विचार / लेख

कैसे गैरजरूरी खरीदारी आपके पैसे और सेहत को ही नहीं, पर्यावरण को भी बर्बाद कर रही है
कैसे गैरजरूरी खरीदारी आपके पैसे और सेहत को ही नहीं, पर्यावरण को भी बर्बाद कर रही है
Date : 06-Jun-2019

-प्रदीपिका सारस्वत
यह हम सबके साथ कई बार होता है। आप अक्सर कहीं बाहर जाने से पहले अपनी कपड़ों की अलमारी के सामने खड़े होते हैं और लगभग हर कपड़े को एक तरफ करते हुए सोचते हैं कि आज पहनने के लिए आपके पास कुछ अच्छा है ही नहीं! और आप तय करते है कि अगली तनख़्वाह आने पर आप कुछ और कपड़े खरीदेंगे। आपके भीतर कुछ खरीदने की इच्छा जागने का यह सबसे आम उदाहरण है।
इसके अलावा यूं भी होता है कि कई बार आप मॉल या शहर के बाजार में जाते हैं और ऐसी बहुत-सी चीजें खरीद लाते हैं जिन्हें शायद ही कभी इस्तेमाल करेंगे। नई घडिय़ां, फोन, बैग, लिपस्टिक या ऐसी चीज़ें जो पहले से ही आपके पास थीं। शादियों, जन्मदिनों और बाकी अवसरों पर आप औपचारिकतावश लोगों को तोहफे देते हैं, जो कई बार उतने स्तरीय नहीं होते कि इस्तेमाल किए जा सकें या फिर शायद पाने वाले के किसी काम के नहीं होते। यानी एक हिसाब से यह खरीदारी भी कोई खास उपयोगी नहीं कही जा सकती।
बात आगे बढ़ाने से पहले रोजमर्रा की जिंदगी के कुछ और उदाहरण भी देखे जा सकते हैं। मसलन आलस के चलते आप बाहर से खाना ऑर्डर करते हैं, जो सेहत के लिहाज से तो शक के दायरे में आता ही है, साथ में प्लास्टिक की पैकिंग अलग दिक्कत लेकर आती है। कई बार आप सिर्फ अपने स्टेटस के चलते सार्वजनिक परिवहन के साधनों की जगह अपनी या भाड़े की गाड़ी से अकेले सफर करते हैं।
कुल मिलाकर हम हर दिन ऐसे तमाम काम करते हैं और शायद ही सोचते हैं कि इसका पर्यावरण से भारी लेना-देना है। दरअसल आप यह सब करते वक्त वह सोच रहे होते हैं जो इन तमाम उत्पादों को बनाने वाली कंपनियां चाहती हैं। रिसर्च और अनुभव दोनों से साफ है कि टीवी और फोन के जरिए हमारे घरों और एकांत के क्षणों तक पहुंचे विज्ञापन और बाज़ार ने हमें बताया है कि दुख से दूर होने के लिए या फिर सुख की तरफ जाने के लिए हमें नई-नई चीजें खरीदने की ज़रूरत है। फिर चाहे वह एक आइसक्रीम हो या फिर आइफोन का नया मॉडल!
एक रिसर्च के मुताबिक ज्यादातर लोग इन छह कारणों से खऱीदारी करते हैं। 
1. मीडिया का प्रभाव- आपने टीवी, होर्डिंग या वेबसाइट पर कुछ देखा, आपको पसंद आया और सोच लिया कि यह तो आपके पास भी होना चाहिए। 
2. सामाजिक दबाव- आपके पड़ोसी ने नई गाड़ी खरीदी है, या फिर दोस्त ने नया फोन लिया है तो आप दबाव में हैं कि आपको भी नई चीज़ें चाहिए। 
3. सेल, कीमत में छूट (डिस्काउंट)- आप सोचते हैं कि सेल के दौरान सामान्य से कम कीमत पर सामान खरीदकर आप पैसे बचा रहे हैं। जबकि इसके चलते आप काफी गैरजरूरी सामान घर ले आते हैं। 
4. खुद पर नियंत्रण न होना- कई लोग जब बाजार में होते हैं, चाहे इंटरनेट के ज़रिए ही सही, वे हर वह सामान खरीदते जाते हैं जो उन्हें ठीक लगता है, वे अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रख पाते। 
5. अमीरी का अहसास होना- पहले आपकी तनख़्वाह कम थी, आप काफी चीजें खरीदने से पहले सोचते थे, लेकिन अब आप कुछ भी खऱीद सकते हैं इसलिए कुछ भी खरीद लेते हैं। 
6. आप बोर हो चुके हैं - बहुत से लोग, जिनके पास काफी पैसा है और करने के लिए उतना काम नहीं है इसलिए खऱीदारी करने निकल पड़ते हैं कि वे बोर हो चुके हैं और उन्हें लगता है कि खऱीदारी करके उनका मन बहल जाएगा। इसके अलावा तनाव से उबरने के लिए की गई खरीदारी जिसे रिटेल थैरेपी भी कहा जाता है, गैरजरूरी खरीदारी की एक और वजह है।
कारण इनमें से चाहे जो हो लेकिन आप इस खऱीदारी या रिटेल थैरेपी के बाद भी ज़्यादा देर ख़ुश नहीं रह पाते। बल्कि आप में से ज्यादातर लोग महसूस करते हैं कि बेकार ही इतना पैसा खर्च किया। इंटरनेट पर बहुत सारे ऐसे सर्वे और रिसर्च मौजूद हैं जो बताते हैं कि रिटेल थैरेपी अंत में आपका तनाव और बढ़ा देती है। यानी एक तरफ हम देख सकते हैं कि गैरजरूरी खऱीदारी से आपको किसी तरह का फायदा होने के बजाय कहीं न कहीं नुकसान ही है। और दूसरी तरफ आपके पर्यावरण पर इसका काफी बुरा असर हो रहा है।
इस तरह खरीदी जाने वाली चीज़ों में सबसे ऊपर कपड़े हैं, फिर शराब और खाना, उसके बाद गैजेट्स और एक्सेसरीज। पर क्या आप जानते हैं कि एक नई सूती शर्ट बनाकर आप तक पहुंचाने में कितनी ग्रीन हाउस गैसें आपकी हवा में मिल जाती हैं या ज़मीन से कितना पानी निकालकर खर्च कर दिया जाता है? या फिर कितने खराब रसायन मिट्टी और पानी में मिल जाते हैं?
कपास उगने से लेकर उसके बने कपड़े हम तक पहुंचने और इस्तेमाल के बाद फेंके जाने तक की प्रक्रिया का पर्यावरण पर पडऩे वाला असर
कपास उगने से लेकर उसके बने कपड़े हम तक पहुंचने और इस्तेमाल के बाद फेंके जाने तक की प्रक्रिया का पर्यावरण पर पडऩे वाला असर
जर्नल ऑफ इंडस्ट्रियल ईकोलॉजी में छपे एक अध्ययन के अनुसार दुनियाभर में होने वाले ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन का 60 फीसदी हिस्सा घरों में होने वाले उपभोग से होता है। इसी तरह दुनियाभर में होने वाले जमीन, पानी और सामग्री के इस्तेमाल का 50 से 80 फीसदी घरों के द्वारा ही होता है। अध्ययन की प्रेस रिलीज में लिखा गया, 'हम सब कोशिश करते हैं कि सारा दोष किसी और के मत्थे मढ़ दिया जाए। सरकारों पर, व्यापारों पर लेकिन इस ग्रह पर पडऩे वाले असर के 60 से 80 फीसदी हिस्से के लिए आम परिवार जिम्मेदार हैं। अगर हम अपने उपभोग की आदतें बदल लें तो हमारे एनवायरेन्मेंटल फुटप्रिंट (पर्यावरण को इंसानी कार्यों की वजह से होने वाला नुकसान) पर बहुत बड़ा असर पड़ेगा।
यानी हम चाहें तो अपनी खऱीदारी की आदतें सुधारकर न सिर्फ सामाजिक असमानता की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ढोने से बच सकते हैं, बल्कि पर्यावरण को बरबाद होने से बचाने में अपनी भूमिका भी निभा सकते हैं। अगर हम जरूरत से ज्यादा कपड़ा, खाना, पानी या ज़मीन इस्तेमाल करते हैं तो जाहिर-सी बात है कि उतना खाना, पानी, कपड़ा या जमीन किसी और के हिस्से कम पड़ रही होगी। चूंकि हम असमानता को सिर्फ अर्थव्यवस्था के स्तर पर नाप सकते हैं खाने, पानी और कपड़े की मात्रा के अनुपात में नहीं, तो ठीक-ठीक बताना मुश्किल होगा कि इन चीजों का कितना उत्पादन विश्व की पूरी जनसंख्या के लिए काफी होगा। लेकिन हम यह जरूर जानते हैं कि कितना कपड़ा, खाना या बाकी चीज़ें हमारे लिए वाकई काफी हैं। तो बेहतर यही होगा कि सरकारों के बजाय हम ही तय करें कि हमें कितना उपभोग करना है और कितना बरबाद।
हमारे रोजमर्रा के कामों के चलते पर्यावरण को होने वाले नुकसान पर चेताने वाले डॉक्टर स्कंद शुक्ला लिखते हैं, 'भौतिक विकास और कार्बन-उच्छ्वास दोनों साथ चलते रहे हैं। आगे नहीं चल सकेंगे। हम अपना घर फूंककर अपने हाथ नहीं ताप सकते। शुद्ध खाने को नहीं होगा, तो मॉलों में शॉपिंग किसी काम नहीं आएगी। पानी में सीसा-कैडमियम-आर्सेनिक घुले रहेंगे, तो सेडान का सुख ध्वस्त हो जाएगा। गर्म हवा में सल्फऱ डाईऑक्साइड होगी तो रियल एस्टेट अनरियल बन जाएगा। वायुमण्डल को गर्म करती कार्बन डाईऑक्साइड को जानिए। सोचिए कि हम कहां कटौती कर सकते हैं।Ó
डॉ शुक्ला? के मुताबिक जितनी गर्म पृथ्वी आज है, उतनी 11000 साल पहले थी। हमारे पास 2030 तक का समय है। उसके बाद यह चक्र चाहने पर भी लौटाया नहीं जा सकेगा। अभी भी हम अनेक मामलों में ग्रह का इतना नुकसान कर चुके हैं कि उसे संभालने और मुक्ति पाने में बहुत लंबा अरसा गुजर जाएगा।

 

Related Post

Comments