संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  29 मई : आदिवासी डॉक्टर की प्रताडऩा और आत्महत्या से उठे सवाल
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 29 मई : आदिवासी डॉक्टर की प्रताडऩा और आत्महत्या से उठे सवाल
Date : 29-May-2019

देश के सबसे बड़े महानगर मुम्बई के एक अस्पताल में काम कऱ रही एक आदिवासी डॉक्टर छात्रा को उसकी जाति को लेकर इतना प्रताडि़त किया गया कि उसने आत्महत्या कर ली। अब जांच के बाद पुलिस ने तीन सवर्ण सहकर्मियों को गिरफ्तार किया है जिन पर प्रताडि़त करने, और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप लगे हैं। आज हिन्दुस्तान में जब लाखों लोग मेडिकल कॉलेज में दाखिले का इम्तिहान देते हैं, तो उनमें से कुछ हजार लोगों को ही इस पढ़ाई का मौका मिलता है। एक वंचित आदिवासी तबके से आई हुई लड़की अगर पढ़ाई पूरी करने के बाद अस्पताल में काम कर रही है, तो उसने इस पूरे दौर में भी अपने गरीब परिवार के साथ कई किस्म की दिक्कतें झेली होंगी। इसके बाद अगर उसे उसकी जाति को लेकर, आरक्षण के फायदे को लेकर इस तरह प्रताडि़त किया गया, तो उसमें हिन्दुस्तान में आज कुछ भी अटपटा नहीं है, और यह एक आम बात हो चुकी है, यह आम बात रहते आई है, और शायद आगे भी रहेगी। 

देश में आज आरक्षण का फायदा पाने वाले लोगों के बारे में बाकी लोगों के बीच बैठकर जरा सी चर्चा करें, तो लोगों के बीच का जातिवाद एक हिंसक तरीके से सामने आता है। पढ़ाई और नौकरी के एक हिस्से पर हजारों बरस के अन्याय के शिकार लोगों को दिया गया हक बाकी लोगों पर भारी गुजरता है, और उनमें से बहुत से लोग अपनी नफरत निकालने का कोई मौका नहीं छोड़ते। लेकिन दलितों और आदिवासियों को खासकर यह भेदभाव झेलना पड़ता है क्योंकि वे समाज के सबसे निचले आय वर्ग से आते हैं। एक अन्य आरक्षित तबका, ओबीसी, ऐसा है जो कि बेहतर आर्थिक स्थिति वाला है, और उसे तकलीफ इतनी नहीं झेलनी पड़ती, उसे अछूत नहीं माना जाता, उसे जानवर नहीं माना जाता। रामायण की कहानी से लेकर आज तक आदिवासियों को इंसान का दर्जा देने से भी परहेज करने वाले लोग महज हिन्दुस्तान में ही नहीं हैं, बल्कि पश्चिम के गोरों के बीच भी यह हिंसक बेइंसाफी सिर चढ़कर बोलती है, और बहुत से ऐसे देश रहे जहां पहुंचे हुए हमलावर गोरों ने स्थानीय आदिवासियों या मूल निवासियों को गुलाम बनाकर उन्हें जानवरों से भी बदतर हालत में रखा है। 

एक दूसरी दिक्कत यह होती है कि इन आरक्षित तबकों से जो लोग राजनीति की बड़ी कुर्सियों पर या बड़ी सरकारी नौकरियों में आते हैं, वे अपनी इस नई ताकत का इस्तेमाल महज अपने बच्चों के लिए करते हैं, और उनकी बिरादरी बिना किसी फायदे के रह जाती है। आरक्षण का फायदा पाकर ऊपर आए हुए लोग लगातार उस फायदे को इस्तेमाल अपनी अगली पीढ़ी को दिलाने के लिए कभी भी मलाईदार तबके पर रोक का कानून बनने नहीं देते, और सबसे कमजोर तबका अपने आरक्षित तबके के भीतर भी कमजोर बने ही रहता है। देश भर में जगह-जगह कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से जाति के आधार पर भेदभाव के मामले सामने आते हैं, और आजादी की पौन सदी पूरी होने को है, लेकिन भारतीय समाज जातिवादी हिंसा से आजाद होने का नाम नहीं ले रहा है। देश में दलित-आदिवासी तबकों को सुरक्षा देने के लिए कानून तो कड़े बना दिए हैं, लेकिन उनको लागू करने वाली पुलिस जैसी एजेंसियों के भीतर सामाजिक हकीकत को लेकर समझ बहुत कमजोर है, और सरकार के भीतर भी संवेदनशीलता शून्य है। ऐसे में मुम्बई का यह मामला एक बार फिर एक नई बहस शुरू कर सकता है जिसकी कि देश को बहुत जरूरत है। 
-सुनील कुमार

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