सामान्य ज्ञान

केट स्केनर क्या है?
केट स्केनर क्या है?
Date : 12-Jun-2019

अंग्रेजी का यह केट (CAT) शब्द कंप्यूटराइज्ड एक्सिअल टोमोग्राफी (Computerized Axial Tomography) का संक्षिप्त रूप है। ब्रिटैन के इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर गॉडफ्रे हाउंसफील्ड और अमेरिका के चिकित्साशास्त्री अलान कोरमेक ने सन् 1972 में केट का आविष्कार किया था। सन 1979 में इन दोनों वैज्ञानिकों को संयुक्त रूप से चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। केट स्केनर दो प्रकार के होते हैं- हेड स्केनर और बॉडी स्केनर। हेड स्केनर का उपयोग मस्तिष्क की बीमारियों का पता लगाने के लिए किया जाता है। इसके द्वारा दिमाग में होने वाला फोड़ा, चोट, रक्तस्त्राव, खून में थक्का पड़ जाना आदि की पहचान की जा सकती है। बॉडी स्केनर का उपयोग अमाशय, जिगर, वक्षस्थल  आदि की बीमारियों का पता लगाने के लिए किया जाता है। 

केट स्केनर में एक एक्सरे का स्त्रोत होता है, जिसके द्वारा शरीर के किसी भी अंग पर एक्सरे डाली जा सकती है। इस एक्सरे स्त्रोत के सामने कई प्रकार के डिटेक्टर लगे रहते हैं, जो शरीर के विभिन्न अंगों से सूचनाएं प्राप्त करते हैं। एक्स-रे स्त्रोत और डिटेक्टर्स के बीच में मरीज के लेटने के लिए स्ट्रेचर होता है। यह एक मोटर से चलता है। डेटेक्टर्स प्राय: सोडियम आयोडीन, कैल्शियम फ्लोराइड आदि के बनाए जाते हैं। आधुनिक उपकरणों में 3000 डिटेक्टर्स तक हो सकते हैं।

एक्सरे स्त्रोत 2 से 3 सेकंड के अंतर से एक्स किरणें उत्पन्न करता है जो शरीर के विभिन्न अंगों पर पड़ती हैं। अंगों के कोषों को पार करते हुए ये उनसे संबंधित सूचनाएं विभिन्न डिटेक्टर्स के पास ले जाती हैं। ये डिटेक्टर्स एक कंप्यूटर से जुड़े रहते हैं। उदाहरण के लिए एक स्केनर जिसमें 300 डिटेक्टर हों, 300 एक्स-रे संकेत मिलने के बाद 90 हजार संकेत कंप्यूटर को भेजेगा। इन संकेतों को पाने के बाद कंप्यूटर उनका विश्लेषण करता है और उनको चित्र के रूप में टीवी के पर्दे पर दिखाता है। इसके लिए कंप्यूटर एक टीवी से जुड़ा रहता है। कंप्यूटर से जो संकेत आते हैं, वे कोषों के घनेपन में होने वाली भिन्नता के अनुसार होते हैं। टी.वी. के पर्दे पर ये संकेत शारीरिक अंगों के चित्रों के रूप में दिखाई देते हैं। इन चित्रों से रोग के कारण पता चल जाता है। एक ब्रोमाइड पेपर पर टी.वी. में दिखाई देने वाले चित्र स्थायी रूप से रिकार्ड हो जाते हैं। इन चित्रों को देखकर डॉक्टर रोग का पता लगा लेते हैं और उसके अनुसार ही उचित चिकित्सा शुरू कर देते हैं।

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