेस को बिना देर किए यह काम अभी से घोषित कर देना चाहिए।

 

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