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 क्या दिल्ली से बाहर निकलकर एक वैकल्पिक पार्टी बनने की आप की संभावनाएं अब खत्म हो गई हैं?
क्या दिल्ली से बाहर निकलकर एक वैकल्पिक पार्टी बनने की आप की संभावनाएं अब खत्म हो गई हैं?
Date : 31-May-2019

हिमांशु शेखर
आम आदमी पार्टी (आप) अपनी स्थापना के सिर्फ दो साल के भीतर दिल्ली की सत्ता में प्रचंड बहुमत से आने में कामयाब हुई थी। इसके बाद यह कहा जाने लगा कि दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 67 पर कामयाबी हासिल करने वाली आप अब दिल्ली से बाहर भी अपने पैर पसारेगी। पार्टी ने 2017 में कुछ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में ऐसा करने के प्रयास भी किए। पंजाब में तो एक दौर ऐसा आया था जब यह लगने लगा था कि शिरोमणि अकाली दल और भाजपा की गठबंधन सरकार को सत्ता से बेदखल करके आप यहां की बागडोर संभाल सकती है।
उस दौरान यह भी कहा जा रहा था कि अगर आप को पंजाब में सरकार बनाने लायक संख्या मिल जाती है तो अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री का पद छोडक़र वहां जा सकते हैं। जिस दिन पंजाब विधानसभा चुनावों के नतीजे आने थे, उस दिन आप के दिल्ली कार्यालय पर जश्न की पूरी तैयारियां भी हो गई थीं। लेकिन जब नतीजे आए तो आप का प्रदर्शन उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा और वहां कांग्रेस की सरकार बन गई।
पंजाब में आप को इसलिए भी उम्मीदें थीं कि दिल्ली को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाने वाली इस पार्टी को 2014 के लोकसभा चुनावों में यहां की एक भी सीट नहीं मिली थी। जबकि पंजाब में उसने चार सीटों पर जीत हासिल की थी। इसलिए 2017 के पंजाब विधानसभा चुनावों में आप पूरी तैयारी के साथ उतरी थी। इस बार भी पंजाब में आप को एक सीट मिल गई है जबकि वह दूसरे प्रदेशों में 40 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ रही थी।
आप को अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद 2017 में हुए गोवा विधानसभा चुनावों में भी थी। वहां भी आप ने अपना संगठन खड़ा किया था। लेकिन वहां के चुनावों में भी उसे कोई लाभ नहीं हुआ। इस बीच हरियाणा और राजस्थान में आप संगठन विस्तार की कोशिश करती रही। इससे लगातार यह संदेश जाता रहा कि आप दिल्ली से बाहर अपना विस्तार करना चाहती है। जो लोग आप के गठन से जुड़े रहे हैं, वे भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि दिल्ली विधानसभा चुनाव जीतने के बाद केजरीवाल ने पार्टी की आंतरिक बैठक में यह बात कही थी कि उन्हें दिल्ली के बाहर कुछ और राज्यों में अपना प्रदर्शन कम से कम इतना ठीक करना है कि कुछ सालों में आप को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल जाए।
अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी से आम लोगों ने भी काफी उम्मीदें लगा रखी थीं। लोगों को यह लगता था कि यह एक अलग तरह की पार्टी है जो आने वाले दिनों में एक राजनीतिक विकल्प के तौर पर उभर सकती है। लेकिन जिस तरह से आप केजरीवाल केंद्रित पार्टी बनती चली गई और प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और आनंद कुमार जैसे संस्थापकों को इससे निकाला गया उससे यह धारणा बदलने लगी। लोगों को लगा कि अब आप भी बाकियों जैसी होती जा रही है।
लेकिन इस सबके बीच यह लगता रहा कि कम से कम दिल्ली में पार्टी मजबूत है। इस बात के पक्ष में यह तर्क दिया जाता था कि शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं के क्षेत्र में अरविंद केजरीवाल सरकार ने राजधानी के सबसे गरीब लोगों के लिए जो काम किए हैं, उसकी वजह से दिल्ली में उनकी राजनीतिक ताकत बनी हुई है। 

 


दिल्ली में इसका पहला परीक्षण 2017 के नगर निगम के चुनावों में हुआ. उन चुनावों में भाजपा को जीत हासिल हुई. लेकिन आप के लोगों ने इस पर अपना बचाव करते हुए कहा कि दिल्ली के नगर निगमों पर हमेशा से भाजपा का कब्जा रहा है और जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी, तब भी भाजपा ही ये चुनाव जीतती थी. आप के लिए राहत की बात यह थी कि पहली बार इन चुनावों में उतरने के बावजूद वह दिल्ली के तीनों नगर निगमों में दूसरे स्थान पर थी.
लेकिन लोकसभा चुनावों के परिणामों ने आप की यह स्थिति भी कमजोर कर दी है. इन चुनावों में दिल्ली की सात लोकसभा सीटों पर न सिर्फ आम आदमी पार्टी हारी बल्कि सात में से पांच सीटों पर वह दूसरे नंबर पर भी नहीं रही. जबकि 2014 में सातों सीटें हारने के बावजूद वह इन सभी सीटों पर नंबर दो रही थी. इस बार पांच सीटों पर कांग्रेस नंबर दो रही. सिर्फ दो सीटों उत्तर-पश्चिमी दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली पर आप दूसरे नंबर पर रही. लेकिन इन दोनों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी की जीत का अंतर बहुत बड़ा है.
तो लोकसभा चुनावों के नतीजों से यह स्पष्ट है कि दिल्ली में अब आप की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. हालांकि, उसके कुछ नेता यह कहते हुए पार्टी के बचाव में लगे हैं कि 2014 में भी उसे यहां की एक भी लोकसभा सीट नहीं मिली थी लेकिन छह-सात महीने बाद हुए विधानसभा चुनावों में इतिहास बना दिया था. लेकिन वे यह नहीं बताते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनावों में आप को 33 प्रतिशत वोट मिले थे और इस बार दिल्ली में उसे सिर्फ 18 प्रतिशत वोट ही मिले हैं. और इस बार उसका नंबर तीसरा है, 2019 की तरह दूसरा नहीं.
अब ऐसे में आप की पूरी जद्दोजहद आने वाले दिनों में दिल्ली में अपना किला बचाने की होगी. क्योंकि लोकसभा चुनावों में मिले वोटों के हिसाब से देखें तो अगले विधानसभा चुनाव में दिल्ली की 70 में से 65 सीटें भाजपा और पांच कांग्रेस को मिलती दिखती हैं. इस हिसाब से 2020 में आप का खाता भी खुलता नहीं दिख रहा है.
लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद दिल्ली में ही आप को वैकल्पिक पार्टी के तौर पर देखने वाले लोगों का विश्वास हिला है. ऐसे में दिल्ली के बाहर अपने विस्तार की कोशिशों पर अब पार्टी काम करेगी, इस पर जानकारों को पूरा संदेह है. क्योंकि अगर दिल्ली भी हाथ से चली गई तो आप और अरविंद केजरीवाल के पूरे राजनीतिक अस्तित्व पर ही संकट आ खड़ा होगा.
 

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