संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय,  01 जून : मांसाहार और पशु-कारोबार पर हमले के बड़े नुकसान हैं
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 01 जून : मांसाहार और पशु-कारोबार पर हमले के बड़े नुकसान हैं
Date : 01-Jun-2019

उत्तरप्रदेश के बरेली में एक धर्मस्थल के पास कुछ मजदूरों पर कुछ लोगों ने हमला किया, और उनका यह आरोप था कि वे मांस खा रहे थे। उनको बुरी तरह पीटा गया, और इस पिटाई का वीडियो भी चारों तरफ फैल गया है। मजदूरों का कहना है कि वे शाकाहारी खाना खा रहे थे। ये मजदूर धर्मस्थल से परे दूसरी जगह जुड़ाई का काम कर रहे थे। ऐसी घटनाएं पिछले दिनों लगातार हुई हैं जब किसी मुस्लिम पति-पत्नी को बुरी तरह मारा गया क्योंकि कुछ तथाकथित गौरक्षकों को यह शक था कि वे गो-मांस लेकर जा रहे हैं। अभी-अभी कई समाचार चैनलों पर उत्तरप्रदेश का एक और वीडियो सामने आया है जिसमें भाजपा की अलीगढ़ शहर की महापौर खुलेआम यह फतवा देते दिख रही है कि जो लोग खुला मांस लेकर जाते हैं, उनकी हड्डियां तोड़ दी जाएं। उसने रमजान के इस महीने को लेकर भी यह तंज कसा है कि एक तरफ ये लोग रोजा रखते हैं, दूसरी तरफ मांस खाते हैं। 

ऐसी बिखरी हुई घटनाओं से परे की बात देखें, तो उत्तरप्रदेश में चमड़े को पकाने के जो कारखाने हैं, वे तकरीबन बंद हो गए हैं, और एक लाख से अधिक लोग रोजगार खो बैठे हैं। इंडिया स्पेंड नाम की एक भरोसेमंद समाचार वेबसाइट ने आंकड़े सामने रखे हैं कि भारत में पशु व्यापार वाले दूसरे सबसे बड़े राज्य राजस्थान के एक प्रमुख पशु मेले में गाय का व्यापार पिछले छह बरसों में घटकर पांच फीसदी ही रह गया है। यह पूरा कारोबार राज्य की पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल में तबाह हुआ। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2011 में राजस्थान के बाडमेर के राज्य के सबसे बड़े पशु मेले में करीब साढ़े सात हजार गायों की खरीद-बिक्री हुई थी, जो 2017 में घटकर 342 रह गई थीं। 2018 में राज्य के सारे पशु मेलों में कारोबार कुल एक चौथाई रह गया। इस कारोबार के गिरने से राजस्थान की गाय की एक दुर्लभ रेगिस्तानी नस्ल, थारपारकर, के खत्म होने की नौबत आ रही है। यह रिपोर्ट बताती है कि राजस्थान के सरहदी इलाकों में कोई उद्योग धंधे न होने से पशुपालन हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों के लिए एक परंपरागत पेशा था, लेकिन गो-हत्या या तस्करी का आरोप लगाकर होने वाले हमलों की वजह से यह कारोबार खत्म हो गया है। इन सरहदी इलाकों में तथाकथित गौरक्षकों की धमकियों की वजह से 95 फीसदी लोगों ने गाय का कोई भी कारोबार बंद कर दिया है। 

मोदी सरकार को अपने इस दूसरे कार्यकाल में यह सोचना होगा कि लोगों के खानपान की आजादी को कैसे बचाकर रखा जा सकता है, क्योंकि आज हमलावर भीड़ झंडे-डंडे लेकर किसी को भी घेरकर मार रही है, और उस दहशत में बाकी बहुत से लोग पशुओं से जुड़े हुए किसी भी कारोबार को बंद करते जा रहे हैं। अलग-अलग धर्म और जाति के लोगों के खानपान के अलग-अलग तौर-तरीके हैं, और भारत का संविधान उनको इसकी आजादी भी देता है। लेकिन देश में आज मोदी सरकार जिस विशाल बहुमत के साथ जीतकर आई है, उसे धार्मिक और साम्प्रदायिक संगठनों में से बहुत से लोग उनकी हिंसा के पक्ष में जनमत का सुबूत मानने लगे हैं। यह सिलसिला देश के भीतर लोगों को अलग-अलग तबकों में बांट देगा, और देश का एक विशाल हिस्सा, आबादी का एक बड़ा हिस्सा मांसाहारी है, और उसे मांस खाने पर भी अब खतरा झेलना पड़ रहा है। अभी मुस्लिमों का साल का सबसे बड़ा त्योहार रमजान चल रहा है, और इस बीच हरियाणा में भाजपा सरकार के चलते हुए ऐसे बयान सामने आए कि हर मुस्लिम परिवार में पकने वाले मांस की जांच की जाए कि कहीं गो-मांस तो नहीं पक रहा है। यह सिलसिला बहुत नाजायज है, और बहुत खतरनाक भी है। मोदी सरकार को मिला विशाल बहुमत बहुत सी वजहों से मुमकिन हुआ है, लेकिन उसे किसी साम्प्रदायिकता का समर्थन, किसी हिंसा का समर्थन मानना खुद सरकार और भाजपा के लिए खतरनाक होगा। 
-सुनील कुमार

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