संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 4 जून : महिला को मुफ्त मेट्रो-बस, एक समझदार पूंजीनिवेश...
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 4 जून : महिला को मुफ्त मेट्रो-बस, एक समझदार पूंजीनिवेश...
Date : 04-Jun-2019

दिल्ली के नौजवान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कल दिल्ली की बसों और मेट्रो में महिलाओं का सफर मुफ्त करने की घोषणा की है। मेट्रो और बसों को होने वाले नुकसान की भरपाई दिल्ली सरकार करेगी। बहुत से लोग इसे लोकसभा चुनाव में हर सीट गंवा चुकी आम आदमी पार्टी की अगली चुनावी तैयारी मान रही है कि इससे केजरीवाल दिल्ली के विधानसभा चुनाव जीतने की उम्मीद कर सकते हैं। लेकिन इससे परे भी यह सोचने की जरूरत है कि क्या सार्वजनिक परिवहन को समाज के किसी तबके के लिए मुफ्त करने के कुछ फायदे होते हैं? 

दुनिया के कुछ ऐसे ही विकसित और लोकतांत्रिक देश हैं जहां समाज के भीतर सभ्यता अधिक संवेदनशील है, और वहां पर किसी देश में लोगों को एक न्यूनतम आय की गारंटी दी जाती है, और देश में कोई भी एक सीमा से नीचे की गरीबी नहीं झेलते। कुछ ऐसे देश हैं जहां पर अलग-अलग शहरों में स्थानीय आवाजाही को मुफ्त कर दिया है, और बस, ट्राम या मेट्रो को बिल्कुल मुफ्त करके उन्होंने सडक़ों पर से निजी वाहनों की आवाजाही को घटाने में कामयाबी पाई है। इससे शहरों पर बोझ घटने से प्रदूषण कम हुआ है, और लोग डीजल-पेट्रोल के धरती पर सीमित भंडार तेजी से खत्म करने से भी बच रहे हैं। 
दिल्ली में केजरीवाल सरकार का यह फैसला उन महिलाओं को बहुत फायदा नहीं देने वाला है जो बिना कारों के चल ही नहीं सकतीं। इससे उन्हीं को फायदा मिलेगा जो आज टैक्सी या ऑटो से चलती हैं, अपने दुपहिए पर चलती हैं, या कुछ दूरी पैदल भी तय करती हैं।  दिल्ली सरकार ने पिछले बरसों में लगातार जिस तरह आम जनता के लिए मोहल्ला क्लीनिक खोले हैं, सरकारी स्कूलों की शक्ल बदलकर रख दी है, उसने पूरी दुनिया में वाहवाही पाई है। ये एक अलग बात है कि मोदी नाम की सुनामी में दिल्ली में लोगों ने सांसद तो भाजपा के चुने, लेकिन केजरीवाल सरकार को पढ़ाई और इलाज इन दो चीजों के लिए बड़ी तारीफ भी मिली है। अब यह एक तीसरा ऐसा फैसला है जो आम जनता की आधी आबादी को सीधे प्रभावित करेगा, महिलाओं मुफ्त सफर से उनकी आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी, वे मामूली तनख्वाह का काम करने के लिए भी कुछ दूर तक का सफर कर सकेंगी जो कि कम तनख्वाह में मुमकिन नहीं हो सकता था। इस तरह केजरीवाल सरकार का यह फैसला महिलाओं की आत्मनिर्भरता को बढ़ाने वाला होगा, और उनकी सुरक्षा को भी इस तरह बढ़ाएगा कि जिस जगह भीड़ में महिलाओं का अनुपात अधिक रहता है, वहां पर वे अधिक सुरक्षित भी रहती हैं। 

कुछ लोगों को यह भी आशंका है कि इससे केन्द्र और राज्य सरकार के बीच टकराव का एक नया मोर्चा खुल सकता है, अगर केजरीवाल को नापसंद करने वाली केन्द्र की मोदी सरकार दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर से इसमें रोड़ा लगवाए। लेकिन एक दूसरी बात यह भी हो सकती है कि दिल्ली की आधी आबादी को मुफ्त सफर का नतीजा देखकर हो सकता है कि केन्द्र सरकार बाकी आधी आबादी को अपनी तरफ से मुफ्त सफर देने का सोचे। यह बात समझनी चाहिए कि शहरों में बस, ट्राम, या मेट्रो को चलाने में होने वाला नुकसान दरअसल एक साफ-सुथरे और सभ्य भविष्य के लिए एक पूंजीनिवेश होता है। अगर मजबूत सार्वजनिक परिवहन न रहे, तो लोग धीरे-धीरे निजी दुपहियों या निजी चौपहियों के लिए बेबस होने लगते हैं, और सडक़ों पर निजी गाडिय़ों की भीड़ भी बढ़ती चलती है, और पार्किंग के लिए भी कांक्रीट के आसमान छूते जंगल बनने लगते हैं। यह सब कुछ धरती पर एक बहुत बड़ा बोझ होता है। इसलिए आबादी के एक बड़े हिस्से को रियायती या मुफ्त पब्लिक ट्रांसपोर्ट देना धरती को बर्बादी से बचाना भी है। 

दिल्ली के अलग-अलग कुछ विशेषज्ञों ने इसके बारे में यह माना है कि यह सरकार का एक लुभावना फैसला है जिस पर जनता के खजाने का पैसा खर्च होगा, और इससे कोई फायदा नहीं होगा। जो लोग रियायतों के खिलाफ रहते हैं वे भी इसे बुरा मान रहे हैं। कुछ लोगों को यह भी आशंका है कि इसका चुनावी नुकसान भी हो सकता है क्योंकि दिल्ली में छात्र लंबे समय से रियायती सफर की मांग कर रहे थे, और उन्हें छोडक़र हर तबके की महिलाओं को ऐसी रियायत देने से एक नाराजगी भी फैल सकती है। लेकिन ऐसे तमाम तर्कों से परे एक बात यह जरूरी है कि अगर शहरी पब्लिक ट्रांसपोर्ट को निजी गाडिय़ों का विकल्प बनाना है, तो निजी गाड़ी से चलने वाले लोगों को भी रियायती बस-मेट्रो देनी होगी, और इस रियायत को केजरीवाल सरकार महिलाओं के लिए मुफ्त सीमा तक ले गई है। अब यह एक सरकार की अपनी सामाजिक सोच है कि दिल्ली की सडक़ों पर बोझ संपन्न तबके में से महिलाओं का कुछ हिस्सा अगर मुफ्त-मेट्रो की ओर मुड़ता है, तो उससे सडक़ें सचमुच ही कुछ बेहतर हाल हो सकती हैं। 

शहरों को अपनी कमाई के दूसरे जरिये ढूंढकर पब्लिक ट्रांसपोर्ट को अधिक से अधिक रियायती बनाना चाहिए, और इनकी सहूलियतें भी बढ़ाना चाहिए। यह एक साफ-सुथरे भविष्य के लिए किसी शहर का सबसे जरूरी पूंजीनिवेश होता है, और इसके आज के नगदी नफे-नुकसान से इसका मूल्यांकन नहीं करना चाहिए। साथ-साथ यह फैसला दिल्ली में लाखों महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी लेकर आएगा। डिलिवरी बॉय की तरह डिलिवरी गर्ल का काम भी बढ़ सकता है क्योंकि इनको सफर मुफ्त हासिल होगा। 

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