संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 10 जून : आत्महत्याओं का बढ़ता सिलसिला, और जरूरत
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 10 जून : आत्महत्याओं का बढ़ता सिलसिला, और जरूरत
Date : 10-Jun-2019

अपने आसपास पिछले दो दिनों में दो बच्चों की आत्महत्याएं देखने मिलीं। एक गरीब मां-बाप की बेटी मोपेड पाने के लिए जिद कर रही थी, और पिता कोई इंतजाम नहीं कर पाया, तो उसने खुदकुशी कर ली। एक दूसरे परिवार में दुपहिया था, और कम उम्र लड़का उसे लेकर जाना चाहता था, मां-बाप ने उसे दुपहिया ले जाने की इजाजत नहीं दी, और उसने आत्महत्या कर ली। इन दोनों खबरों को देखकर दिल दहलता है कि बच्चों का क्या किया जाए? जो मां-बाप अपने बच्चों को इंजीनियरिंग या मेडिकल की पढ़ाई में जबर्दस्ती धकेलना चाहते हैं, और उसके दाखिले के इम्तिहान की तैयारी के लिए बच्चों को राजस्थान के कोटा जैसे कोचिंग-कारखाने में झोंक देते हैं, और वे बच्चे वहां आत्महत्या कर लेते हैं, उसमें तो मां-बाप की जिम्मेदारी समझ आती है। लेकिन आए दिन कहीं न कहीं से खबर आती है कि मां-बाप ने अधिक वक्त फोन पर गुजारने से मना किया, तो किसी बच्चे ने आत्महत्या कर ली, कहीं पसंद का मोबाइल खरीदकर मां-बाप नहीं दे पाए तो बच्चों ने आत्महत्या कर ली। 

समाज में आत्महत्या की खबरें जब आसपास बहुत अधिक तैरती हैं, तो बच्चों को वह एक विकल्प की तरह दिखने लगता है। इसलिए मनोवैज्ञानिक और परामर्शदाता अखबारों को भी यह सुझाते हैं कि आत्महत्या की खबरों को इतना अधिक या इतना बड़ा न छापा जाए कि वे दूसरे लोगों को अपनी समस्या का एक समाधान लगने लगें। लेकिन मीडिया के साथ अपनी दिक्कत है, खुद उसके लोग इतने सीखे हुए नहीं हैं कि वे खबरों के साथ ऐसा न्याय कर सकें, और समाज का इतना ख्याल रख सकें, इसलिए आत्महत्या की खबरें खासे खुलासे के साथ छपती हैं, बहुत से मामलों में तस्वीरों के साथ भी। लेकिन आत्महत्या की अधिक खबरें छात्रों से परे भी प्रेमी-जोड़ों की आती हैं, और उनके बारे में भी इस देश को गंभीरता से सोचने की जरूरत है। 

बहुत सी आत्महत्याएं तो ऐसी रहती हैं जिनमें परिवार के लोगों ने प्रेमी-जोड़े को शादी की इजाजत नहीं दी, और दोनों ने एक साथ जहर खाकर, एक साथ पटरी पर कटकर, या पेड़ से एक साथ टंगकर खुदकुशी कर ली। ये आत्महत्याएं पूरी तरह रोकने लायक हैं क्योंकि समाज और परिवार को अपने पुराने दकियानूसी नजरिए को बदलने की जरूरत है, बालिग नौजवानों को मर्जी से प्रेम-संबंध की इजाजत देने की जरूरत है, और ये खत्म हो जाएंगी। ये आत्महत्याएं रोकने लायक हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि हिन्दुस्तान के बहुत से समाज आज अपने परिवार की लड़की को मर्जी से प्रेम करते देखकर उसका कत्ल करके फख्र महसूस करते हैं, ऐसे परिवार किस तरह प्रेम या शादी की इजाजत देंगे? और ऐसे में जाहिर है कि हिन्दुस्तान में अगले कई दशक तक ये आत्महत्याएं बंद होने वाली नहीं हैं।

लेकिन बच्चों से लेकर बड़ों तक, और नौजवान प्रेमियों के बूढ़े मां-बाप तक, इन सभी को सामाजिक परामर्श की जरूरत है। देश में इतने मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता हैं नहीं कि पूरी आबादी की सोच सुधार सकें, इसलिए समाज के भीतर के दूसरे लोगों को ही आगे आकर सार्वजनिक मंचों से लोगों की सोच को बदलना होगा। दिक्कत यह है कि हिन्दुस्तान में धर्म और जाति के संगठन किसी भी सोच के संगठनों के मुकाबले हजार गुना अधिक मजबूत हैं, और धर्म-जाति की एकता उदारता पर नहीं टिकी रहती, कट्टरता पर टिकी रहती है। कट्टरता ही किसी धर्म या जाति के भीतर लोगों को बांधकर रखती है। इसलिए धर्म और जाति के मुखिया कट्टरता को कायम रखने और बढ़ाते चलने में भरोसा रखते हैं। ऐसे में इन संगठनों से परे के लोगों को ही प्रेम और विवाह को लेकर समाज की सोच बदलनी होगी।

दूसरी तरफ बच्चे अधिक संगठित रूप से स्कूल और कॉलेज आते-जाते हैं, वहां पर शिक्षकों के लिए यह आसान रहता है कि वे बच्चों में आत्मविश्वास पैदा करे, और उन्हें किफायत से जीना भी सिखाएं। इसके लिए हो सकता है कि स्कूल-कॉलेज के शिक्षकों को पेशेवर परामर्शदाता की तरह कुछ प्रशिक्षण देना भी जरूरी हो, लेकिन वह संस्थागत ढांचे में अधिक आसानी से हो सकता है, और किया जाना चाहिए। आज जब समाज में असमानता बढ़ते जा रही है, महंगे सामानों का छोटे-छोटे बच्चों में भी इस्तेमाल बढ़ते जा रहा है तो बच्चों की हसरतें मां-बाप की क्षमता के बाहर जाकर सिर चढ़कर बोलना स्वाभाविक है, और उन पर काबू सिखाने की उतनी ही अधिक जरूरत भी है। 

आत्महत्याओं में एक और पहलू लिखने का रह गया है जो कि शादीशुदा जोड़ों में से किसी एक या दोनों के अवैध कहे जाने वाले विवाहेत्तर संबंधों का है। इस तरह के संबंध बड़ी संख्या में हत्या और आत्महत्या की वजह बन रहे हैं। इसके लिए भी सामाजिक स्तर पर समझ विकसित करने की जरूरत है, और साथ-साथ शादीशुदा जोड़ों के बीच संबंध ठीक रखने के लिए पेशेवर परामर्श की जरूरत भी है। आत्महत्या का यह आखिरी पहलू बहुत सी हत्याएं लेकर भी आता है, और इसलिए यह सबसे अधिक नुकसानदेह और खतरनाक है। इन सब बातों पर इस जगह पर लिखने की एक सीमा है, लेकिन समाज के जागरूक लोगों को इन मुद्दों पर अपने-अपने संगठनों, अपनी-अपनी संस्थाओं के मंच पर चर्चा करवानी चाहिए, और धीरे-धीरे ही समाज की सोच बदली जा सकती है, लोगों की सोच बदली जा सकती है, रातों-रात नहीं।
-सुनील कुमार

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