संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 31 मई : कांग्रेस का टीवी बहिष्कार, कितना सही, कितना गलत
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 31 मई : कांग्रेस का टीवी बहिष्कार, कितना सही, कितना गलत
Date : 31-May-2019

मीडिया के हिस्से में कांग्रेस की इस बात को लेकर आलोचना हो रही है कि उसने एक महीने तक टीवी चैनलों की बहस में अपने पार्टी प्रवक्ताओं के जाने पर रोक लगा दी है। अलग-अलग राजनीतिक दलों के लोगों को बिठाकर बहस छेडऩा समाचार चैनलों की रोजी-रोटी से जुड़ा हुआ मामला है, और ऐसे में मानो थाली से एक सब्जी ही हटा दी गई है, तो ऐसे में चैनलों की शिकायत जायज है। दूसरी तरफ यह समझने की जरूरत है कि कांग्रेस ने ऐसा किया क्यों है।

अभी जब चार दिन पहले कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक चल रही थी, और उस बीच ही मीडिया में तेजी से ये खबरें आईं कि राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की है, तो कार्यसमिति चलते-चलते ही कांग्रेस के एक राष्ट्रीय प्रवक्ता ने जोर-शोर के साथ इसका खंडन किया, और इसे गलत बताया। लेकिन घंटे दो घंटे के भीतर ही यही प्रवक्ता उतने ही जोर-शोर से यह कहते हुए मीडिया के सामने आए कि राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की है, और उसे वापिस लेने से इंकार भी कर दिया है। तब से लेकर अब तक राहुल के इस्तीफे की गंभीरता और कांग्रेस अध्यक्ष पद का भविष्य तरह-तरह की अटकलों के सामान बने हुए हैं, और ऐसे में कांग्रेस के कोई प्रवक्ता कह भी क्या सकते हैं? किसी भी टीवी बहस पर कांग्रेस से पहला सवाल तो पार्टी के अध्यक्ष पर ही होगा, और इस पर अगर आज सोनिया और प्रियंका भी कुछ नहीं बोल पा रहे हैं, तो बाकी और किसी की हस्ती ही क्या है कि इस पर कुछ बोले? 

लेकिन इसके अलावा भी कुछ बातें और हैं जिनकी वजह से कांग्रेस महीने भर के लिए टीवी की बहस से दूर रहना तय कर चुकी है। एक तो यह कि जो चुनावी हार अब आंकड़ों का इतिहास बन चुकी है, उसे कुरेद-कुरेदकर टीवी चैनल और दूसरी पार्टियों के प्रवक्ता उसे वर्तमान बनाना जारी रखेंगे, और उसे ही भविष्य साबित करना भी। अभी तो कांग्रेस खुद ही अपनी हार का विश्लेषण नहीं कर पाई है, और यह भी नहीं तय कर पाई है कि कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी से कौन विश्लेषण करेंगे, इसलिए भी तब तक टीवी से दूर रहना ठीक है। लेकिन इससे भी परे एक बात और है जिसकी वजह से कांग्रेस टीवी चैनलों से दूर जा रही है। न सिर्फ पिछले महीनों के चुनाव प्रचार के दौरान, बल्कि उसके पहले के एक-दो बरस में भी समाचार के कई चैनलों का हाल ऐसा खराब था कि कांग्रेस के अलावा भी कई विपक्षी पार्टियां उन्हें गोदी-मीडिया कहने लगी थीं, यानी मोदी की गोदी में बैठा हुआ मीडिया। लोगों को याद होगा कि जब हजार-पांच सौ के नोट बंद किए गए, और दो हजार रूपए के नोट शुरू किए गए, तो देश का नंबर वन चैनल होने का दावा करने वाले एक हिन्दी चैनल की स्टार-एंकर बड़े जोर-शोर से समाचार बुलेटिनों में यह साबित करते दिखी कि दो हजार के नोट में एक ऐसा माइक्रोचिप फिट किया गया है कि वह जमीन के बहुत नीचे भी दबाया जाएगा, तो भी भारतीय उपग्रह उसे पकड़ लेंगे। मीडिया के नाम पर एक बहुत ही बदमजा लतीफे की तरह यह वीडियो आज भी इंटरनेट पर मौजूद है, और समय-समय पर लोग मीडिया का मखौल बनाने के लिए उसका इस्तेमाल भी करते हैं। इस किस्म के सैकड़ों ऐसे टीवी पत्रकार और चैनल रहे जो कि प्रचारक की तरह काम करते रहे, और देश के अखबारनवीसों ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की अविश्वसनीयता को लेकर काफी कुछ लिखा भी। एक ऐसी जनधारणा बनी रही, और आज भी है कि टीवी चैनलों का एक बहुत बड़ा हिस्सा मोदी की टीम की तरह काम करता रहा। इसलिए पार्टियों के बीच पहले भी यह बात होती रही है कि कुछ अधिक बड़े प्रचारक-चैनलों का बहिष्कार किया जाए। 

कांग्रेस के पास अगले एक महीने में खोने के लिए कुछ भी नहीं हैं। लेकिन वह इत्मीनान से अपना घर सम्हालकर उसके बाद फिर मीडिया के सामने आ सकती है जिसमें टीवी मीडिया भी शामिल होगा। लोकतंत्र में ऐसे कोई भी बहिष्कार अंतहीन नहीं होते। कई बार राजनीति के लोग जब मीडिया से बदसलूकी करते हैं, तो मीडिया भी कुछ पार्टियों का, या कुछ नेताओं का बहिष्कार करता है, और एक वक्त गुजर जाने के बाद दोनों फिर साथ काम करने लगते हैं। ऐसे बहिष्कार लोगों को सोचने, समझने, और सम्हलने का मौका भी देते हैं। यह मौका यहां पिछले चुनाव को लेकर कांग्रेस के सोचने, समझने, और सम्हलने का है, वहीं पर यह मौका इलेक्ट्रॉनिक मीडियाके लिए भी यही सब कुछ करने का भी है। एक वक्त था जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नाम की कोई चीज नहीं थी, और महज अखबार ही प्रेस कहलाते थे। उस वक्त श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन मजबूत था और वह पत्रकारिता के नीति-सिद्धांतों की फिक्र करने वाला देश का अकेला संगठन भी था। जैसे-जैसे वह संगठन खत्म हुआ, वैसे-वैसे पत्रकारिता के उसूलों की फिक्र भी खत्म होती गई। आज मीडिया में काम करने वाले तब के मुकाबले शायद सौ गुना बढ़ चुके हैं, लेकिन सिद्धांतों की फिक्र  एक फीसदी भी नहीं बची है। ऐसे में सबको अपने-अपने हाल पर एक बार सोचना चाहिए। 
-सुनील कुमार

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