संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 07 जून : मौतों पर लिखते-लिखते खबर आई और मौतों की
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 07 जून : मौतों पर लिखते-लिखते खबर आई और मौतों की
Date : 07-Jun-2019

हिन्दुस्तानी सड़कों पर हादसों में हर बरस लाखों मौतें होती हैं। डेढ़ लाख से अधिक मौतें 1915 में दर्ज हुई थीं, और वे तुरंत होने वाली मौतें थीं। दुर्घटना के जख्मों से कुछ समय बाद मरने वालों के आंकड़े इसमें शामिल नहीं थे। अपने आसपास हम देखें तो एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरता है जब सड़क-मौतों की खबरें न आएं। अभी तीन दिन पहले छत्तीसगढ़ के दुर्ग शहर में देर रात ढाबे पर आते-जाते एक मोटरसाइकिल पर सवार चार नौजवानों को कुचलते हुए कोई बड़ी गाड़ी भाग गई। अभी जब यह बात लिखी ही जा रही है, तो छत्तीसगढ़ के जशपुर इलाके से खबर आ रही है कि वहां एक दुपहिए पर सवार चार लोगों को एक मुसाफिर बस की टक्कर लगी, और चारों लोग मारे गए। अब जब एक दुपहिए पर चार बड़े लोग सवार होकर जा रहे हैं, तो गलती सिर्फ बड़ी गाड़ी की हो यह सोचना भी गलत है। लेकिन प्रदेश सड़क हादसों से कुछ सीख रहा हो ऐसा पिछले कई दशकों में नहीं लगा है। 

हिन्दुस्तानी सड़क हादसों के पीछे कुछ बहुत जाहिर सी वजहें हैं, और ये सारी की सारी टाली जा सकती हैं अगर सरकार और जनता दोनों के बीच अपनी जिम्मेदारी का अहसास थोड़ा सा बढ़ जाए। पिछले दो दशकों में भारत में गाडिय़ों की रफ्तार लगातार बढ़ती चली गई है क्योंकि दुनिया भर की कंपनियां यहां आईं, और तेज रफ्तार मॉडल लेकर आईं। दूसरी तरफ देश की औसत संपन्नता बढऩे से लोगों के बीच दारू पीना भी बढ़ा है। तीसरी बात यह कि सड़कें चौड़ी हुई हैं, पुल बने हैं, और लोगों को रफ्तार बढ़ाने का मौका भी मिल रहा है। इन सबसे ऊपर की बात यह है कि ट्रैफिक नियम लागू करने से जुड़े दो विभाग, आरटीओ, और ट्रैफिक पुलिस, तकरीबन सारे हिन्दुस्तान में बाकी विभागों के मुकाबले बहुत अधिक भ्रष्ट हैं। मध्यप्रदेश के आरटीओ के बारे में तो केन्द्रीय मंत्री नितीन गडकरी ने कुछ समय पहले कहा था कि ये चंबल के डाकुओं से बड़े लुटेरे हैं। और अपने आसपास जब हम देखते हैं तो यहां भी आरटीओ का हाल इससे जरा भी बेहतर नहीं दिखता है। 

छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में आज से 25-30 बरस पहले सड़कों पर ट्रैफिक पुलिस का जितना काबू रहता था, उसका एक हिस्सा भी आज नहीं दिखता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सिर्फ ट्रैफिक सिग्नल, कैमरे लगाने जैसे खर्च हो रहे हैं, सड़कों पर सैकड़ों करोड़ रूपए सालाना खर्च हो रहे हैं, लेकिन या तो ट्रैफिक पुलिस जरूरत जितनी नहीं है, या वह बेकाबू है, और बेअसर है। पहले के मुकाबले अभी ट्रैफिक नियम तोडऩे वाले अधिक दुस्साहसी दिखते हैं, और पुलिस महज उन्हें देखते हुए दिखती है। पूरे प्रदेश में शराब के नशे में गाडिय़ां चलाना बढ़ते चले जा रहा है, ट्रक और बस जैसे कारोबारी वाहन अंधाधुंध मनमानी कर रहे हैं, और जब कारोबारी गाडिय़ां कानून तोड़ती हैं, तो वह पुलिस और आरटीओ के साथ एक संगठित भ्रष्टाचार का सतह पर तैरता हुआ सुबूत होता है। 

सरकार अगर अपनी जिम्मेदारी पूरी करे, तो मौतें बहुत हद तक थम सकती हैं, और सरकार की कमाई भी बढ़ सकती है। दूसरी तरफ लोगों के बीच जागरूकता न बढऩे से लोग हेलमेट-सीट बेल्ट के बिना चलते हैं, पिए हुए चलाते हैं, और रफ्तार को बेकाबू भी रखते हैं। यह पूरा सिलसिला सुधारने की जरूरत है। गाडिय़ों के रजिस्ट्रेशन से सरकार को होने वाली कमाई का एक अनुपात सीधे-सीधे ट्रैफिक पुलिस पर खर्च करना चाहिए। और पर्याप्त ट्रैफिक पुलिस तैनात करके नियम तोडऩे वालों की गाडिय़ां जब्त करने, और उनके ड्राइविंग लाइसेंस रद्द करने का काम भी बड़ी कड़ाई से करना चाहिए। किसी को भी ऐसी रियायत देने का सरकार को भी हक नहीं है जिससे वे लोग सड़क पर दूसरे पाबंद लोगों के लिए भी खतरा बनते हों। सड़कों पर नियम तोडऩे वाले महज खुद नहीं मरते हैं, औरों को भी मारते हैं, इसलिए इस मामले में उन पर दूसरों की जिंदगी खतरे में डालने के कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। जो मां-बाप छोटे-छोटे बच्चों को गाडिय़ां देते हैं, उन्हें भी तगड़े जुर्माने के साथ-साथ कुछ दिनों के लिए कैद भी होनी चाहिए। हमारा ख्याल है कि कुछ-कुछ दिनों के लिए अगर लोगों का जेल जाना होने लगेगा, तो उनके आसपास के सैकड़ों लोग सहम भी जाएंगे, और सुधर भी जाएंगे। 
-सुनील कुमार

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