संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 13 जून : कांक्रीट के इस जंगल पर बिखरा फौलादी एनाकोंडा
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय, 13 जून : कांक्रीट के इस जंगल पर बिखरा फौलादी एनाकोंडा
Date : 13-Jun-2019

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पिछली भाजपा सरकार के वक्त शहर के सबसे व्यस्त इलाके में बनाए गए एक बहुत महंगे पैदलपुल को लेकर नई कांगे्रस सरकार बड़े असमंजस में है कि उसका क्या किया जाए? करीब 50 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, बरसों तक शहर का एक बड़ा हिस्सा सड़क के बीच निर्माण की दिक्कत झेल चुका है, और इस पर अभी शायद 25 करोड़ रुपये खर्च होना बाकी भी है। कांगे्रस पार्टी विपक्ष में रहते हुए लगातार इस स्काईवॉक का विरोध करते आई है, और अब भी पार्टी से लेकर मुख्यमंत्री तक का रुख इसे तोडऩे का है। सवाल यह उठता है कि इसे तोडऩे का मतलब पूरे का पूरा नुकसान है, और आगे पूरा करने का मतलब एक और बड़ा खर्च है, जिसके बाद भी यह अंदाज नहीं है कि वह किसी काम का रहेगा या नहीं। शहर के बड़े अस्पतालों, कोर्ट-कचहरी, कलेक्ट्रेट-सभागृह, जेल और सार्वजनिक पार्किंग जैसी जगहों को जोडऩे वाला यह पैदलपुल शुरू से कुछ विवादों में घिरा रहा कि इसका फैसला बिना विशेषज्ञ राय के लिया गया और इसकी योजना बहुत सोच-समझकर नहीं बनाई गई।

अब जितने मुंह, उतनी बातें। बहुत से लोगों को लग रहा है कि इसे तोड़ देना चाहिए, क्योंकि इसकी वजह से शहर के इस हिस्से की सड़कों के ऊपर गाडिय़ों के लिए फ्लाईओवर बनने की संभावना हमेशा के लिए खत्म हो जाती है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि इसे एक बाजार बना देना चाहिए। लोगों की तकनीकी जानकारी कम रहती है, इसलिए एक सुझाव ऐसा भी आया है कि इसी स्काईवॉक पर बाद में मेट्रो ट्रेन भी चलाई जा सकती है। सरकारी विभाग और सत्तारूढ़ पार्टी सड़क पर लोगों से राय जान रहे हंै, और इनका पहले से घोषित रुख देखकर जाहिर है कि लोग उनकी मर्जी की ही राय अधिक दे रहे हैं।

खैर इस पैदलपुल का चाहे जो हो, इससे शहर को और प्रदेश को एक सबक तो लेना चाहिए कि बिना तकनीकी विशेषज्ञों की राय के सिर्फ सत्तारूढ़ नेताओं की व्यक्तिगत पसंद से जो बड़ी योजनाएं बनती हैं, वे बड़ी बर्बादी की वजह भी बनती हैं। इसी स्काईवॉक को लें तो इसे बनाने के पहले न तो म्युनिसिपल से इसकी इजाजत ली गई, और न ही टाऊनप्लानिंग से। नतीजा यह हुआ कि शहर में छोटे से छोटे निर्माण के लिए जिन विभागों से इजाजत लेनी होती है, उनसे कई किलोमीटर में फैले ऐसे फौलादी एनाकोंडा के लिए भी इजाजत नहीं ली गई। नतीजा यह हुआ कि सरकार के जिन जानकार विभागों को इस पर कुछ कहना था, उनके होंठ सिले हुए थे, और जिस विभाग को यह बड़ा ठेका देना था, वह विभाग बड़े उत्साह में था।

आज छत्तीसगढ़ की इसी राजधानी में सरकारी जमीन पर दूसरी ऐसी कई बड़ी योजनाएं हैं जिनको बनाने के लिए म्युनिसिपल और विकास प्राधिकरण के बीच गलाकाट मुकाबला चल रहा है क्योंकि सैकड़ों करोड़ की योजनाओं से जुड़ा घोषित और अघोषित मुनाफा सबको मालूम है। शहर के सबसे घने एक इलाके में भैंसथान में एक कारोबारी इमारत, और पुरानी मंडी की जगह पर एक और कारोबारी केंद्र बनाने की बड़ी-बड़ी योजनाएं तैयार हैं, और इन दोनों के इर्दगिर्द चारों तरफ आज भी इनकी भीड़ के बिना भी सड़कें पूरी तरह, पूरे वक्त जाम रहती हैं। इसके बावजूद बरसों से स्थानीय नेता और अफसर पागलों की तरह इन योजनाओं के पीछे लगे हैं, और वे इसे शहर का विकास मान रहे हैं। इस शहर की बदनसीबी यह है कि यहां के निर्वाचित और मनोनीत नेता बरसों से इसे एक दुधारू गाय की तरह इस हद तक दुह रहे हैं कि दूध तो कब का निकला चुका है, अब गाय के थन से लहू निकल रहा है।

राज्य की कांगे्रस सरकार को शहरी विकास योजनाओं को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि शहर के बीच की खुली जगह एक बार खत्म हुई, तो मानो शहर के फेंफड़े का एक हिस्सा निकालकर फेंक दिया गया जो कि कभी वापिस नहीं लौटेगा। हमारे हिसाब से इस शहर को लेकर राज्य सरकार को एक लाईन का यह फैसला लेना चाहिए कि म्युनिसिपल सीमा के भीतर एक इंच का भी सरकारी निर्माण तब तक नहीं किया जाएगा जब तक किसी अत्यावश्यक सार्वजनिक सुविधा के लिए वह जरूरी न हो। और अस्पताल या शौचालय किस्म के ऐसे निर्माणों के लिए भी सरकार को यह कड़ा फैसला लेना चाहिए कि पहले सरकार उतना हिस्सा किसी पुरानी इमारत को तोड़कर खाली करेगी, तभी वह किसी दूसरी जगह उतना निर्माण करेगी। जिस तरह पेड़ों की कटाई के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह नीति बनाई है कि मुआवजा-वृक्षारोपण किया जाए, और उसी शर्त पर जरूरी होने पर पेड़ काटे जाएं, इसी तरह राज्य सरकार को चाहिए कि घुटते दम वाले इस शहर में पहले कोई जर्जर सरकारी इमारत हटाए, और उसके बाद ही उतना ही निर्माण एम्बुलेंस, दमकल, या शौचालय जैसे इस्तेमाल के लिए करे। अपने खुद के दफ्तर या स्थानीय संस्थाओं की कारोबारी नीयत के लिए किसी भी किस्म का निर्माण अगर पूरी तरह बंद नहीं कर दिया गया, तो सरकार में बैठे लोग तो आज रिश्वत पा जाएंगे, लेकिन शहर हमेशा के लिए बर्बाद हो जाएगा। इस शहर में बसे हुए इंजीनियरों, और आर्किटेक्ट में से कुछ जागरूक लोगों को आगे आकर सरकार की गलत और खराब योजनाओं का खुलकर विरोध करना चाहिए, तभी जाकर यह शहर, या कोई भी और शहर बचेगा।
-सुनील कुमार

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