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 बहुतों ने भेडिय़ा नहीं देखा, मगर यह बात भेडिय़े को तो नहीं मालूम!
बहुतों ने भेडिय़ा नहीं देखा, मगर यह बात भेडिय़े को तो नहीं मालूम!
Date : 05-Jun-2019

-बादल सरोज
बहुत अधिक संभावना है कि मध्यप्रदेश के दतिया जिले की सेंवढ़ा तहसील के सरकारी कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. एस एस गौतम ने 70 साल पहले लिखा गया जॉर्ज ऑरवेल का उपन्यास 1984 न पढ़ा हो। बहुतों ने नहीं पढ़ा। बहुत सारे लोग हैं जिन्होंने भेडिय़ा नहीं देखा, मगर इसका यह मतलब तो नहीं कि कभी अकेले में उन्हें भेडिय़ा मिल गया तो सिर्फ इसी वजह से उन्हें बख्श देगा कि बंदा पहली बार उसे देख रहा है। गौतम सर सस्पेंड हो चुके हैं, न जाने किन-किन धाराओं में दर्ज मुकद्दमे में उनकी गिरफ्तारी हो चुकी है। अदालत उन्हें दो सप्ताह के लिए न्यायिक हिरासत में ग्वालियर की जेल में भेज चुकी है। इसके पीछे एक हास्यास्पद दावा यह भी है कि ऐसा उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए किया गया है। न्यायिक अभिरक्षा सुरक्षा इन दिनों न्यायप्रणाली का नया विम्ब विधान है जो मौजूदा समय का एकदम ठीक परिचय भी है।
डॉ. गौतम पर आरोप है कि उन्होंने (एक व्यक्तिगत बातचीत में) दावा किया था कि उन्होंने कॉलेज में अपने विभाग में देवी-देवताओं की तस्वीरें कभी नहीं लटकने दीं। किसी ने सरस्वती की तस्वीर लगाने पर ज्यादा जोर दिया तो उसे किसी अच्छी पेंटिंग या मूर्ति के इन्तजार की बात कहकर टाल दिया। सिर्फ गांधी और अम्बेडकर की तस्वीरें लगाईं। इसी रौ में डॉ. गौतम सरस्वती, ब्रह्मा के बारे में कुछ और बातें भी कह गए। कॉलेज में उनके प्रतिद्वंदी प्रोफेसर ने साजिशन इस बातचीत का वीडियो बना लिया और सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। संघ परिवार कूद पड़ा। अफवाहों ने एक उन्मादी भीड़ सेंवढ़ा में तैयार कर दी और आनन-फानन में मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार की पुलिस ने डॉ. गौतम को पकड़कर जेल पहुंचा दिया।
बिलाशक यह समय किसी भी धर्म या उनके प्रतीकों पर सार्वजनिक टीका-टिप्पणी का नहीं है। एक तो इसलिए कि इसके तिल का ताड़ बनाने और उसकी आड़ में अपने कुकर्मों को छुपाने तथा मूल मुद्दों और असली सवालों से मुंह चुराने की अपार गुंजाइशें हैं। दूसरा इसलिए भी कि बहुत योजनाबद्द तरीके और तेजी के साथ सामाजिक सोच का तालिबानीकरण जारी है। गोडसे-पूजन इसकी छोटी सी बानगी है। फिर इन दिनों जिस तरह का शकुनि मीडिया है उसे देखते हुए जोखिम और बढ़ जाती है। मगर डॉ. गौतम सार्वजनिक टिप्पणी नहीं कर रहे थे। वे अकेले में किसी से बात कर रहे थे- और जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास वाले बिग ब्रदर के शिकार हो गए।
डॉ. गौतम दलित हैं। मगर यहां प्रश्न उनके दलित होने का नहीं है। सवाल उससे आगे का है। कुछ ज्यादा ही बुनियादी है। एक सभ्य समाज के खुले विमर्श के अधिकार और उसके लायक माहौल का है। यह दलित गैर दलित का सवाल भर नहीं है- यह उससे ज्यादा व्यापक और दूरगामी है ; इतना दूरगामी कि यह आगामी भारत को ही नही प्रभावित करता बल्कि हजारों साल पहले के भारत पर भी असर डालने की क्षमता रखता है।
भारत के संविधान में ईशनिंदा (ब्लासफेमी) क़ानून नहीं है। इसलिए नहीं कि संविधान बनाने वाले आधुनिक सोच के प्रकांड लोकतांत्रिक थे- वाल्तेयर के स्कूल में पढ़े थे। बल्कि इसलिए कि वे भारतीय दर्शन और धार्मिक विमर्श, बहसों, शास्त्रार्थों की विराट परंपरा से वाकिफ थे। अब अगर यही च्च्सेंवढ़ा पैमानाज्ज् लागू हुआ तो ऋ ग्वेद का एक तिहाई हिस्सा एडिट करना पड़ेगा। ईश्वर के अस्तित्व पर अनेक असुविधाजनक प्रश्न उठाने वाले कुछ उपनिषद गंगा में बहाने पड़ेंगे। भारतीय दर्शन की आधारशिलायें रहे षड्दर्शन- 6 मूल दर्शनों- में से आधे जलाने होंगे। इन अनीश्वरवादी दर्शनों को 'उतने ही पुराने हैं जितना भारतीय दर्शन है और इनका ज्ञान अपने समय की वैज्ञानिक जानकारियों के हिसाब से बेहद आगे काÓ बताकर एक तरह से इनकी प्रशंसा करने वाले डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का भी कुछ करना होगा। 
 बात यहीं तक नहीं रुकेगी। 'पदार्थ परमसत्य है। सभी की उत्पत्ति पदार्थ से हुई है। देवताओं को खुश करने के लिए कर्मकाण्ड और बलि मूर्खता है।Ó कहने वाले भृगु ऋषि को देशनिकाला देना होगा। उन कृष्ण का भी कुछ करना होगा जो गीता मेंं इन्हीं भृगु को सबसे महान ऋ षि बताते हैं। 
छठी-सातवीं सदी के नालन्दा विश्वविद्यालय के उन आचार्य धम्मकीर्ति का क्या होगा जिन्होंने बुध्द दर्शन के फलक का विस्तार दुनिया में किया। उसे तर्कों-प्रमाणों से समृद्द किया किन्तु साथ ही 'त्रय वेदस्य कर्तार:, धूर्त भण्ड निशाचर:Ó की उक्ति भी दी। आदि के ध्वंस से शुरू सिलसिला क्या मूर्तिपूजा का मजाक उड़ाने वाले दयानंद सरस्वती और उनके सत्यार्थ प्रकाश को बख्शेगा? यही चला तो विवेकानंद अपने बीसियों आप्तवचनों के लिए कठघरे में खड़े किए जाएंगे। पेरियार को तो फांसी से कम नही माँगी जायेगी। 'मैंं नास्तिक क्यों?Ó लिखने वाले भगत सिंह का लाहौर भेजा जाना तय है, जहां ईशनिंदा कानून होने के चक्कर में उनका संगसार होना भी उतना ही निश्चित है। डॉ. आंबेडकर की रिडिल्स ऑफ़ हिन्दुइज़्म सहित सारी किताबें प्रतिबंधित होना भी पक्का मानिये, अचरज नहीं कि उन्हें मरणोपरांत दिया गया भारत रत्न भी भूतलक्षी प्रभाव से वापस ले लिया जाए।
ऐसे अनगिनत उदाहरण दिए जा सकते हैं। फिलहाल इतने ही। गरज यह है कि भारतीय प्रायद्वीप के दार्शनिक और धार्मिक विमर्श में असहमतियों, विरोध और शास्त्रार्थ की एक मजबूत परंपरा रही है। वादे वादे जायते तत्वबोध: रिवाज में रहा है। इनकी जगह यदि कुछ शुद्ध अभारतीय और संकीर्ण समझदारी के पैरोकार और उनके द्वारा उकसाई गई उन्मादी भीड़ तय करेगी कि कब, क्या और कैसे बोलना है तो खतरे में वर्तमान और भविष्य ही नहीं पड़ेंगे अतीत भी मटियामेट होगा; ऐसा करने वालों को याद रखना चाहिए कि जो अपने इतिहास पर गोलियां चलाते है उनका भविष्य उन पर तोप से गोले बरसाता है। यह भी कि अपने अंतिम निष्कर्ष में यह कट्टरता शैव, वैष्णव, शाक्त, स्मार्त, की मोटी और आर्य, अनार्य, अघोरी आदि इत्यादि अनगिनत अन्य धाराओं में बंटे अपने ही धर्म के खिलाफ होती है। नई खोजों और नजरियों की संभावनाओं की समाधि पर खड़ी होती है।
भड़काए गए उन्माद की शिकार भीड़ सिर्फ दतिया के सेंवढ़ा में नहीं है। वह जगह-जगह मॉबलिंचिंग की जमावटों में है। वह सुप्रीमकोर्ट के फैसले के खिलाफ शबरीमला की पहाड़ी के इर्द-गिर्द भी थी। अब पश्चिम बंगाल में अपनी जैसी ही उन्मादी राजनीति की पुरानी खि़लाडिऩ ममता बनर्जी के पीछे राम-राम पुकारती भागती जुटाई जा रही है। ऑरवेल की किताब न पढऩे से भी काम चलाया जा सकता है। मगर इस मनोरोग को समझना है तो मनुस्मृति (गौतम स्मृति के साथ) तो पढऩी ही होगी। यूँ भी उपचार और बचाव की शुरुआत रोग की संक्रामकता के निदान से होती है। जैसा हिटलर के बाद के दौर में जर्मनी ने किया- सुनियोजित वैचारिक अभियान और शिक्षा के जरिए हिटलरी सोच और नस्ली नफऱत के विरुध्द बड़े पैमाने पर इम्यूनाइजेशन किया गया। यहां नहीं हुआ नतीजे में नफरती बबूले बबंडर और आंधी बनने को तत्पर हैं। 
इसी स्थान पर एक से अधिक बार लिखा जा चुका है जिसे दोबारा दोहराने में भी कोई हर्ज नहीं है कि कट्टर और संकीर्ण साम्प्रदायिकता की इस बढ़त के चलते दांव पर एकाध चुनाव, कोई एक या दो सरकारें और उनका कार्यकाल नहीं है। दांव पर है लोकतंत्र, संविधान, सभ्य समाज और सबसे ऊपर भारत की अवधारणा। इसे बचाना है तो जानकारी की व्यापकता और आवाज की तीव्रता दोनों को बढ़ाना ही उपलब्ध रास्ता है।

 

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